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चित्रगुप्त पूजा

सनातन धर्म में अनेक ऐसे त्योहार और व्रत हैं जो मनुष्य को उसके कर्मों के प्रति सचेत करते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट त्योहार है चित्रगुप्त पूजा। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे कर्मों के लेखा-जोखा के प्रति कृतज्ञता और शुचिता का प्रतीक है।भगवान चित्रगुप्त को कायस्थ समाज का जनक और आराध्य देव माना जाता है, लेकिन उनकी महिमा संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त है क्योंकि वे ब्रह्मांड के प्रथम 'सच्चे एकाउंटेंट' (लेखाकार) हैं। वर्ष 2026 में यह पर्व कई विशेष और दुर्लभ ज्योतिषीय संयोगों के साथ आ रहा है।

चित्रगुप्त पूजा क्या है?

चित्रगुप्त पूजा भगवान चित्रगुप्त को समर्पित एक विशेष त्योहार है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान चित्रगुप्त ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से उत्पन्न हुए थे, जिसके कारण उनके वंशज कायस्थ कहलाए।

भगवान चित्रगुप्त यमराज के परम सहयोगी और यमलोक के मुख्य न्यायाधीश हैं। उनका मुख्य कार्य मनुष्यों के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा अपनी पुस्तक'अग्रसन्धानी' में रखना है। मृत्यु के पश्चात जब आत्मा यमराज के दरबार में पहुँचती है, तब चित्रगुप्त जी महाराज ही अपने बही-खाते के आधार पर न्याय करते हैं कि उस आत्मा को स्वर्ग मिलेगा या नरक।

इस दिन मुख्य रूप से लेखनी (कलम), दवात (स्याही) और बही-खाते (पुस्तकों) की पूजा की जाती है। इसलिए इसे 'कलम-दवात पूजा' भी कहा जाता है।

वर्ष 2026 में कब है चित्रगुप्त पूजा?

साल 2026 में दीपावली के बाद आने वाली भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा की तिथियों को लेकर एक विशेष संयोग बन रहा है। इस वर्ष यह पूजा 11 नवंबर 2026, बुधवार के दिन मनाई जाएगी।

  • पूजा के सटीक मुहूर्त: चित्रगुप्त पूजा (बुधवार, नवम्बर 11, 2026): अपराह्न मुहूर्त 01:10 पी एम से 03:20 पी एम तक रहेगा।
  • कुल अवधि: 02 घण्टे 10 मिनट्स।
  • यम द्वितीया (बुधवार, नवम्बर 11, 2026): इस दिन भाई-बहन के स्नेह का पर्व भी मनाया जाएगा।
  • द्वितीया तिथि प्रारम्भ: नवम्बर 10, 2026 को 02:00 पी एम बजे से।
  • द्वितीया तिथि समाप्त: नवम्बर 11, 2026 को 03:53 पी एम बजे तक।

विशेष नोट: चूंकि द्वितीया तिथि का समापन 11 नवंबर को दोपहर 03:53 पी एम पर हो रहा है, इसलिए उदयातिथि और अपराह्न काल की उपलब्धता के अनुसार बुधवार, 11 नवंबर को ही चित्रगुप्त पूजा का महापर्व मनाना सर्वथा शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ है।

वर्ष 2026 के महत्वपूर्ण ग्रह, नक्षत्र और ज्योतिषीय गणना

इस वर्ष 11 नवंबर 2026 को बनने वाले ग्रह-नक्षत्रों के संयोग बेहद शुभ और समृद्धि प्रदायक हैं, जो इस पूजा की फलश्रुति को कई गुना बढ़ा देते हैं:

