आषाढ़ी एकादशी / देवशयनी एकादशी 2026:
आषाढ़ी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र तिथि है। यह आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है।
आषाढ़ी एकादशी 2026 — तिथि, समय, ग्रह-नक्षत्र - वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को मनाया जाएगा।
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026, प्रातः 09:12 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026, प्रातः 11:34 बजे
- पारण (व्रत तोड़ने का समय): 26 जुलाई 2026, सुबह 05:39 से 08:22 बजे तक
- द्वादशी समाप्ति: 26 जुलाई 2026, दोपहर 01:57 बजे
ग्रह और नक्षत्र स्थिति (2026 के अनुसार)
- सूर्य: कर्क राशि में — यह समय आध्यात्मिक उन्नति और भावनात्मक शुद्धि के लिए श्रेष्ठ है।
- चंद्रमा: एकादशी के दौरान शुक्ल पक्ष में, विशाखा/अनुराधा नक्षत्र क्षेत्र के आसपास गोचर करेंगे।
- गुरु (बृहस्पति): धर्म और अटूट भक्ति को सुदृढ़ करने वाली स्थिति में रहेंगे।
- शनि: कर्म की शुद्धता और अनुशासन का प्रभाव बढ़ाने वाला गोचर।
- चंद्रबल: बढ़ता हुआ चंद्रमा व्रत, जप और मानसिक साधना के लिए अत्यंत शुभ फलदायी है।
आषाढ़ी एकादशी का इतिहास
प्राचीन काल में देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कुम्भा नामक राक्षस के पुत्र मृदुमान्य ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव से अमरत्व का वरदान प्राप्त कर लिया। इस कारण ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता भी उसे पराजित नहीं कर सके।
भयभीत होकर देवता त्रिकुट पर्वत पर आंवला वृक्ष के नीचे एक गुफा में छिप गए। भोजन के अभाव में उन्होंने आषाढ़ी एकादशी के दिन उपवास रखा और वर्षा में स्नान किया। तभी उनकी श्वास से एक दिव्य ऊर्जा उत्पन्न हुई, जिसने गुफा के बाहर प्रतीक्षा कर रहे मृदुमान्य का वध कर दिया। यही दिव्य शक्ति “एकादशी देवी” के रूप में पूजनीय बनी।
भगवान विष्णु की योगनिद्रा और चातुर्मास
इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।
- नियम: इस दौरान विवाह और अन्य सभी मांगलिक कार्य स्थगित माने जाते हैं।
- महत्व: यह समय केवल आत्म-साधना, कठिन व्रत और ईश्वर की अनन्य भक्ति के लिए समर्पित होता है।
राजा मान्धाता की कथा (संकट निवारण)
प्राचीन काल में राजा मान्धाता नाम के एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे। उनके राज्य में सब सुखी थे, लेकिन अचानक एक समय भयंकर सूखा पड़ा। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, नदियाँ सूख गईं और प्रजा भुखमरी से जूझने लगी।
राजा ने समाधान हेतु अंगिरा ऋषि से परामर्श किया। ऋषि ने बताया कि सूक्ष्म अधर्म के कारण यह संकट आया है और इसका निवारण आषाढ़ी एकादशी का व्रत है। राजा ने पूरी प्रजा के साथ मिलकर श्रद्धापूर्वक व्रत रखा और भजन-कीर्तन किया। उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने मूसलाधार वर्षा करवाई और राज्य में पुनः हरियाली और समृद्धि लौट आई।
पंढरपुर की 'वारी' परंपरा
महाराष्ट्र के पंढरपुर में इस दिन भगवान विट्ठल की विशेष पूजा होती है। लाखों श्रद्धालु “वारी” नामक पदयात्रा करते हैं।यह यात्रा कई दिनों तक पैदल चलकर पूरी की जाती है जिसमें निरंतर भजन-कीर्तन चलता है।विशेष रूप से संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखियाँ इस यात्रा का मुख्य केंद्र होती हैं।
व्रत विधि
- दशमी: व्रत से एक दिन पहले (दशमी को) केवल एक समय सात्विक भोजन करें।
- संकल्प: एकादशी के दिन प्रातः जल्दी स्नान कर व्रत का दृढ़ संकल्प लें।
- पूजा: तुलसी पत्र चढ़ाकर भगवान विष्णु (श्रीधर रूप) की षोडशोपचार पूजा करें।
- उपवास: निराहार रहकर दिनभर भगवान का ध्यान करें।
- जागरण: पूरी रात जागकर भगवान हरि के भक्ति गीत और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- पारण: अगले दिन (द्वादशी को) वामन रूप की पूजा कर शुभ मुहूर्त में भोजन ग्रहण करें।
- अखंड दीप: दोनों दिन भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाए रखें।
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक संदेश
आत्म-शुद्धि: यह पर्व मनुष्य को आत्म-संयम और मानसिक शांति की ओर ले जाता है।
स्वास्थ्य: वैज्ञानिक रूप से वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र कमजोर होता है, ऐसे में उपवास शरीर को Detoxify (विषमुक्त) करने में मदद करता है।
श्रद्धा: यह सिखाता है कि सामूहिक प्रार्थना और सच्ची श्रद्धा से बड़े से बड़े प्राकृतिक संकटों को भी टाला जा सकता है।
।। जय श्री मननारायण ।।

