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सन्धि पूजा

दुर्गा पूजा और नवरात्रि के नौ दिनों में 'सन्धि पूजा' को सबसे पवित्र, शक्तिशाली और रहस्यमयी क्षण माना जाता है। यह केवल एक सामान्य पूजा नहीं है, बल्कि यह वह दिव्य कालखंड है जब बुराई पर अच्छाई की जीत सुनिश्चित हुई थी। बंगाली सनातन संस्कृति और संपूर्ण भारत में इस पूजा का एक असाधारण महत्व है।

सन्धि पूजा क्या है?

'सन्धि' शब्द का अर्थ होता है—मिलन या संधिकाल। दुर्गा पूजा के दौरान, जब महाअष्टमी समाप्त हो रही होती है और महानवमी की शुरुआत होने वाली होती है, तब उन दोनों तिथियों के मिलन समय को 'संधिकाल' कहा जाता है।इसी संधिकाल में देवी दुर्गा के'चामुंडा' स्वरूप की आराधना की जाती है। माना जाता है कि इस विशेष समय में ब्रह्मांड की समस्त दिव्य शक्तियां जागृत और अत्यधिक सक्रिय होती हैं।

वर्ष 2026 में सन्धि पूजा का समय और विशिष्ट मुहूर्त

हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में सन्धि पूजा का पावन मुहूर्त दिन के समय आ रहा है, जो साधना के लिए बेहद शुभ माना जा रहा है।

  • सन्धि पूजा की तिथि: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
  • सन्धि पूजा का सटीक मुहूर्त: सुबह 10:27 AM से दोपहर 11:15 AM तक
  • कुल अवधि:ठीक 48 मिनट (महाअष्टमी के अंतिम 24 मिनट और महानवमी के शुरुआती 24 मिनट)

तिथि का गणित:

  • अष्टमी तिथि का प्रारम्भ: रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को सुबह 08:27 AM बजे से।
  • अष्टमी तिथि की समाप्ति: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:51 AM बजे।
  • विशेष नोट:सोमवार, 19 अक्टूबर को सुबह 10:51 AM से ठीक 24 मिनट पहले (10:27 AM पर) संधिकाल शुरू हो जाएगा और अष्टमी समाप्त होने के बाद नवमी के शुरुआती 24 मिनट (11:15 AM) तक चलेगा। इस सटीक 48 मिनट के भीतर ही महापूजा संपन्न की जाएगी।

वर्ष 2026 के विशेष ग्रह, नक्षत्र और ज्योतिषीय योग

वर्ष 2026 की सन्धि पूजा ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी संयोग लेकर आ रही है:

  1. सोमवार का विशेष संयोग: इस वर्ष सन्धि पूजा सोमवार के दिन पड़ रही है। सोमवार का दिन स्वयं भगवान शिव (चंद्रशेखर) को समर्पित है। आदिप्रकृति मां दुर्गा और देवाधिदेव शिव के इस समागम के कारण इस दिन की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।
  2. श्रवण नक्षत्र का प्रभाव: इस समय आकाश मंडल में श्रवण नक्षत्र की उपस्थिति रहेगी। श्रवण नक्षत्र के स्वामी स्वयं चंद्र देव हैं और इसके अधिपति भगवान विष्णु हैं। यह नक्षत्र ज्ञान, भक्ति और साधना की सिद्धि के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
  3. ग्रहों की स्थिति: इस दौरान चंद्रमा मकर राशि में गोचर करेंगे, जिससे जातक के भीतर मानसिक दृढ़ता और संकल्प शक्ति का विकास होगा। वहीं सूर्य देव तुला राशि में रहकर इस महापर्व की ऊर्जा को संतुलित करेंगे।

पौराणिक कथा और इतिहास

सन्धि पूजा के पीछे मुख्य रूप से 'देवी भागवत पुराण' और 'मार्कण्डेय पुराण' के 'श्री दुर्गा सप्तशती' में वर्णित दो प्रमुख कथाएं हैं:

क) देवी चामुंडा द्वारा चण्ड और मुण्ड का वध: महिषासुर के दो परम शक्तिशाली सेनापति थे—चण्ड और मुण्ड। जब उन्होंने देवी दुर्गा पर पीछे से हमला करने की कोशिश की, तो क्रोध के मारे माता का मुख काला पड़ गया। उसी क्षण देवी के ललाट (तीसरे नेत्र) से एक भयंकर और संहारक शक्ति प्रकट हुईं, जिन्हें देवी चामुंडा कहा गया। देवी चामुंडा ने अष्टमी और नवमी के इसी संधिकाल में चण्ड और मुण्ड के सिर काट कर महिषासुर की सेना का मनोबल तोड़ दिया था।
ख) महिषासुर वध की अंतिम घड़ी: एक अन्य मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच 9 दिनों तक भीषण युद्ध चला। इस संधिकाल के दौरान, महिषासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का चरम रूप धारण कर लिया था। देवी दुर्गा ने इसी 48 मिनट के भीतर महिषासुर की माया को छिन्न-भिन्न कर उसकी मृत्यु का मार्ग प्रशस्त किया था।

