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देव दिवाली

देव दीपावली: देवताओं की दीवाली और महा-महोत्सव

भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर उत्सव के पीछे गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व छुपा होता है। इन्हीं महापर्वों में से एक है देव दीपावली। जहाँ कार्तिक अमावस्या को मनुष्य दीप जलाकर 'दीपावली' मनाते हैं, वहीं ठीक 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण अपनी दिवाली मनाने धरती पर उतरते हैं। यह उत्सव विशेष रूप से भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) में अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।

वर्ष 2026 में देव दीपावली तिथि, मुहूर्त एवं ग्रह-नक्षत्र संयोग

वर्ष 2026 की देव दीपावली अत्यंत विशेष है क्योंकि इस दिन कई दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग और शुभ नक्षत्रों का मिलन हो रहा है, जो इस महापर्व की महत्ता को कई गुना बढ़ा रहे हैं।

शुभ मुहूर्त और तिथियाँ (2026)

  • देव दीपावली तिथि: मंगलवार, 24 नवम्बर 2026
  • प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त: शाम 05:08 PM से रात 07:47 PM तक
  • कुल अवधि: 02 घण्टे 39 मिनट्स
  • पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 23 नवम्बर 2026 को रात 11:42 PM बजे से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 नवम्बर 2026 को रात 08:23 PM बजे तक

2026 के विशेष ग्रह-नक्षत्र और ज्योतिषीय संयोग

  1. कृतिका नक्षत्र और वृषभ राशि का महासंयोग: इस वर्ष 24 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गोचर करेंगे और कृतिका नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों में कृतिका नक्षत्र से युक्त कार्तिक पूर्णिमा को महा-कार्तिकी कहा जाता है, जिसमें किया गया दीपदान अक्षुण्ण फल देता है।
  2. मंगलवार का विशेष महत्व: इस वर्ष यह पर्व मंगलवार को पड़ रहा है। शिव-पुत्र और देवताओं के सेनापति स्वामी कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था और उनका संबंध मंगल ग्रह व कृतिका नक्षत्र (जिसके स्वामी अग्नि हैं) से है। इसलिए इस बार कार्तिकेय जी की पूजा का फल अनंत गुना होगा।

देव दीपावली क्या है?

देव दीपावली का सरल शब्दों में अर्थ है—"देवताओं की दीपावली"। हिंदू सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन स्वर्ग से सभी देवी-देवता अदृश्य रूप में वाराणसी के पवित्र घाटों पर पधारते हैं और गंगा नदी के तट पर दीप जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि अंधकार पर प्रकाश की और अधर्म पर धर्म की विजय का विराट प्रतीक है। इस दिन पूरी काशी नगरी, विशेषकर गंगा के 84 घाट, लाखों दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं।

देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

इस महापर्व को मनाए जाने के पीछे कई अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं:

  1. त्रिपुरासुर वध की कथा (भगवान शिव बने त्रिपुरारी)
    प्राचीन काल में तारकासुर के तीन पुत्रों (तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली) ने ब्रह्मा जी से चालाकी से वरदान माँगा कि वे तीन अलग-अलग नगरों में रहेंगे जो अंतरिक्ष में तैरते रहेंगे। ये तीनों नगर साल में केवल एक बार, कुछ ही क्षणों के लिए एक सीधी रेखा में आएँगे, और यदि कोई एक ही बाण से तीनों नगरों को नष्ट कर सके, तभी उनकी मृत्यु होगी।इस अजेयता के घमंड में उन्होंने तीनों लोकों पर आतंक मचा दिया। तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान शिव ने एक दिव्य रथ तैयार किया और कार्तिक पूर्णिमा के दिन जैसे ही वे तीनों असुर नगरी एक सीधी रेखा में आईं, भोलेनाथ ने एक ही अचूक बाण से त्रिपुरासुर का अंत कर दिया। इस खुशी में सभी देवी-देवता काशी आए और दीप जलाकर विजय का उत्सव मनाया।
  2. भगवान विष्णु का मत्स्यावतार
    एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने संसार को प्रलय से बचाने और वेदों की रक्षा करने के लिए अपना पहला अवतार— मत्स्यावतार लिया था और शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था।
  3. कार्तिकेय जी का जन्मोत्सव
    शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र, देवताओं के सेनापति स्वामी कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था। जैसा कि ऊपर बताया गया है, वर्ष 2026 में कृतिका नक्षत्र और मंगलवार का जो योग बन रहा है, वह कार्तिकेय जी के जन्मोत्सव के इस प्रसंग को इस साल और भी अधिक प्रासंगिक और फलदायी बनाता है।

देव दीपावली कैसे मनाई जाती है?

यूँ तो देव दीपावली पूरे देश में मनाई जाती है, लेकिन इसका असली वैभव केवल काशी में ही देखने को मिलता है:

  • पवित्र गंगा स्नान और संकल्प: 24 नवम्बर 2026 की सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही लाखों श्रद्धालु गंगा नदी में डुबकी लगाएंगे। कृतिका नक्षत्र होने के कारण इस दिन स्नान-दान का महत्व और बढ़ जाता है।
  • घाटों की अभूतपूर्व सजावट और दीपदान: शाम 05:08 PM से शुरू होने वाले प्रदोष काल मुहूर्त में वाराणसी के सभी 84 घाट लाखों मिट्टी के दीयों से जगमगा उठेंगे। घाटों पर ॐ, स्वास्तिक और त्रिशूल जैसी भव्य रंगोलियां बनाई जाती हैं।
  • महा आरती और आकाश दीप: दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट पर दर्जनों विद्वान पुजारी पारंपरिक वेशभूषा में महा आरती करेंगे। डमरू और शंखनाद से पूरी काशी गूंज उठेगी। साथ ही पूर्वजों के मार्ग को आलोकित करने के लिए 'आकाशदीप' जलाए जाते हैं।
  • चेत सिंह घाट पर लेज़र शो: आधुनिक तकनीक के मेल से ऐतिहासिक चेत सिंह घाट पर भव्य लेज़र लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया जाएगा, जिसमें शिव महिमा और देव दीपावली के इतिहास को दर्शाया जाएगा।

उत्सव के अन्य महत्वपूर्ण पहलू

  1. सांस्कृतिक संगम: इस अवसर पर उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा संगीत और नृत्य के बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जहाँ देश-विदेश के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
  2. शहीदों को नमन: काशी के घाटों पर "अमर जवान ज्योति" की अनुकृति बनाकर देश के वीर शहीदों को 'दीप-अंजलि' दी जाती है, जिससे धार्मिक उत्सव में राष्ट्रभक्ति का अद्भुत रंग घुल जाता है।
  3. वैश्विक आकर्षण और पर्यावरण: आज यह एक वैश्विक उत्सव बन चुका है, जिसे देखने दुनिया भर से पर्यटक आते हैं। वर्तमान समय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता दिखाते हुए लोग केवल मिट्टी के दीयों और शुद्ध तेल/घी का ही उपयोग करते हैं।

निष्कर्ष

देव दीपावली भारतीय संस्कृति की उस महान सोच का प्रतीक है जो कहती है—"तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलो)। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीत हमेशा सच्चाई और धर्म की ही होती है। वर्ष 2026 में मंगलवार, वृषभ राशि के चंद्रमा और कृतिका नक्षत्र के महासंयोग में आने वाली यह देव दीपावली इंसानों की श्रद्धा और देवताओं के आशीर्वाद का एक ऐसा अलौकिक दृश्य रचेगी जो सीधे आत्मा को छू लेने वाला होगा।

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