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शाकम्भरी पूर्णिमा

शाकम्भरी पूर्णिमा (पौष पूर्णिमा) 2026:

हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन पौष मास की पूर्णिमा का स्थान बेहद अद्वितीय है। इस दिन को 'शाकम्भरी पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। यह पावन पर्व जगत जननी मां दुर्गा के ममतामयी और पोषणकारी स्वरूप 'मां शाकम्भरी' को समर्पित है। मां शाकम्भरी को वनस्पतियों, साग-सब्जियों, फलों और अन्न की देवी माना जाता है।

यह त्योहार हमें प्रकृति से जुड़ने, पर्यावरण का सम्मान करने और पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने वाली वनस्पतियों के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देता है।

शाकम्भरी पूर्णिमा क्या है?

'शाकम्भरी' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: 'शाक' (जिसका अर्थ है साग-सब्जी या वनस्पति) और 'भरी' (जिसका अर्थ है पोषण करने वाली या धारण करने वाली)। अर्थात, जो देवी अपने अंगों से उत्पन्न शाक-भाजी से संसार का भरण-पोषण करती हैं, वे ही मां शाकम्भरी हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां दुर्गा ने संसार को भयंकर अकाल और सूखे से बचाने के लिए शाकम्भरी देवी के रूप में अवतार लिया था। वे आदिशक्ति का ही एक सौम्य और करुणामयी स्वरूप हैं। इस दिन को 'शाकम्भरी जयंती' भी कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पौष शुक्ल अष्टमी से शुरू होने वाला 'शाकम्भरी नवरात्रि' का महापर्व इसी दिन (पूर्णिमा) संपन्न होता है।

वर्ष 2026 में तिथि एवं शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में शाकम्भरी पूर्णिमा का पावन पर्व शनिवार, जनवरी 3, 2026 को मनाया जाएगा। (व्रत 2 जनवरी को और स्नान-दान 3 जनवरी को करना श्रेष्ठ रहेगा)।

  • पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: जनवरी 02, 2026 को 06:53 पी एम बजे से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: जनवरी 03, 2026 को 03:32 पी एम बजे तक
  • ब्रह्म मुहूर्त (स्नान के लिए): सुबह 05:25 से सुबह 06:20 तक
  • चंद्रोदय का समय: 3 जनवरी को शाम 05:28 बजे
  • सत्यनारायण पूजा मुहूर्त: शाम 05:34 से शाम 06:02 तक

वर्ष 2026 की महत्वपूर्ण खगोलीय, ग्रह और नक्षत्र स्थितियां

ज्योतिषीय दृष्टि से वर्ष 2026 की यह पूर्णिमा बेहद विशेष मानी जा रही है, क्योंकि इस दौरान कई शुभ ग्रहों और नक्षत्रों का अनूठा संयोग बन रहा है:

  1. सूर्य और चंद्रमा का परस्पर संबंध: इस दिन सूर्य देव धनु राशि में और चंद्र देव मिथुन राशि (पूर्णिमा के पूर्ण प्रभाव में) में गोचर करेंगे, जिससे जातक के जीवन में मानसिक शांति और करियर में उन्नति के योग बनते हैं।
  2. शनिवार का संयोग: शनिवार के दिन पूर्णिमा तिथि और ब्रह्म मुहूर्त का मिलना तंत्र-मंत्र की बाधाओं को दूर करने और शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत फलदायी है। इस दिन काले तिल और गर्म कपड़ों का दान शनि देव को भी शांत करता है।
  3. प्रयागराज कल्पवास का शुभारंभ: इसी पावन तिथि के साथ तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में एक महीने तक चलने वाले कठिन 'कल्पवास' की शुरुआत भी हो रही है, जहाँ श्रद्धालु पूरे एक माह तक गंगा किनारे कुटिया में रहकर सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं।

शाकम्भरी पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

शास्त्रों में मां शाकम्भरी को 'शताक्षी' और 'दुर्गा' का ही रूप माना गया है। इस दिन का महत्व निम्नलिखित कारणों से अत्यधिक है:

  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: यह त्योहार हमें यह याद दिलाता है कि हमारा जीवन पूरी तरह से प्रकृति और वनस्पतियों पर निर्भर है।
  • दुखों का निवारण: मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और मां की पूजा करने से घर में कभी धन-धान्य, अन्न और जल की कमी नहीं होती।
  • कुंडली में चंद्र दोष से मुक्ति: चूंकि यह नए साल 2026 की पहली पूर्णिमा है, इसलिए इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने और सफेद वस्तुओं (दूध, चावल) का दान करने से कुंडली का कमजोर चंद्रमा मजबूत होता है।

इस दिन क्या किया जाता है?

