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लोहड़ी

लोहड़ी : पंजाब का जीवंत और सांस्कृतिक महापर्व

लोहड़ी उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा का सबसे प्रसिद्ध, ऊर्जावान और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध त्योहार है। यह त्योहार केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आपसी भाईचारे, नई फसल के स्वागत, खुशियों और उल्लास का एक भव्य उत्सव है। कड़कड़ाती ठंड में अग्नि की गर्मी और ढोल की थाप पर भांगड़ा-गिद्धा करते लोग इस त्योहार की जीवंतता को दर्शाते हैं।

लोहड़ी क्या है और इसका क्या महत्व है?

लोहड़ी मुख्य रूप से एक फसल का त्योहार है। यह पर्व शीत ऋतु के समापन और वसंत ऋतु के आगमन का संदेश देता है।

  • फसल से जुड़ाव: इस समय किसानों के खेतों में गेहूं और सरसों की फसलें लहलहाने लगती हैं और गन्ने की कटाई शुरू हो जाती है। किसान अपनी अच्छी फसल और आने वाली समृद्धि के लिए ईश्वर और प्रकृति (विशेषकर सूर्य और अग्नि देव) के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व: 'लोहड़ी' शब्द की उत्पत्ति के पीछे कई मान्यताएँ हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह शब्द 'लोई' (संत कबीर की पत्नी) से आया है, तो कुछ इसे 'लोह' (लोहे का तवा, जिस पर रोटियां बनती हैं) से जोड़ते हैं। एक अन्य लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, यह शब्द तिल और रोड़ी (गुड़) के मेल 'तिलोहड़ी' से बना, जो बाद में बदलकर 'लोहड़ी' हो गया।

वर्ष 2026 में लोहड़ी: तिथि, मुहूर्त एवं ग्रह-नक्षत्र

वर्ष 2026 में लोहड़ी का पर्व बेहद खास और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ संयोगों के साथ आ रहा है। इस वर्ष के मुख्य मुहूर्त और ज्योतिषीय गणनाएँ निम्नलिखित हैं:

  • लोहड़ी की तिथि: इस साल लोहड़ी का त्योहार मंगलवार, 13 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।
  • लोहड़ी संक्रांति का क्षण: सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश यानी संक्रांति का मुख्य क्षण 14 जनवरी 2026 को दोपहर 03:13 PM पर होगा।
  • मकर संक्रांति: संक्रांति का पुण्यकाल और मुख्य पर्व बुधवार, 14 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।

वर्ष 2026 के विशेष ग्रह, नक्षत्र और तिथि संयोग:

  1. पंचांग व तिथि: 13 जनवरी 2026 को पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि रहेगी। लोहड़ी की रात साल की सबसे लंबी रातों में से एक होगी, जिसके अगले दिन सूर्य देव उत्तरायण की ओर बढ़ेंगे।
  2. शुभ नक्षत्र: इस दिन विशाखा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो धार्मिक कार्यों और समृद्धि के लिए बेहद शुभ माना जाता है।
  3. ग्रहों की स्थिति (गोचर): इस लोहड़ी पर सूर्य देव धनु राशि के अंतिम चरण में होंगे और अगले दिन मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस समय गुरु (बृहस्पति) और मंगल की शुभ स्थितियां खेतों में फसलों की उन्नति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाली मानी जा रही हैं।

लोहड़ी कैसे मनाई जाती है?

लोहड़ी मनाने का तरीका बेहद सामूहिक और आनंदमय होता है। इस दिन पूरा मोहल्ला या परिवार एक जगह इकट्ठा होता है।

दिन की तैयारियां

  • लोहड़ी मांगना: सुबह से ही बच्चे और युवा टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और लोहड़ी के पारंपरिक गीत गाकर 'लोहड़ी' (मूँगफली, गजक, रेवड़ी और पैसे) मांगते हैं। कोई भी घर इन बच्चों को खाली हाथ नहीं लौटाता।
  • अलाव की तैयारी: मोहल्ले के किसी खुले स्थान या घर के आंगन में सूखी लकड़ियां, उपले (गोबर के कंडे) इकट्ठा करके एक बड़ा ढेर बनाया जाता है।

शाम का जश्न

  • अलाव जलाना (Bonfire): सूरज ढलने के बाद पवित्र अग्नि जलाई जाती है। लोग इस अग्नि के चारों ओर चक्कर (परिक्रमा) लगाते हैं।
  • भांगड़ा और गिद्धा: ढोल की थाप पर पुरुष 'भांगड़ा' और महिलाएं 'गिद्धा' नृत्य करती हैं। पारंपरिक लोक गीतों से पूरा माहौल गूंज उठता है।

इस दिन हम क्या-क्या करते हैं?

