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जानकी जयंती

जानकी जयंती: पावन प्राकट्य उत्सव

जानकी जयंती सनातन धर्म में मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन जगतजननी, शक्ति, त्याग और पतिव्रत धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ति माता सीता (जानकी) के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, माता सीता का जन्म किसी गर्भ से नहीं हुआ था, बल्कि वे भूमि से प्रकट हुई थीं। इसी कारण उन्हें 'भूमिपुत्री' या 'अवनीसुता' भी कहा जाता है।

यह त्योहार केवल एक पौराणिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, सहनशीलता, पवित्रता और आदर्श जीवन मूल्यों के सम्मान का पर्व है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा और सुयोग्य वर पाने के लिए माता जानकी की विशेष आराधना करती हैं।

जानकी जयंती तिथि एवं शुभ मुहूर्त 

हिंदू पंचांग के अनुसार, जानकी जयंती प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व आमतौर पर फरवरी या मार्च के महीने में आता है। इस दिन को देश के कुछ हिस्सों में सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।

वर्ष 2026 में जानकी जयंती 9 फरवरी, सोमवार को मनाई जा रही है। इस वर्ष के सटीक मुहूर्त और तिथियों का विवरण इस प्रकार है:

  • जानकी जयन्ती तिथि: सोमवार, फरवरी 9, 2026
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ: फरवरी 09, 2026 को 05:01 AM बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: फरवरी 10, 2026 को 07:27 AM बजे
  • व्रत के लिए मुख्य समय: 9 फरवरी को पूरे दिन अष्टमी तिथि व्याप्त रहेगी, अतः इसी दिन व्रत और पूजन का विधान सर्वोत्तम है। सोमवार का दिन होने के कारण इस बार माता जानकी और भगवान शिव-पार्वती की कृपा का एक अद्भुत संयोग भी बन रहा है।

विशेष नोट: अक्सर लोग 'जानकी जयंती' (सीता अष्टमी) और 'सीता नवमी' को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। फाल्गुन कृष्ण अष्टमी को माता सीता का प्राकट्य दिवस (जानकी जयंती) माना जाता है, जबकि वैशाख शुक्ल नवमी को 'सीता नवमी' के रूप में मनाया जाता है, जो उनके मिथिला में प्रकट होने की एक अन्य लोक मान्यता और तिथि गणना से जुड़ा है।

वर्ष 2026 के विशेष ग्रह, नक्षत्र और गोचर योग

9 फरवरी 2026 को होने वाला माता जानकी का प्राकट्य उत्सव ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी बेहद खास और कल्याणकारी संयोग लेकर आ रहा है। इस दिन आकाश मंडल में निम्नलिखित प्रमुख ग्रह-नक्षत्र स्थितियां बन रही हैं:

  1. स्वाति नक्षत्र का प्रभाव: ज्योतिष गणना के अनुसार, इस दिन स्वाति नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसका स्वामी 'राहु' है और अधिपति देवता 'वायु' (पवन देव) हैं। पवनपुत्र हनुमान जी माता सीता के परम भक्त हैं, अतः स्वाति नक्षत्र में माता जानकी की पूजा करने से हनुमान जी और प्रभु श्री राम की असीम कृपा बहुत शीघ्र प्राप्त होती है।
  2. तुला राशि में चंद्रमा: इस दिन चंद्रमा शुक्र की राशि 'तुला' में संचरण करेंगे। तुला राशि संतुलन, न्याय और सौंदर्य की प्रतीक है, जो माता सीता के सौम्य और मर्यादित चरित्र को दर्शाती है। चंद्रमा का यह गोचर मानसिक शांति और सुख-समृद्धि देने वाला है।
  3. बृहस्पति (गुरु) का प्रभाव: इस समय देवगुरु बृहस्पति अपनी अनुकूल स्थिति में रहकर पूजा-पाठ और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के पुण्य फल को कई गुना बढ़ा रहे हैं।
  4. सोमवार का शुभ संयोग: सोमवार का दिन चंद्र देव और भगवान शिव का दिन माना जाता है। माता सीता ने स्वयं श्री राम को वर रूप में पाने के लिए माता पार्वती (गौरी पूजन) की आराधना की थी। सोमवार के दिन जानकी जयंती का आना सुहागिनों और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष रूप से सौभाग्यशाली माना जा रहा है।

इस दिन हम क्या करते हैं?

