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शनि प्रदोष व्रत

शनि प्रदोष व्रत 2026:

सनातन धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम और कल्याणकारी व्रत माना गया है। जब यह प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है, तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह व्रत न केवल देवाधिदेव महादेव की असीम अनुकंपा दिलाता है, बल्कि कुंडली में मौजूद शनि दोषों से भी मुक्ति प्रदान करता है।

वर्ष 2026 का यह शनि प्रदोष व्रत ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और महासंयोग लेकर आ रहा है, क्योंकि इस समय शनि देव अपनी स्वयं की राशि में गोचर कर रहे होंगे।

वर्ष 2026 का विशेष शनि प्रदोष व्रत मुहूर्त

वर्ष 2026 में फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह विशेष संयोग बन रहा है। इस दिन का सटीक मुहूर्त और समय नीचे दिया गया है:

  • शनि कृष्ण प्रदोष व्रत तिथि: शनिवार, फरवरी 14, 2026
  • प्रदोष पूजा मुहूर्त: शाम 06:10 PM से रात 08:44 PM तक
  • कुल अवधि: 02 घण्टे 34 मिनट्स
  • दिन का प्रदोष समय: शाम 06:10 PM से रात 08:44 PM तक
  • त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ: फरवरी 14, 2026 को 04:01 PM बजे से
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त: फरवरी 15, 2026 को 05:04 PM बजे तक

2026 के शनि प्रदोष पर महत्वपूर्ण ग्रह, नक्षत्र और ज्योतिषीय योग

फरवरी 14, 2026 को आने वाला यह शनि प्रदोष व्रत ज्योतिषीय गणना के अनुसार बेहद शक्तिशाली है। इस दिन आकाशमंडल में निम्नलिखित महत्वपूर्ण ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति बन रही है:

1. शनि देव का कुंभ राशि में गोचर (शश महापुरुष योग)
वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में शनि देव अपनी स्वयं की मूलत्रिकोण राशि कुंभ में विराजमान हैं। शनि का अपनी ही राशि में होना बेहद मजबूत स्थिति माना जाता है। ऐसे में शनि प्रदोष का आना उन लोगों के लिए रामबाण है जिन पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही है।

2. नक्षत्र और चंद्रमा की स्थिति
इस दिन चंद्रमा मकर या कुंभ राशि में गोचर कर रहे होंगे, जिससे शिव-शक्ति योग का निर्माण होता है। इस दिन उत्तर भाद्रपद या श्रवण/धनिष्ठा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो तंत्र-मंत्र, साधना और मानसिक शांति के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।

3. इन राशियों के लिए महालाभ का समय
कुंभ, मीन और मकर: इन राशियों पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव है।
कर्क और वृश्चिक: इन राशियों पर शनि की ढैय्या चल रही है।
विशेष: ऊपर दी गई पांचों राशियों के जातकों के लिए 14 फरवरी 2026 का यह व्रत कष्टों को जड़ से मिटाने वाला और भाग्य के द्वार खोलने वाला साबित होगा।

शनि प्रदोष व्रत क्या है?

प्रत्येक हिंदू कैलेंडर मास के दोनों पक्षों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) की त्रयोदशी तिथि (13वें दिन) को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन आती है, तो यह 'शनि प्रदोष' कहलाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल (सूर्यास्त के ठीक बाद और रात्रि के प्रारंभ का समय) में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और अपने भक्तों के सभी दुखों को हर लेते हैं। शनिवार के दिन यह व्रत रखने से शिवजी के साथ-साथ न्याय के देवता शनि देव की कृपा भी एक साथ प्राप्त होती है।

इस दिन भक्त क्या करते हैं और इसे कैसे मनाया जाता है?

शनि प्रदोष के दिन श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा और संयम के साथ व्रत का पालन करते हैं। सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। भक्त पूरे दिन निराहार (या केवल फलाहार) रहकर भगवान शिव के मंत्रों का जाप करते हैं।
इसे एक उत्सव और आत्म-शुद्धि के पर्व के रूप में मनाया जाता है। घरों को स्वच्छ किया जाता है और मुख्य द्वार पर वंदनवार लगाए जाते हैं। मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। शिव जी का भजनों और कीर्तनों के साथ आह्वान किया जाता है। शाम के समय मंदिरों में सामूहिक रूप से एकत्र होकर लोग महाआरती में भाग लेते हैं। इस दिन दान-पुण्य करने का भी विशेष चलन है।

संपूर्ण पूजन विधि (दो चरणों में)

14 फरवरी 2026 को पड़ने वाले इस व्रत की पूजा दो चरणों में की जाएगी—एक सुबह के समय और दूसरी मुख्य पूजा शाम को प्रदोष काल (06:10 PM से 08:44 PM) में।

प्रातः काल की तैयारी और संकल्प

1.सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र (संभव हो तो सफेद या हल्के रंग के) धारण करें।
2.पूजा घर की सफाई करें और तांबे के लोटे से सूर्य देव को अर्घ्य दें।
3.भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें: "हे शिव शंभू, आज वर्ष 2026 के इस पावन शनि प्रदोष पर मैं आपके निमित्त व्रत रख रहा/रही हूँ, मेरी पूजा और शनि दोषों की निवृत्ति स्वीकार करें।"

प्रदोष काल (शाम की मुख्य पूजा: 06:10 PM से 08:44 PM)

