सोम प्रदोष व्रत
सनातन धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए कई विशेष दिन और व्रत बताए गए हैं, जिनमें प्रदोष व्रत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब यह प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, तो इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार का दिन स्वयं देवों के देव महादेव को समर्पित है और प्रदोष तिथि भी शिव जी की अत्यंत प्रिय तिथि है। इसलिए, सोम प्रदोष का संयोग सोने पर सुहागा माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोम प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
सोम प्रदोष व्रत क्या है और इसका ज्योतिषीय महत्व?
'प्रदोष' का अर्थ होता है संध्याकाल या रात्रि का प्रारंभ। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास के दोनों पक्षों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) की त्रयोदशी तिथि (13वें दिन) को प्रदोष व्रत रखा जाता है। सोमवार का कारक ग्रह 'चंद्रमा' है, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है।
वर्ष 2026 का विशेष ज्योतिषीय योग:
इस वर्ष 21 दिसम्बर 2026 को आने वाला सोम प्रदोष व्रत शुक्ल पक्ष में पड़ रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस दिन चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में संचरण करते हुए अत्यंत बली और शुभ अवस्था में रहेंगे। इसके साथ ही, आकाश मंडल में भरणी और कृतिका नक्षत्र का प्रभाव रहेगा और शुभ व शुक्ल योग का निर्माण होगा।
यह अद्भुत संयोग कुंडली में चंद्र दोष, ग्रहण दोष, मानसिक तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं को शांत करने के लिए अचूक माना जाता है। चूंकि चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए इस विशिष्ट ग्रह स्थिति में शिव पूजा से मानसिक क्लेश पूरी तरह दूर होते हैं।
वर्ष 2026: सोम शुक्ल प्रदोष व्रत तिथि एवं मुख्य मुहूर्त
वर्ष 2026 के अंत में मार्गशीर्ष/पौष शुक्ल पक्ष का यह अत्यंत शुभ सोम प्रदोष व्रत 21 दिसम्बर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इस दिन के मुख्य मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- सोम प्रदोष व्रत की तिथि: सोमवार, दिसम्बर 21, 2026
- प्रदोष पूजा का मुख्य मुहूर्त: शाम को 05:36 PM से रात 08:13 PM तक
- पूजा की कुल अवधि: 02 घण्टे 37 मिनट्स
- दिन का प्रदोष समय: शाम को 05:29 PM से रात 08:13 PM तक
- त्रयोदशी तिथि का प्रारम्भ: दिसम्बर 21, 2026 को शाम 05:36 PM बजे से
- त्रयोदशी तिथि की समाप्ति: दिसम्बर 22, 2026 को दोपहर 02:23 PM बजे
विशेष नोट: प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा हमेशा प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में की जाती है। चूंकि त्रयोदशी तिथि 21 दिसम्बर को शाम 05:36 बजे शुरू हो रही है और प्रदोष काल में पूरी तरह व्याप्त है, इसलिए व्रत और शाम की मुख्य पूजा इसी दिन संपन्न की जाएगी।
सोम प्रदोष व्रत कैसे मनाया जाता है?
सोम प्रदोष व्रत पूरे भारत में, विशेषकर उत्तर और मध्य भारत में, बड़े ही भक्तिभाव से मनाया जाता है। इस दिन शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
- मंदिरों की भव्य सजावट: चूंकि यह वर्ष का अंतिम और अत्यंत शुभ सोम प्रदोष होता है, इसलिए शिव मंदिरों को शीतकालीन फूलों, बेलपत्रों और सुंदर विद्युत लाइटों से सजाया जाता है।
- सामूहिक भजन-कीर्तन: शाम के समय प्रदोष मुहूर्त (05:36 PM से 08:13 PM) के बीच मंदिरों में सामूहिक रूप से 'शिव चालीसा', 'महामृत्युंजय मंत्र' और शिव भजनों का गायन होता है।
- भक्तिमय माहौल: लोग उपवास रखते हैं, नए या साफ वस्त्र पहनते हैं और माथे पर चंदन का त्रिपुंड लगाकर शिव भक्ति में लीन रहते हैं।
इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
क्या करें:
- मुहूर्त में उठें: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान शिव के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- सात्विक दिनचर्या: पूरे दिन मन में 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते रहें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
- सफेद वस्तुओं का दान: सोमवार और चंद्रमा का संबंध सफेद रंग से है। इसलिए इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को दूध, चावल, चीनी या सफेद वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ होता है।
- प्रदोष काल की मुख्य पूजा: शाम 05:36 PM से रात 08:13 PM के बीच मुख्य पूजा अवश्य करें, क्योंकि इसी समय शिव जी प्रसन्न मुद्रा में होते हैं।
क्या न करें:
- क्रोध और विवाद से बचें: इस दिन किसी पर गुस्सा न करें, झूठ न बोलें और घर में शांति का माहौल बनाए रखें।
- तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग: व्रत के दिन और एक दिन पहले (द्वादशी) से ही लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से पूरी तरह दूर रहें।
- अन्न का सेवन न करें: व्रत के दौरान केवल फलाहार, पानी या दूध का ही सेवन करें। शाम की मुख्य पूजा और आरती के बाद ही व्रत का पारण (फलाहार या सात्विक भोजन) करें।
- वर्जित वस्तुएं न चढ़ाएं: शिवलिंग पर कभी भी तुलसी के पत्ते, सिंदूर, हल्दी और केतकी का फूल न चढ़ाएं (सिंदूर और हल्दी केवल माता पार्वती को अर्पित करें)।
विस्तृत पूजन विधि (दिसम्बर 21, 2026)
सोम प्रदोष की पूजा दो चरणों में होती है—सुबह की संक्षिप्त पूजा और शाम की मुख्य (प्रदोष काल) पूजा।
आवश्यक पूजन सामग्री: गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, दही, शहद, घी (पंचामृत के लिए), बेलपत्र (अखंडित), धतूरा, भांग, शमी के पत्ते, सफेद चंदन, अक्षत (साबुत चावल), जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, और सफेद मिठाइयां (जैसे खीर या पेड़ा)।
पूजा की चरणबद्ध प्रक्रिया:
- प्रातः काल की पूजा:
सुबह स्नान के बाद स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में दीया जलाएं और संकल्प लें: "हे भोलेनाथ, आज 21 दिसम्बर को मैं आपके निमित्त सोम प्रदोष व्रत रख रहा/रही हूँ, मेरी मनोकामना पूर्ण करें और मुझे मानसिक शांति दें।" इसके बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करें।- प्रदोष काल (शाम की मुख्य पूजा - 05:36 PM से):
शाम को सूर्यास्त के समय दोबारा स्नान या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं।- अभिषेक और श्रृंगार:
सबसे पहले शिवलिंग पर पंचामृत अर्पित करें (गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और अंत में दोबारा शुद्ध गंगाजल)। इसके बाद शिव जी को सफेद चंदन का तिलक लगाएं। अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, भांग और शमी पत्र अर्पित करें। माता पार्वती को सिंदूर और लाल चुनरी चढ़ाएं।- भोग और मंत्र जाप:
भगवान शिव को सफेद रंग की मिठाई (खीर या मखाने की खीर) का भोग लगाएं। इसके बाद आसन पर बैठकर कम से कम 108 बार "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।- कथा और आरती:
सोम प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा पढ़ें या सुनें। अंत में कपूर जलाकर शिव जी और माता पार्वती की आरती करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
सोम प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
सोम प्रदोष व्रत की कथा एक गरीब ब्राह्मणी और उसके पुत्र से जुड़ी है, जो इस व्रत के चमत्कारी महत्व को दर्शाती है।
- कथा की शुरुआत: पौराणिक काल में एक ब्राह्मणी थी, जिसके पति का देहांत हो चुका था। उसका कोई सहारा नहीं था, इसलिए वह सुबह उठकर अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल जाती थी और जैसे-तैसे अपना पेट पालती थी।
- राजकुमार से भेंट: एक दिन भीख मांगकर लौटते समय उसे नदी किनारे एक बालक घायल और असहाय अवस्था में मिला। वह विदर्भ देश का राजकुमार था, जिसके पिता को शत्रुओं ने बंदी बनाकर उसका राज्य छीन लिया था। ब्राह्मणी ने दयावश उसे अपने घर ले आया और अपने पुत्र की तरह पाला।
- ऋषि शांडिल्य का उपदेश: कुछ समय बाद, ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुंची। वहाँ ऋषि शांडिल्य ने उसे सोम प्रदोष व्रत के महत्व के बारे में बताया और विधि सिखााई। ब्राह्मणी ने दोनों बालकों के साथ यह व्रत रखना शुरू कर दिया।
- राजयाभिषेक और वैभव की प्राप्ति: कुछ समय बाद, राजकुमार का विवाह भगवान शिव की प्रेरणा से 'अंशुमती' नामक गंधर्व कन्या से हुआ। राजकुमार ने गंधर्व राज की सेना की मदद से अपने शत्रुओं को पराजित कर विदर्भ देश का अपना खोया हुआ राज्य वापस पा लिया। उसने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया और ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया।
- कथा का संदेश: ब्राह्मणी और राजकुमार को यह सब सुख-वैभव सोम प्रदोष व्रत के प्रभाव से ही प्राप्त हुआ था। जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करता है, शिव जी उसके सभी संकट दूर कर देते हैं।
उपसंहार
21 दिसम्बर 2026 को पड़ने वाला यह सोम प्रदोष व्रत वर्ष के अंत में आपके जीवन की नकारात्मकता को दूर करने और आने वाले समय के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का सबसे अचूक माध्यम है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है। यदि आप भी किसी समस्या से जूझ रहे हैं, तो इस शुभ तिथि पर महादेव की शरण में जरूर आएं।
"हर हर महादेव!"