  1. वार का विशेष संयोग: यह पूजा इस बार बुधवार के दिन पड़ रही है। ज्योतिष शास्त्र में बुधवार के स्वामी बुध ग्रह हैं, जिन्हें बुद्धि, लेखन, व्यापार, गणना (अकाउंटिंग) और तर्कशक्ति का कारक माना जाता है। भगवान चित्रगुप्त स्वयं बुद्धि और बही-खाते के देव हैं, इसलिए बुधवार के दिन उनकी पूजा होना अत्यंत दुर्लभ और सर्वोत्तम फल देने वाला है।
  2. नक्षत्र स्थिति: इस दिन सूर्योदय के समय अनुराधा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसके स्वामी शनि देव (न्याय के देवता) हैं। इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का आगमन होगा, जिसके स्वामी पुनः बुध ग्रह हैं। यह नक्षत्र परिवर्तन गणना, लेखन और न्यायिक कार्यों से जुड़े लोगों के लिए बेहद प्रगतिशील साबित होगा।
  3. चंद्रमा और सूर्य की स्थिति: इस दिन चंद्रमा वृश्चिक राशि में गोचर करेंगे और सूर्य देव तुला राशि में (स्वाति/विशाखा नक्षत्र के प्रभाव में) मौजूद रहेंगे। सूर्य और बुध का यह गोचर जातकों को बौद्धिक क्षमता और अटके हुए कार्यों को पूरा करने का आत्मबल प्रदान करेगा।

व्यावहारिक दृष्टिकोण

सनातन परंपरा में कार्तिक द्वितीया का दिन नववर्ष के व्यावसायिक खातों की शुरुआत का प्रतीक भी है। व्यापारी और बुद्धिजीवी इस दिन से अपने नए बही-खातों की शुरुआत करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन और व्यापार में न्याय, सत्य और बुद्धि का वास हो।

चित्रगुप्त पूजा का पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व

भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति की कथा अत्यंत दिव्य है। धर्मग्रंथों के अनुसार, जब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया और देव-दानव, मनुष्य, गंधर्व आदि को उनके कर्मों के अनुसार फल देने के लिए यमराज को नियुक्त किया, तो यमराज असमंजस में पड़ गए। संपूर्ण ब्रह्मांड के अरबों जीवों के कर्मों का रिकॉर्ड अकेले याद रखना असंभव था।

यमराज ने ब्रह्मा जी से एक ऐसे सहयोगी की मांग की जो अत्यंत बुद्धिमान हो, जिसकी स्मरण शक्ति अचूक हो और जो लेखन कला में निपुण हो। तब ब्रह्मा जी 11,000 वर्षों की कठिन समाधि में लीन हो गए। जब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, तो उनके सामने हाथ में कलम, दवात और तलवार लिए एक प्रतापी पुरुष खड़ा था।

चूंकि वह पुरुष ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुआ था, इसलिए ब्रह्मा जी ने उन्हें 'कायस्थ' नाम दिया और उनका नाम 'चित्रगुप्त' (जो गुप्त चित्रों या कर्मों को देख सके) रखा। भगवान चित्रगुप्त को मनुष्यों के पाप-पुण्य का हिसाब रखने का अधिकार सौंपा गया।

भगवान चित्रगुप्त से जुड़ी पौराणिक कथाएं

चित्रगुप्त पूजा के संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से दो सबसे प्रमुख हैं:

