चम्पा षष्ठी 2026: भगवान खंडोबा का महापर्व
भारत सनातन धर्म और त्योहारों की भूमि है, जहां हर दिन किसी न किसी देवता की आराधना को समर्पित होता है। इन्हीं पवित्र और पौराणिक त्योहारों में से एक है 'चम्पा षष्ठी'। मुख्य रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक के क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव के ही एक उग्र अवतार भगवान खंडोबा (मल्हारी मार्तंड) को समर्पित है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत, लोक संस्कृति, और कृषि संस्कृति के मिलन का एक अद्भुत प्रतीक है।
वर्ष 2026 में चम्पा षष्ठी तिथि एवं शुभ मुहूर्त
साल 2026 में चम्पा षष्ठी का व्रत और मुख्य उत्सव 15 दिसम्बर, दिन मंगलवार को मनाया जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान खंडोबा की पूजा के लिए इस बार तिथियों का गणित और समय इस प्रकार रहेगा:
- चम्पा षष्ठी तिथि: मंगलवार, दिसम्बर 15, 2026
- षष्ठी तिथि प्रारम्भ: दिसम्बर 14, 2026 को 07:15 पी एम (शाम) बजे से
- षष्ठी तिथि समाप्त: दिसम्बर 15, 2026 को 09:19 पी एम (रात) बजे तक
- महत्व: चूंकि उदय तिथि और षष्ठी का मुख्य भाग 15 दिसम्बर को मिल रहा है, इसलिए इसी दिन मुख्य व्रत, पूजा और मंदिरों में महा-उत्सव संपन्न होगा।
वर्ष 2026 का विशेष ज्योतिषीय समीकरण: ग्रह और नक्षत्र
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि यदि चम्पा षष्ठी मंगलवार या रविवार के दिन पड़े और साथ ही शतभिषा नक्षत्र या विशेष शुभ योगों का संयोग बने, तो वह महा-फलदायी और अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। वर्ष 2026 में ठीक ऐसा ही अद्भुत संयोग देखने को मिल रहा है:
विशेष नक्षत्र संयोग:
15 दिसम्बर 2026 को दिन की शुरुआत धनिष्ठा नक्षत्र (सुबह 11:52 बजे तक) से होगी, जिसके ठीक बाद शतभिषा नक्षत्र का प्रारंभ होगा। शतभिषा नक्षत्र के स्वामी राहु हैं और देवता वरुण हैं, जो भगवान शिव की उग्र शक्तियों की आराधना के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है।
शुभ योग (रवि योग):
इस दिन सुबह 07:06 ए एम से लेकर दोपहर 11:52 ए एम तक 'रवि योग' का निर्माण हो रहा है। रवि योग सभी प्रकार के दोषों को नष्ट करने वाला और कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना गया है। दोपहर में हर्षण योग (दुपहर 01:38 बजे तक) रहेगा, जो मन में प्रसन्नता और उत्साह का संचार करता है।
ग्रहों की स्थिति :
- चंद्रमा का गोचर: इस विशेष दिन चंद्रमा कुंभ राशि में गोचर करेंगे, जो कि न्याय के देवता शनि की राशि है।
- सूर्य देव: सूर्य देव वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा नक्षत्र में विराजमान रहेंगे।
- मंगल का प्रभाव:चूंकि यह त्योहार मंगलवार को पड़ रहा है और भगवान खंडोबा स्वयं तेज और पराक्रम के देवता हैं, इसलिए इस दिन मंगल ग्रह जनित दोषों (जैसे भूमि विवाद, कर्ज या रक्त संबंधी विकार) की शांति के लिए विशेष पूजा फलदायी रहेगी।
चम्पा षष्ठी क्या है?