लोहड़ी के दिन कुछ विशेष रीति-रिवाज और खान-पान की परंपराएं हैं जो इस प्रकार हैं:

  1. अग्नि को भोग लगाना: लोग अग्नि देव की परिक्रमा करते हुए उसमें तिल, गुड़, गजक, मूँगफली और मक्का के फूले (पॉपकॉर्न) अर्पित करते हैं। ऐसा करते समय लोग "आदर आए, दलिदर जाए" (घर में समृद्धि आए और दरिद्रता दूर हो) बोलते हैं।
  2. पारंपरिक पकवान: लोहड़ी के दिन विशेष रूप से मक्के की रोटी और सरसों का साग बनाया और खाया जाता है। इसके अलावा, गन्ने के रस की खीर (रॉह की खीर) भी बनाई जाती है।
  3. तिल-गुड़ का सेवन: इस दिन तिल और गुड़ खाना बेहद शुभ और स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है, क्योंकि यह सर्दियों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।

लोहड़ी की पूजन विधि

लोहड़ी की पूजा प्रकृति और अग्नि देव को समर्पित होती है। इसकी सरल और पारंपरिक पूजन विधि निम्नलिखित है:

1.स्थान की सफाई: शाम के समय घर के आंगन या खुली जगह को साफ करके वहां मिट्टी या ईंटों से एक घेरा बनाएं।
2.अग्नि की स्थापना: घेरे के बीच में लकड़ी और कर्पूर रखकर अग्नि प्रज्वलित करें।
3.पूजा सामग्री: एक थाली में मूँगफली, रेवड़ी, गजक, मक्का के दाने, तिल और गुड़ रखें।
4.अर्घ्य और परिक्रमा: जलते हुए अलाव में इन सभी सामग्रियों को मुट्ठी में लेकर अर्पित करें। वर्ष 2026 के शुभ नक्षत्रों का ध्यान करते हुए अग्नि देव की कम से कम 3 या 7 बार परिक्रमा करें।
5.प्रार्थना: परिवार की सुख-शांति, अच्छी सेहत और समृद्धि की कामना करें।
6.प्रसाद वितरण: पूजा संपन्न होने के बाद उपस्थित सभी लोगों में तिल, गजक और मूँगफली का प्रसाद बांटें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

लोहड़ी से जुड़ी पौराणिक और लोक कथाएं

लोहड़ी के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं, जिनमें से दो सबसे प्रमुख हैं:

क) दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी का त्योहार दुल्ला भट्टी के जिक्र के बिना अधूरा है। दुल्ला भट्टी मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब में रहने वाले एक राजपूत नायक थे। उन्हें "पंजाब का रॉबिनहुड" भी कहा जाता है।

कथा: उस दौर में क्रूर अमीर लोग गरीब लड़कियों को अगवा करके उन्हें गुलाम या बाजार में बेच देते थे। दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को मुगलों के चंगुल से छुड़ाया, बल्कि हिंदू रीति-रिवाज से उनका विवाह भी कराया। उन्होंने 'सुंदरी' और 'मुंदरी' नाम की दो अनाथ लड़कियों को अपनी बेटी मानकर उनका कन्यादान किया था। इसी वजह से आज भी लोहड़ी पर बच्चे यह गीत गाते हैं:
"सुंदर मुंदरिये हो! तेरा कौन विचारा हो! दुल्ला भट्टी वाला हो!..."

ख) सती और राजा दक्ष की कहानी
एक पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती बिना बुलाए वहां पहुंच गईं, जहां राजा दक्ष ने भगवान शिव का घोर अपमान किया। इस अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ की पवित्र अग्नि में आत्मदाह कर लिया। माना जाता है कि उसी प्रायश्चित की अग्नि की याद में लोहड़ी जलाई जाती है।

त्योहार के अन्य विशेष पहलू

लोहड़ी सिर्फ एक सामान्य त्योहार नहीं है, इसके कुछ बेहद खास सामाजिक और पारिवारिक पहलू भी हैं:

  • 'नयी दुल्हन' की पहली लोहड़ी: जिस घर में नई शादी हुई होती है, वहां लोहड़ी का जश्न दोगुना हो जाता है। नई दुल्हन को नए कपड़े और गहने पहनाए जाते हैं। ससुराल और मायके पक्ष के लोग उसे ढेर सारे उपहार और आशीर्वाद देते हैं।
  • 'नवजात शिशु' की पहली लोहड़ी: परिवार में बच्चे के जन्म (विशेषकर पहले बच्चे) के बाद आने वाली पहली लोहड़ी बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। बच्चे की मां को गोद में बैठाकर उपहार दिए जाते हैं और बच्चे को शगुन दिया जाता है।
  • पतंगबाजी: पंजाब के कुछ हिस्सों और पड़ोसी राज्यों में लोहड़ी के दिन आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सज जाता है। छतों पर पतंगबाजी का भरपूर आनंद लिया जाता है।

निष्कर्ष

लोहड़ी का त्योहार हमें प्रकृति से जुड़ने, सर्दियों की सुस्ती को छोड़कर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने और आपसी मतभेदों को भुलाकर एक साथ खुशियां मनाने का संदेश देता है। वर्ष 2026 में विशाखा नक्षत्र और उत्तम ग्रह गोचर के शुभ संयोग में मनाई जाने वाली यह लोहड़ी सभी के जीवन में समृद्धि लाए। अग्नि की लपटें नकारात्मकता को जलाने का और तिल-गुड़ की मिठास रिश्तों में प्रेम घोलने का प्रतीक है। आधुनिक समय में भी इस त्योहार की प्रासंगिकता और रौनक रत्ती भर कम नहीं हुई है।

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