  • राजा सौदास की कथा
    प्राचीन काल में सौदास नाम का एक अत्यंत क्रूर, अधर्मी और अत्याचारी राजा था। उसने अपने जीवन में कभी कोई पुण्य कार्य नहीं किया था। एक बार वह शिकार करते हुए जंगल में भटक गया। वहां उसने देखा कि कुछ लोग नदी किनारे बैठकर श्रद्धापूर्वक किसी की पूजा कर रहे हैं।राजा ने कौतूहलवश पास जाकर पूछा कि वे किसकी पूजा कर रहे हैं। तब वहां उपस्थित लोगों ने बताया कि वे भगवान चित्रगुप्त की पूजा कर रहे हैं, जो मनुष्यों के कर्मों का हिसाब रखते हैं और जिनकी कृपा से नरक के दुखों से मुक्ति मिलती है। राजा सौदास ने भी उत्सुकतावश वहीं बैठकर अनजाने में ही सही, लेकिन पूरी श्रद्धा के साथ चित्रगुप्त जी की पूजा की और व्रत रखा। कुछ समय बाद जब राजा सौदास की मृत्यु हुई, तो यमदूत उसकी आत्मा को जंजीरों में जकड़कर यमराज के दरबार में ले गए। क्रूर कर्मों के कारण यमराज ने उसे भयानक नरक में भेजने का आदेश दिया। तभी भगवान चित्रगुप्त ने अपना बही-खाता खोला और कहा—"हे यमराज! इस राजा ने भले ही जीवन भर पाप किए हों, लेकिन इसने कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन मेरी पूरी विधि-विधान से पूजा की थी। शास्त्रानुसार, जो भी इस दिन मेरी पूजा करता है, उसे नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है।"* चित्रगुप्त जी के वचन सुनकर यमराज ने राजा सौदास को नरक के बजाय स्वर्ग भेज दिया।
  • यम द्वितीया और भाई-बहन का प्रेम
    यह कथा यमुना और उनके भाई यमराज से जुड़ी है। माना जाता है कि इसी दिन यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया था। यमराज के साथ उनके मुख्य सहयोगी चित्रगुप्त जी भी गए थे। यमुना के सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया था कि जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर भोजन करेगा और यमुना में स्नान करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। चूंकि चित्रगुप्त जी इस पूरी प्रक्रिया और न्याय के साक्षी थे, इसलिए इस दिन भाई-दूज के साथ चित्रगुप्त पूजा का भी विशेष संयोग बनता है।

संपूर्ण पूजन विधि

चित्रगुप्त पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा की तैयारी निम्नलिखित चरणों में की जाती है:

आवश्यक सामग्री - भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या मूर्ति , एक साफ चौकी और लाल या पीला कपड़ा , कलश, आम के पत्ते, नारियल , कलम (पेन), नई डायरी या सफेद कागज , दवात (स्याही) या रोली , धूप, दीप, अगरबत्ती, कपूर , गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) , फल, फूल, मिठाई (विशेषकर पंचमेवा और सफेद मिठाई) , पान, सुपारी, अक्षत (बिना टूटे चावल)

पूजा की चरणबद्ध विधि

चौकी की स्थापना ->कलश स्थापना -> भगवान का आह्वान -> कलम-दवात का पूजन -> सादे कागज पर लेखन ->भोग व प्रार्थना

1.स्थान शुद्धिकरण और स्थापना: सबसे पहले पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़कें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान गणेश की मूर्ति भी रखें।
2.कलश स्थापना: चौकी के पास चावल की ढेरी बनाकर उस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और उस पर नारियल रखें।
3.संकल्प और दीप प्रज्वलन: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पूजा का संकल्प लें और घी का दीपक जलाएं। सबसे पहले प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा करें।
4.भगवान चित्रगुप्त का पूजन: चित्रगुप्त जी को चंदन, रोली, अक्षत, फूल और माला अर्पित करें। उन्हें पंचामृत और जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं (यदि मूर्ति धातु की हो)। इसके बाद उन्हें फल और मिठाइयों का भोग लगाएं।
5.कलम और दवात की पूजा: अपनी नई कलम, डायरी या सफेद कागज को भगवान चित्रगुप्त के चरणों में रखें। कलम पर रोली लगाएं और कलावा (मौली) बांधें।
6.चित्रगुप्त प्रार्थना मंत्र का जाप: पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्र का कम से कम 11 या 108 बार जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्। लेखनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्।।

अर्थ: हाथ में दवात, लेखनी और पट्टी (कागज/पाटी) धारण करने वाले, महाबली भगवान चित्रगुप्त को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।

'लिखनी' या कागज पर लिखने की विशेष परंपरा

चित्रगुप्त पूजा की सबसे अनोखी और मुख्य रस्म है कागज पर लिखना। इस दिन परिवार के सभी सदस्य (विशेषकर पुरुष और बच्चे) एक सफेद कागज पर अपनी कलम से कुछ विशेष चीजें लिखते हैं।

कागज पर क्या लिखा जाता है?