1.शाम को सूर्यास्त से ठीक पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ हो जाएं।
2.पूजा स्थान पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
3.शिव अभिषेक: शिवलिंग पर क्रमशः गंगाजल, कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें। इसके बाद शुद्ध जल अर्पित करें।
4.श्रृंगार: शिवजी को चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें बेलपत्र (3 पत्तियों वाला और बिना कटा-फटा), धतूरा, मदार के फूल, अक्षत (साबुत चावल) और भस्म अर्पित करें।
5.धूप-दीप: माता पार्वती और भगवान शिव के सामने गाय के घी का दीपक और धूप जलाएं।
6.भोग: भगवान को मौसमी फल या सफेद मिठाई का भोग लगाएं।
7.मंत्र जाप: पूजा के दौरान `ॐ नमः शिवाय` या `महामृत्युंजय मंत्र` का निरंतर जाप करते रहें।

शनि देव की विशेष पूजा (शिव पूजा के तुरंत बाद)

1. शिव पूजा के बाद घर के पश्चिम कोने में या किसी शनि मंदिर जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
2. शनि देव को काले तिल, काली उड़द, नीले फूल और शमी के पत्ते अर्पित करें।
3. शनि चालीसा का पाठ करें और `ॐ शं शनैश्चराय नमः` मंत्र का जाप करें।

शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा

स्कंद पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी विधवा ब्राह्मणी अपने छोटे पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने लगी। वह सुबह ही बेटे को लेकर निकल जाती और शाम को जो कुछ भी भिक्षा में मिलता, उससे अपना पेट पालती थी। एक दिन भिक्षा मांगकर लौटते समय ब्राह्मणी को नदी किनारे एक अत्यंत सुंदर बालक रोता हुआ मिला। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था, जिसके पिता (राजा) को दुश्मनों ने युद्ध में मार दिया था और उसका राज्य छीन लिया था। ब्राह्मणी को उस अनाथ बालक पर दया आ गई। वह उसे अपने साथ अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह ही उसका पालन-पोषण करने लगी।

कुछ समय बाद, ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम गई। वहाँ ऋषि शांडिल्य ने उसे 'प्रदोष व्रत' के महत्व और विधि के बारे में बताया। ऋषि के आदेशानुसार, ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने पूरी निष्ठा के साथ शनि प्रदोष का व्रत रखना शुरू कर दिया।
एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे। वहाँ राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते देखा। उनमें से 'अंशुमती' नाम की गंधर्व कन्या राजकुमार के सौंदर्य पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमती अपने माता-पिता के साथ राजकुमार से मिलने आई और गंधर्व राज ने अपनी पुत्री का विवाह उस राजकुमार से कर दिया।इसके बाद, राजकुमार ने गंधर्व सेना की मदद से अपने विदर्भ देश पर दोबारा आक्रमण किया और खोया हुआ राज्य वापस पा लिया। उसने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी और दोनों पुत्रों को यह सुख और राजपाठ केवल शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से ही प्राप्त हुआ था। तब से यह मान्यता है कि जो भी मनुष्य इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करता है, उसके जीवन से दरिद्रता और संकट हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।

व्रत के दौरान आहार के नियम (क्या खाएं और क्या न खाएं?)

शनि प्रदोष व्रत के दौरान भोजन और पेय पदार्थों के चयन में शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। व्रत में सात्विक आहार के रूप में ताजे फल, दूध, मखाना, साबूदाना खिचड़ी, और कुट्टू या सिंघाड़े के आटे का हलवा या पूरी खाना बेहद उत्तम माना जाता है। शरीर को ऊर्जावान और हाइड्रेटेड रखने के लिए नारियल पानी, छाछ और ताजे फलों का रस पीना चाहिए। नमक के उपयोग को लेकर भी व्रत में सख्त नियम होते हैं; इसमें साधारण सफेद नमक यानी समुद्री नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है, और यदि अत्यंत आवश्यक हो, तो शाम की पूजा के बाद केवल सेंधा नमक का ही उपयोग करना चाहिए।

दूसरी ओर, व्रत के दौरान तामसिक भोजन, प्याज, लहसुन, अनाज (जैसे गेहूं और चावल), मैदा और किसी भी प्रकार के भारी भोजन से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। इसके साथ ही, स्वास्थ्य और मानसिक शुद्धता बनाए रखने के लिए अत्यधिक चाय, कॉफी या किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए।

व्रत के नियम और सावधानियां

1.व्यवहार में शुद्धता: व्रत के दिन किसी भी व्यक्ति को अपशब्द न बोलें, झूठ न बोलें और न ही किसी के प्रति मन में ईर्ष्या का भाव लाएं।
2.ब्रह्मचर्य: इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और घर में शांति का वातावरण बनाए रखना चाहिए।
3.कमजोरों की सहायता: शनि देव न्याय के देवता हैं, इसलिए इस दिन किसी भी गरीब, असहाय या पशु-पक्षी को न सताएं। उन्हें काले चने, पूड़ी या पानी का दान दें।
4.व्रत का पारण: शनिवार 14 फरवरी की शाम की पूजा (प्रदोष काल) के बाद ही फलाहार या सेंधा नमक का भोजन ग्रहण करें। अगले दिन यानी रविवार (15 फरवरी, 2026) की सुबह सूर्योदय के बाद ही अन्न का सेवन करके व्रत का पूर्ण पारण करें।

 

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