चम्पा षष्ठी भगवान शिव के अवतार भगवान खंडोबा की पूजा का मुख्य दिन है। खंडोबा को 'मार्तंड भैरव', 'मल्हारी' या 'मल्हारी मार्तंड' के नाम से भी जाना जाता है। वे महाराष्ट्र के कुलदेवता (पारिवारिक देवता) के रूप में पूजे जाते हैं, विशेषकर किसानों, चरवाहों और योद्धाओं के बीच उनकी अत्यधिक मान्यता है।
इस दिन को भगवान खंडोबा के पृथ्वी पर अवतरण और उनके द्वारा राक्षसों के वध के विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। चम्पा षष्ठी के दिन व्रत रखने और खंडोबा की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट, पाप और शत्रुओं का नाश होता है।
मल्हारी नवरात्रि : छह दिनों का अनुष्ठान
यह उत्सव वास्तव में एक दिन का नहीं होता, बल्कि मार्गशीर्ष प्रतिपदा (प्रथमा तिथि) से शुरू होकर षष्ठी तिथि तक पूरे छह दिनों तक चलता है। इन छह दिनों को 'मल्हारी नवरात्रि' या 'खंडोबा नवरात्रि' कहा जाता है। छठे दिन, यानी षष्ठी को इस उत्सव का समापन मुख्य चम्पा षष्ठी के रूप में होता है।
- घटस्थापना: मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा के दिन घरों और मंदिरों में 'घट' (कलश) की स्थापना की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे आश्विन मास की नवरात्रि में की जाती है।
- अखंड ज्योति: भगवान खंडोबा के सामने छह दिनों तक अखंड दीपक (नंदादीप) जलाया जाता है।
पौराणिक कथा और इतिहास
चम्पा षष्ठी के पीछे 'ब्रह्मांड पुराण' और 'मल्हारी महात्म्य' में वर्णित एक बहुत ही रोचक और वीरतापूर्ण पौराणिक कथा है।
मणी और मल्ल दैत्यों का आतंक
प्राचीन काल में, मणी और मल्ल नाम के दो अत्याचारी राक्षस भाई थे। उन्होंने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। वरदान के अहंकार में आकर उन्होंने तीनों लोकों में तबाही मचा दी। उन्होंने ऋषियों के आश्रमों को नष्ट कर दिया, देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचा दी।भगवान शिव का 'मार्तंड भैरव' अवतार
जब ऋषि-मुनि और देवता इस अत्याचार से तंग आ गए, तो वे भगवान विष्णु के पास गए और फिर सभी मिलकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। राक्षसों का संहार करने के लिए उन्होंने 'मार्तंड भैरव' (खंडोबा) का अत्यंत उग्र रूप धारण किया। उनका यह रूप सूर्य के समान देदीप्यमान था, उनके हाथ में एक विशाल खड्ग (तलवार) था और वे एक सफेद घोड़े पर सवार थे। उनके साथ उनकी पत्नी माता पार्वती भी 'महालसा' के रूप में अवतरित हुईं।छह दिनों का भीषण युद्ध
भगवान खंडोबा अपनी विशाल सेना (जिसमें देवी-देवता और शिवगण शामिल थे) के साथ 'मणिचूर्ण' पर्वत पर पहुंचे। वहां भगवान खंडोबा और दोनों राक्षस भाइयों (मणी-मल्ल) के बीचछह दिनों तक भयंकर युद्ध चला। यह युद्ध मार्गशीर्ष प्रतिपदा से शुरू होकर षष्ठी तिथि तक चला।
राक्षसों का वध और उद्धार
- मणी का आत्मसमर्पण: युद्ध के पांचवें दिन भगवान खंडोबा ने मणी को परास्त कर दिया। मरते समय मणी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने भगवान खंडोबा से क्षमा मांगी और वरदान मांगा कि उसका घोड़ा भगवान के चरणों में रहे और हर मंदिर में उसकी मूर्ति स्थापित हो। भगवान ने उसे क्षमा कर दिया।
- मल्ल का वध: छठे दिन (षष्ठी तिथि को) भगवान खंडोबा ने मुख्य राक्षस 'मल्ल' का वध कर दिया और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया। मल्ल के नाम पर ही भगवान शिव का नाम 'मल्हारी' (मल्ल का शत्रु) पड़ा।