  1. सबसे ऊपर "ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः" या "श्री गणेशाय नमः" लिखा जाता है।
  2. इसके बाद अपने आराध्य देवों के नाम (जैसे राम, कृष्ण, शिव आदि) लिखे जाते हैं।
  3. फिर एक कोने में धन, धान्य और समृद्धि का प्रतीक 'स्वास्तिक' का चिन्ह बनाया जाता है।
  4. इसके बाद परिवार के मुखिया अपने पिछले वर्ष के आय-व्यय (कमर्शियल और घरेलू) का संक्षिप्त विवरण लिखते हैं और नए वर्ष में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
  5. अंत में अपना नाम, हस्ताक्षर और तिथि (जैसे- 11/11/2026) लिखी जाती है।

इस कागज को भगवान चित्रगुप्त के चरणों में समर्पित कर दिया जाता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि हम अपने कर्मों को भगवान के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ रख रहे हैं और उनसे प्रार्थना कर रहे हैं कि वे हमारी भूल-चूक को क्षमा करें।

चित्रगुप्त पूजा के विभिन्न आयाम

यह पर्व केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, इसके कई सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक आयाम भी हैं:

  • सामाजिक एकता और कायस्थ समाज
    यद्यपि भगवान चित्रगुप्त सार्वभौमिक हैं, लेकिन कायस्थ समुदाय (जैसे श्रीवास्तव, सक्सेना, माथुर, भटनागर, निगम, अस्थाना, कुलश्रेष्ठ आदि) के लिए यह वर्ष का सबसे बड़ा त्योहार होता है। इस दिन देश में बड़े पैमाने पर सामूहिक पूजा समारोहों का आयोजन किया जाता है। यह दिन समाज के लोगों को एक सूत्र में पिरोने, आपसी मतभेद मिटाने और एक-दूसरे की सहायता करने का संकल्प लेने का माध्यम बनता है।
  • शिक्षा और ज्ञान का सम्मान
    यह दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा त्योहार है जहां हथियारों या भौतिक संपदा की जगह 'कलम' और 'ज्ञान' की पूजा होती है। यह इस बात का संदेश देता है कि संसार में बुद्धि, विद्या और लेखन कला ही सबसे बड़ी शक्ति है। बच्चों को इस दिन विशेष रूप से अपनी पढ़ाई की मेज और किताबों को साफ करके पूजा करने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे उनमें शिक्षा के प्रति सम्मान बढ़ता है।
  • 'अकाउंटिंग' और पारदर्शिता का पाठ
    आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में जिसे हम 'ऑडिटिंग' या 'अकाउंटिंग' कहते हैं, उसकी जड़ें इस पूजा में देखी जा सकती हैं। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिस तरह कंपनियों को अपने वित्तीय खातों को पारदर्शी रखना होता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने 'कर्मों के खाते' को साफ-सुथरा रखना चाहिए। यह आत्म-निरीक्षण का दिन है।

निष्कर्ष

2026 की चित्रगुप्त पूजा हमें याद दिलाती है कि कैमरे की नजर भले ही हम पर न हो, लेकिन ईश्वर की 'दिव्य दृष्टि' और भगवान चित्रगुप्त की 'लेखनी' हमारे हर एक कर्म को दर्ज कर रही है। विशेषकर इस वर्ष बुध के प्रभाव वाले दिन (बुधवार) यह पूजा होने से ज्ञान, विवेक और न्यायसंगत कर्मों का महत्व और बढ़ जाता है। कलम की पूजा करके हम यह संकल्प लेते हैं कि हम अपनी ज्ञान-शक्ति का उपयोग समाज के कल्याण और रचनात्मक कार्यों में करेंगे।

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