पूजा की सामग्रियां और उनके महत्व :

  • 108 मिट्टी के दीपक: यह सामग्री अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मानी जाती है।
  • 108 नीलकमल: यह माता को अत्यंत प्रिय है। यदि नीलकमल उपलब्ध न हो, तो इसके स्थान पर लाल कमल या गुड़हल के फूलों का उपयोग किया जाता है।
  • बड़ा दीप (नंदा दीप): यह पूरी पूजा के दौरान अखंड रूप से जलने वाला मुख्य दीपक होता है।
  • सात्विक कद्दू / गन्ना / केला: इनका उपयोग पूजा में प्रतीकात्मक या सात्विक 'बलि' देने के लिए किया जाता है।
  • अन्य अनिवार्य वस्तुएं: पूजा को पूर्ण करने के लिए अक्षत (चावल), चंदन, सिंदूर, बिल्वपत्र (बेलपत्र) और नए वस्त्र भी शामिल किए जाते हैं।

विस्तृत पूजन विधि

सन्धि पूजा की विधि अत्यंत तांत्रिक और वैदिक नियमों के मिश्रण से संपन्न होती है। इसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

  1. दीप प्रज्वलन: जैसे ही सोमवार, 19 अक्टूबर को सुबह 10:27 AM बजेंगे, पंडालों और घरों में पुरोहित व भक्त मिलकर अत्यंत तीव्र गति से 108 मिट्टी के दीयों को प्रज्वलित करना शुरू कर देंगे। पूरा पूजा स्थल रोशनी से जगमगा उठता है।
  2. 108 कमलों का अर्पण: देवी चामुंडा को एक-एक करके 108 कमल के फूल अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा भगवान श्री राम द्वारा रावण वध से पहले की गई अकाल बोधन पूजा से भी प्रेरित है।
  3. देवी चामुंडा का आह्वान और मंत्र जाप: पुरोहित देवी के क्रोधित और विजयी स्वरूप का ध्यान करते हैं। इस समय मूल नवार्ण मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है:{ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे}
  4. 'बलि' प्रथा (सात्विक बलि): आधुनिक समय में यह पूरी तरह से सात्विक या प्रतीकात्मक बलि में बदल चुकी है। इस समय माता के सामने कद्दू, गन्ना, या ककड़ी की बलि दी जाती है, जो इंसान के अहंकार, लोभ और क्रोध को काटने का प्रतीक है।
  5. धुनुची नाच और ढाक की थाप: पूजा के समापन पर 'ढाक' (विशेष बंगाली ढोल) बहुत तेज गति से बजाया जाता है। कांसे के बर्तनों की आवाज और धुनुची नृत्य से पूरा माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।

इस दिन श्रद्धालुओं की दिनचर्या

सन्धि पूजा के दिन श्रद्धालुओं के नियम बहुत कड़े होते हैं। श्रद्धालु महाअष्टमी के दिन (18 अक्टूबर) से ही कठिन उपवास रखते हैं। कई लोग 19 अक्टूबर की सुबह सन्धि पूजा पूरी होने तक निर्जला या फलाहारी उपवास रखते हैं और पूजा संपन्न होने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं।चूंकि इस साल मुहूर्त सुबह का है, इसलिए सुबह 10:27 बजे से पहले ही लोग स्नान आदि कर नए वस्त्र पहनकर पंडालों में अंजलि (पुष्पांजलि) के लिए कतारों में खड़े हो जाएंगे। इस 48 मिनट के संधिकाल के दौरान बहुत से लोग मौन धारण कर लेते हैं और मन ही मन माता के नाम का सिमरन करते हैं।

सन्धि पूजा के सामाजिक और आध्यात्मिक पहलू

यह पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, इसके गहरे सामाजिक संदेश हैं। 108 दीपकों का जलाना इस बात का प्रतीक है कि चाहे अज्ञान और बुराई का अंधकार कितना भी घना क्यों न हो, ज्ञान और धर्म की एक छोटी सी लौ भी उसे मिटा सकती है।यह पर्व नारी शक्ति का सर्वोच्च रूप भी प्रदर्शित करता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो सन्धि पूजा हमारे भीतर छिपे काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे 'महिषासुरों' को मारने का सबसे सटीक समय है।

निष्कर्ष

सन्धि पूजा दुर्गा उत्सव की आत्मा है। वर्ष 2026 में सोमवार के दिन श्रवण नक्षत्र के पावन योग में आने वाली यह पूजा भक्तों के जीवन के सारे कष्टों को हरने वाली साबित होगी। यह हमें सिखाती है कि जीवन के सबसे कठिन और अंधकारमय दौर (संधिकाल) में ही धैर्य और शक्ति का संचय करके विजय प्राप्त की जा सकती है। यदि आप भी इस वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान किसी पंडाल में या घर पर रहें, तो 19 अक्टूबर की सुबह इस 48 मिनट के महामिलन का हिस्सा बनना कभी न भूलें।

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