  • पवित्र नदियों में स्नान: इस दिन गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने का बहुत महत्व है। यदि नदी स्नान संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है।
  • दान-पुण्य: पूर्णिमा तिथि दान के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। इस दिन विशेष रूप से कच्ची सब्जियां, फल, अनाज, गुड़ और गर्म कपड़ों का दान जरूरतमंदों को किया जाता है।
  • शाक-भाजी का भोग और वितरण: इस दिन घरों और मंदिरों में मां को तरह-तरह की हरी सब्जियों का भोग लगाया जाता है और उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
  • अन्नकूट महोत्सव: कई मंदिरों में इस दिन विशाल अन्नकूट या शाकंभरी उत्सव का आयोजन होता है, जहां सैकड़ों किलो सब्जियों को मिलाकर एक विशेष प्रसाद (मिक्स वेज) बनाया जाता है।

मां शाकम्भरी पूजन विधि

शाकम्भरी पूर्णिमा की पूजा बेहद अनूठी होती है क्योंकि इसमें पारंपरिक पूजा सामग्री के साथ-साथ ताजी हरी सब्जियों और फलों का बहुतायत में उपयोग किया जाता है।

आवश्यक सामग्री:
मां दुर्गा या मां शाकम्भरी की तस्वीर/मूर्ति, चौकी, लाल कपड़ा, गंगाजल, कुमकुम, अक्षत (चावल), रोली, कलावा, धूप, दीप, कपूर और शुद्ध देसी घी। इसके साथ ही विशेष सामग्री के रूप में मौसमी हरी सब्जियां (जैसे- पालक, मेथी, बथुआ, लौकी, तोरई, मटर, गोभी), ताजे फल, फूल और भोग के लिए हलवा, पूरी या खीर।

विस्तृत पूजा विधि:

1.ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के) धारण करें।
2.व्रत का संकल्प लें: हाथ में जल और अक्षत लेकर मां शाकम्भरी के सामने व्रत और पूजा का संकल्प लें।
3.चौकी की स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर मां शाकम्भरी या मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें।
4.सब्जियों की सजावट: मां की मूर्ति के चारों ओर ताजी हरी सब्जियों, साग और फलों को कलात्मक रूप से सजाएं। यह इस पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
5.अभिषेक और तिलक: मां को गंगाजल के छींटे दें। इसके बाद उन्हें कुमकुम, चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
6.धूप-दीप प्रज्वलित करें: गाय के घी का दीपक जलाएं और धूप बत्ती सुलगाएं। मां को लाल रंग के पुष्प या फूलों की माला अर्पित करें।
7.भोग लगाएं: मां को ऋतु फलों, हरी सब्जियों और घर में बने शुद्ध भोजन (जैसे- हलवा-पूरी या खीर) का भोग लगाएं।
8.कथा और आरती: मां शाकम्भरी की प्राकट्य कथा का श्रवण या वाचन करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा का पाठ करें और अंत में मां की कपूर से आरती उतारें।
9.क्षमा याचना: पूजा के अंत में अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए मां से क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद को सभी में वितरित करें।

मां शाकम्भरी के प्राकट्य की पौराणिक कथा

देवी भागवत पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती के 'मूर्ती रहस्य' में मां शाकम्भरी के प्राकट्य की कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

भयंकर अकाल और रुरु का पुत्र 'दुर्गमासुर'
पौराणिक काल में 'दुर्गमासुर' नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर दैत्य हुआ। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो दुर्गमासुर ने उनसे चारों वेदों को अपने वश में करने और देवताओं को शक्तिहीन करने का वरदान मांग लिया। वेदों के लुप्त हो जाने के कारण पृथ्वी से ब्राह्मणों का तेज, यज्ञ, हवन और धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह समाप्त हो गए। इसके परिणामस्वरूप देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया। पृथ्वी पर लगातार 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियां, तालाब, कुएं सब सूख गए। चारों तरफ हाहाकार मच गया। पानी और अन्न के अभाव में मनुष्य, पशु-पक्षी और वनस्पतियां तड़प-तड़प कर मरने लगे।