जानकी जयंती के दिन श्रद्धालु शारीरिक और मानसिक शुद्धि के साथ अपने दिन की शुरुआत करते हैं। इस दिन मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:

  • व्रत और उपवास: महिलाएं पूरे दिन का कठिन व्रत रखती हैं। कुछ महिलाएं निराहार (बिना भोजन के) और निर्जला (बिना पानी के) व्रत भी रखती हैं।
  • पूजा-अर्चाना: माता सीता और भगवान श्री राम की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है।
  • दान-पुण्य: इस दिन ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज, वस्त्र और श्रृंगार की सामग्री दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • कीर्तन और पाठ: शाम के समय घरों और मंदिरों में सुंदरकांड, रामायण की चौपाइयों और सीता माता के भजनों का गान किया जाता है।

जानकी जयंती की प्राकट्य कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मिथिला देश (जो वर्तमान में बिहार और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में है) में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। कई वर्षों तक वर्षा न होने के कारण धरती सूख गई, नदियां सूख गईं और प्रजा भूखों मरने लगी। राजा जनक, जो एक परम ज्ञानी और ऋषि-तुल्य राजा थे, अपनी प्रजा के दुख से अत्यंत व्याकुल हो उठे। ऋषियों और ज्योतिषियों की सलाह पर राजा जनक ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए एक विशेष यज्ञ का संपादन किया। यज्ञ के नियमों के अनुसार, राजा जनक को स्वयं सोने के हल से खेत जोतना था। जब राजा जनक मिथिला के एक क्षेत्र (जिसे अब सीतामढ़ी कहा जाता है) में हल चला रहे थे, तब अचानक उनका हल जमीन के भीतर किसी कठोर वस्तु से टकराकर रुक गया।

जब उस स्थान को खोदा गया, तो वहां से एक सुंदर नक्काशीदार कलश (घड़ा) निकला। उस कलश को जब खोला गया, तो राजा जनक और वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। उस कलश के भीतर एक अत्यंत दिव्य, तेजस्वी और सुंदर नवजात कन्या मुस्कुरा रही थी। चूंकि हल के अग्रभाग को 'सीत' कहा जाता है, इसलिए हल से टकराकर प्रकट होने के कारण उस कन्या का नाम 'सीता' रखा गया। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस कन्या को ईश्वर का आशीर्वाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में गोद ले लिया और उनका नाम अपनी नगरी के नाम पर 'जानकी' और 'मैथिली' भी रखा। जैसे ही माता सीता का प्राकट्य हुआ, मिथिला में मूसलाधार वर्षा हुई और अकाल का अंत हो गया।

पूजन विधि और अनुष्ठान

जानकी जयंती की पूजा पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ की जाती है। यदि आप घर पर पूजा कर रहे हैं, तो इस प्रवाह-क्रम का पालन करें:

[प्रातः काल स्नान] ➔ [व्रत का संकल्प] ➔ [चौकी की स्थापना] ➔ [पंचामृत अभिषेक] ➔ [श्रृंगार व भोग] ➔ [आरती व क्षमा याचना]

1. पूर्व तैयारी और संकल्प
सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले या लाल रंग के) धारण करें। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर माता सीता और भगवान राम का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

2. पूजा स्थल की स्थापना
घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूजा घर में एक साफ चौकी बिछाएं। उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। चौकी पर भगवान राम और माता सीता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान गणेश और लक्ष्मण जी की मूर्ति भी रखें।

3. अभिषेक और श्रृंगार
मूर्तियों पर गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) छिड़क कर उन्हें स्नान कराएं। इसके बाद माता सीता को सुहाग की सामग्री जैसे- सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी, काजल और लाल चुनरी अर्पित करें। भगवान राम को पीला चंदन और पीले वस्त्र अर्पित करें।

