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शीतला सातम

शीतला सातम 2026: आस्था, परंपरा और स्वास्थ्य का महासंगम

शीतला सातम सनातन धर्म का एक ऐसा अनुपम पर्व है, जो भक्ति के साथ-साथ हमें 'स्वच्छता ही सेवा' और 'स्वास्थ्य ही धन है' का पाठ पढ़ाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व विशेष फलदायी होने वाला है।

वर्ष 2026: तिथि, मुहूर्त और ज्योतिषीय गणना

इस वर्ष गुजरात और पश्चिमी भारत की परंपरा के अनुसार श्रावण मास की शीतला सातम निम्नलिखित समय पर मनाई जाएगी:

  • मुख्य तिथि: 3 सितम्बर 2026, बृहस्पतिवार (गुरुवार)
  • पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:00 AM से शाम 06:41 PM तक।
  • रांधन छठ (भोजन बनाने का दिन): 2 सितम्बर 2026।
  • नक्षत्र विशेष: इस दिन भरणी नक्षत्र रहेगा। भरणी नक्षत्र के देवता 'यम' हैं, जो शुद्धि और अनुशासन के प्रतीक हैं।
  • योग: इस दिन हर्षण योग बन रहा है, जो शुभ कार्यों में सफलता और मानसिक शांति प्रदान करता है।
  • ग्रह स्थिति: गुरु (बृहस्पति) के वार पर यह पर्व आने से यह रोगों के नाश और ज्ञान की वृद्धि के लिए अत्यंत शुभ संयोग बना रहा है।

शीतला माता की पौराणिक एवं लोक कथाएँ

लोक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पीछे दो प्रमुख कथाएँ प्रचलित हैं, जो हमें नियमों के पालन का महत्व समझाती हैं:

1. बुढ़िया और उसकी दो बहुओं की कथा
एक समय की बात है, एक बुढ़िया और उसकी दो बहुओं ने शीतला सातम का व्रत रखा। नियमानुसार उस दिन बासी भोजन करना था। लेकिन दोनों बहुओं ने हाल ही में संतान को जन्म दिया था। उन्होंने सोचा कि ठंडा भोजन करने से वे और उनके बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। सास से छुपकर उन्होंने रसोई में गरम रोटियां बना लीं और खा लीं।जब देवी शीतला वेश बदलकर उनके घर आईं, तो उन्होंने देखा कि बहुओं ने नियम तोड़ा है। माता के कोप से उनके बच्चे मृतप्राय हो गए। दुखी बहुएं अपने बच्चों को लेकर जंगल की ओर भागीं। रास्ते में उन्हें देवी मिलीं, जिन्होंने उन्हें अपनी गलती का आभास कराया। बहुओं ने क्षमा मांगी और तब से यह अटूट विश्वास हो गया कि इस दिन अग्नि प्रज्वलित करना माता को रुष्ट कर सकता है।

2. शीतला माता के वेश बदलने की कथा
एक बार देवी शीतला एक गरीब बुढ़िया के रूप में धरती पर विचरण कर रही थीं। उन्होंने देखा कि एक गांव में लोग बहुत अशुद्धता से रह रहे थे। वे एक घर में गईं जहाँ की महिला ने उन्हें ठंडे जल और बासी भोजन से तृप्त किया। उस घर पर कभी कोई बीमारी नहीं आई, जबकि पूरे गांव में संक्रमण फैल गया। यह कथा हमें सिखाती है कि सादगी और ठंडा भोजन शरीर की अग्नि को शांत रखता है।

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण

शीतला सातम का त्यौहार ऋतु परिवर्तन की दहलीज पर आता है।

  1. पित्त का शमन: आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में शरीर में पित्त (गर्मी) बढ़ती है। ठंडा भोजन करने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है।
  2. संक्रमण से बचाव: नीम के पत्तों का पूजा में प्रयोग प्राकृतिक एंटी-सेप्टिक का काम करता है, जो चेचक और खसरा जैसे रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करता है।
  3. स्वच्छता का संदेश: देवी के हाथ में मौजूद झाड़ू और कलश हमें याद दिलाते हैं कि यदि घर साफ है और जल शुद्ध है, तो बीमारियां हमसे कोसों दूर रहेंगी।

2026 की पूजा के लिए 'क्या करें और क्या न करें'

क्या करें :

1.बासोड़ा पूजा: एक दिन पहले (2 सितंबर को) तैयार किया गया भोजन ही भोग में लगाएं।
2.नीम और ठंडा जल: पूजा के बाद पूरे घर में नीम के पत्तों से ठंडे जल का छिड़काव करें।
3.दहलीज पूजन: घर की मुख्य दहलीज पर हल्दी और कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं।
4.परोपकार: गरीबों को ठंडा जल, फल और भोजन दान करें।

क्या न करें :

1.चूल्हा जलाना वर्जित:घर में किसी भी रूप में आग न जलाएं। चाय-कॉफी के लिए भी गैस का प्रयोग न करें।
2.गरम खान-पान: इस दिन ताज़ा या गरम भोजन करना वर्जित है।
3.सिलाई और धारदार काम: सुई-धागे का काम या कैंची-चाकू का अनावश्यक प्रयोग न करें।
4.अशांति: घर में क्रोध, बहस या लड़ाई-झगड़ा न करें, क्योंकि शीतला माता शांति की देवी हैं।

निष्कर्ष

शीतला सातम हमें अनुशासन और संयम सिखाती है। यह पर्व याद दिलाता है कि परंपराएं केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा के लिए बनाए गए वैज्ञानिक नियम हैं। 3 सितम्बर 2026 को जब आप यह पर्व मनाएं, तो मन में यही भाव रखें कि शुद्धता ही आरोग्य की कुंजी है।

।। जय शीतला माता। आरोग्यं भवतु ।।

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