देवताओं की करुण पुकार और मां का 'शताक्षी' रूप
इस महाविपत्ति से मुक्ति पाने के लिए सभी देवता, ऋषि-मुनि और मानव हिमालय की कंदराओं में एकत्रित हुए और उन्होंने आदिशक्ति जगदम्बा की कठोर आराधना की। सबकी करुण पुकार सुनकर मां भगवती अत्यंत द्रवित हो उठीं। वे अनंत नेत्रों वाली देवी के रूप में प्रकट हुईं। मां ने जब पृथ्वी की ऐसी दयनीय स्थिति देखी, तो उनके सौ नेत्रों (शताक्षी) से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी। मां के आंसुओं से पूरी पृथ्वी गीली हो गई, सूखी नदियों और समुद्रों में फिर से जल भर गया और चारों तरफ हरियाली छाने लगी।

मां का 'शाकम्भरी' अवतार

जल का संकट दूर होने के बाद भी जीवों की भूख शांत नहीं हुई थी। तब मां भगवती ने अपने दिव्य शरीर से अनंत प्रकार की जड़ी-बूटियां, हरी सब्जियां (शाक), कंद-मूल और स्वादिष्ट फल उत्पन्न किए। मां ने स्वयं इन शाक-भाजियों को अपने हाथों में धारण किया और भूखे जीवों का भरण-पोषण किया। चूंकि मां ने शाक (वनस्पतियों) के माध्यम से संसार की रक्षा की, इसलिए उनका नाम 'शाकम्भरी' पड़ा। श्री दुर्गा सप्तशती में मां स्वयं कहती हैं कि जब मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाकों द्वारा संसार का पोषण करूंगी, तब पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात होऊंगी।

दुर्गमासुर का वध और वेदों की वापसी

जब दुर्गमासुर को इस बात का पता चला, तो उसने अपनी विशाल सेना के साथ देवी पर आक्रमण कर दिया। मां शाकम्भरी ने देवताओं और ऋषियों की रक्षा के लिए एक विशाल सुरक्षा कवच बनाया और दुर्गमासुर के साथ भयंकर युद्ध किया। अंत में, मां ने अपने त्रिशूल से दुर्गमासुर का वध कर दिया। उसके वध के साथ ही मां ने उसके शरीर से चारों वेदों को मुक्त कराया और पुनः देवताओं को सौंप दिया। दुर्गमासुर का वध करने के कारण मां का एक नाम 'दुर्गा' भी पड़ा।

भारत में प्रमुख शाकम्भरी देवी मंदिर

शाकम्भरी पूर्णिमा के दिन देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित मां शाकम्भरी के शक्तिपीठों पर भव्य मेलों और उत्सवों का आयोजन होता है:

  • शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ (सहारनपुर, उत्तर प्रदेश): यह मां शाकम्भरी का सबसे प्रमुख और प्राचीन सिद्धपीठ है। यहां माता की मूर्ति के साथ अनूठी शाक-सब्जियों की सजावट देखते ही बनती है।
  • शाकम्भरी माता मंदिर (सांभर, राजस्थान): यह अरावली की पहाड़ियों में स्थित है। चौहान वंश की कुलदेवी के रूप में मां की यहां विशेष पूजा होती है।
  • बणशंकरी अम्मा मंदिर (बादामी, कर्नाटक): दक्षिण भारत में मां शाकम्भरी को 'बनशंकरी' (वनों की देवी) कहा जाता है। यहाँ का 'बनशंकरी जात्रे' (मेला) बहुत प्रसिद्ध है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में शाकम्भरी पूर्णिमा की प्रासंगिकता

आज के युग में, जहां ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, वनों की कटाई और पर्यावरण असंतुलन एक गंभीर समस्या बन चुके हैं, शाकम्भरी पूर्णिमा का त्योहार और भी प्रासंगिक हो जाता है।

  1. पर्यावरण संरक्षण का संदेश: यह पर्व हमें सिखाता है कि पेड़-पौधों और वनस्पतियों में भी ईश्वरीय अंश है। पर्यावरण की रक्षा करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है।
  2. सात्विक जीवन (प्राकृतिक जीवन): मां शाकम्भरी की पूजा हमें कृत्रिम रसायनों से दूर रहकर प्रकृति द्वारा दिए गए शुद्ध, सात्विक और शाकाहारी भोजन को अपनाने की प्रेरणा देती है।
  3. जल और अन्न का सम्मान: यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि पानी की एक-एक बूंद और अन्न का एक-एक दाना कितना कीमती है, जिसे हमें कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।
  4. संकल्प: शाकम्भरी पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के अटूट रिश्ते का उत्सव है। वर्ष 2026 की इस पहली पूर्णिमा पर हमें न केवल मां की पूजा करनी चाहिए, बल्कि प्रकृति की रक्षा के लिए कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प भी अवश्य लेना चाहिए।
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