4. भोग और आरती
पूजा में पीले फूल, फल, धूप, और दीप जलाएं। माता जानकी को विशेष रूप से सुहागी (एक प्रकार का पकवान) या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं। इसके बाद 'श्री रामचरितमानस' के बालकांड का पाठ करें या सीता माता की आरती गाएं।

विभिन्न क्षेत्रों में उत्सव और उल्लास

भारत के अलग-अलग हिस्सों और क्षेत्रों में जानकी जयंती (सीता अष्टमी) को बेहद अनूठे, सांस्कृतिक और भव्य तरीके से मनाया जाता है।

  • मिथिला क्षेत्र (बिहार और नेपाल सीमा): माता सीता के मायके यानी मिथिला में इस दिन का उत्साह देखते ही बनता है। यहाँ के लोग माता सीता को अपनी बेटी मानते हैं, इसलिए इस पर्व को एक बेटी के जन्म उत्सव के रूप में बेहद लाड़-प्यार से मनाया जाता है। घरों को खूबसूरत पारंपरिक रंगोली (अल्पना) से सजाया जाता है। महिलाएं एकत्रित होकर ढोलक की थाप पर पारंपरिक मैथिली लोकगीत गाती हैं।
  • अयोध्या और उत्तर भारत: माता सीता के ससुराल यानी अयोध्या और पूरे उत्तर भारत में इस पर्व को बहू के आगमन और साक्षात लक्ष्मी के प्राकट्य के रूप में बहुत भव्य तरीके से मनाया जाता है। अयोध्या के प्रसिद्ध कनक भवन मंदिर सहित सभी प्रमुख राम मंदिरों में इस दिन विशेष उत्सव का माहौल होता है। मंदिरों में प्रभु श्री राम और माता जानकी का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है और 'बधाई गान' गाए जाते हैं।
  • दक्षिण भारत: इसके विपरीत, दक्षिण भारत के राज्यों में इस त्योहार को मनाने का एक अलग और बेहद दर्शनीय तरीका है। वहाँ के प्रमुख विष्णु और राम मंदिरों में इस दिन विशेष रूप से 'सीता कल्याणम' का आयोजन किया जाता है। 'सीता कल्याणम' का अर्थ है माता सीता और भगवान श्री राम का सांकेतिक विवाह। इस भव्य विवाह उत्सव को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।

इस पर्व का सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व

जानकी जयंती का आध्यात्मिक महत्व गहरा है। माता सीता को साक्षात महालक्ष्मी का अवतार माना गया है। उनकी पूजा करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और अन्न-धन के भंडार भरे रहते हैं।

सामाजिक दृष्टिकोण से, माता सीता का जीवन हर युग की नारी के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने महलों के ऐशो-आराम को त्यागकर पति के साथ 14 वर्षों का वनवास चुना, जो उनके कर्तव्यबोध को दर्शाता है। रावण की कैद में रहकर भी उन्होंने अपनी पवित्रता और मर्यादा को अक्षुण्ण रखा, जो उनकी मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है। यह पर्व समाज को नारी शक्ति के प्रति सम्मान रखने और कठिन परिस्थितियों में भी अपने धर्म व मर्यादा पर अडिग रहने का संदेश देता है।

व्रत के नियम और सावधानियां

यदि आप जानकी जयंती का व्रत रख रहे हैं, तो कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:

1.सात्विकता: इस दिन पूरी तरह से सात्विक रहें। घर में प्याज, लहसुन या तामसिक भोजन न बनाएं।
2.क्रोध का त्याग: व्रत के दौरान किसी पर गुस्सा न करें, न ही किसी की चुगली या बुराई करें। अपना पूरा समय मंत्र जाप में बिताएं।
3.फलाहार: यदि आप पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, तो शाम की पूजा के बाद दूध, फल या कुट्टू/सिंघाड़े के आटे का फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
4.अखंड सौभाग्य का दान: पूजा के बाद सुहाग की सामग्री को किसी सुहागिन महिला या ब्राह्मण महिला को दान करना न भूलें, इससे व्रत पूर्ण माना जाता है।

कल्याणकारी मंत्र

  'ॐ श्री सीतायै नमः'
'श्री जानकी रामाभ्यां नमः

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