युद्ध की समाप्ति के बाद, देवताओं ने आकाश से भगवान खंडोबा पर चम्पा (चंपा) के फूलों की वर्षा की और हल्दी (भंडारा) उड़ाई। चूंकि यह विजय मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को मिली थी और चम्पा के फूलों से भगवान का अभिनंदन हुआ था, इसलिए इस दिन का नाम 'चम्पा षष्ठी' पड़ा।
चम्पा षष्ठी के दिन की मुख्य पूजा विधि
चम्पा षष्ठी की पूजा विधि और उत्सव मनाने का तरीका बेहद अनूठा और ऊर्जा से भरपूर होता है। इसमें भक्ति के साथ-साथ लोक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
- स्नान और संकल्प: 15 दिसम्बर को सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान किया जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु भगवान खंडोबा का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेते हैं।
- अभिषेक: भगवान खंडोबा की मूर्ति या लिंग (शिवलिंग) का गंगाजल, दूध, दही और शहद से अभिषेक किया जाता है।
- विशेष अर्पण (चंपा और बेलपत्र): इस दिन भगवान खंडोबा को चंपा के फूल और बेलपत्र अर्पित करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। चम्पा के बिना यह पूजा अधूरी मानी जाती है।
- भंडारा (हल्दी का प्रयोग): पूजा में 'भंडारा' (सूखी हल्दी का पाउडर) का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है। भगवान की मूर्ति पर हल्दी चढ़ाई जाती है और भक्त इसे एक-दूसरे के माथे पर लगाते हैं। पूरा माहौल 'येळकोट येळकोट जय मल्हार' के जयकारों के साथ पीला हो जाता है।
- आरती और कीर्तन: भगवान खंडोबा की विशेष आरती उतारी जाती है और उनकी वीरता की कथाएं सुनी जाती हैं।
विशेष भोग और नैवेद्य
चम्पा षष्ठी के दिन भगवान खंडोबा को जो भोग लगाया जाता है, उसका सीधा संबंध ग्रामीण और कृषि संस्कृति से है। इस दिन मुख्य रूप से ये चीजें बनाई जाती हैं:
- थालपीठ या बाजरीची भाकरी (बाजरे की रोटी): सर्दियों की शुरुआत होने के कारण इस दिन बाजरे की मोटी व पौष्टिक रोटी बनाई जाती है।
- वांग्याचे भरीत (बैंगन का भर्ता): भगवान खंडोबा को बैंगन का भर्ता अत्यंत प्रिय माना जाता है। नए सीजन के बैंगन और बाजरे का भोग भगवान को लगाया जाता है।
- पिठले: बेसन से बनने वाला एक पारंपरिक महाराष्ट्रीयन व्यंजन भी भोग में शामिल होता है।
- महत्वपूर्ण परंपरा: इस दिन बहुत से परिवारों में 'तळण' (तली हुई चीजें) बनाई जाती हैं और पांच सुहागिन महिलाओं या कुंवारे लड़कों को भोजन कराया जाता है।
उत्सव के प्रमुख केंद्र और आकर्षण
वैसे तो यह त्योहार पूरे महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक के हर घर में मनाया जाता है, लेकिन कुछ विशेष मंदिर हैं जहां इस दिन का वैभव देखते ही बनता है:
जेजुरी (पुणे, महाराष्ट्र)
पुणे के पास स्थित 'जेजुरीगढ़' भगवान खंडोबा का मुख्य और सबसे प्रसिद्ध पीठ है। चम्पा षष्ठी के दिन जेजुरी में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
सोने की जेजुरी: इस दिन पूरा जेजुरी मंदिर हल्दी के पाउडर (भंडारा) से ढक जाता है। दूर से देखने पर पूरा पहाड़ सोने की तरह चमकता हुआ प्रतीत होता है, इसलिए इसे 'सोने की जेजुरी' भी कहा जाता है।
भक्त हवा में हल्दी उड़ाते हुए "येळकोट येळकोट जय मल्हार" और "सदानंदाचा येळकोट" के गगनभेदी नारे लगाते हैं।
अन्य प्रमुख मंदिर:
- मैलार लिंगप्पा मंदिर (खानापुर, कर्नाटक): कर्नाटक में भगवान खंडोबा को मैलार लिंग कहा जाता है। यहां भी यह उत्सव बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
- नेवासा और पाली (महाराष्ट्र): इन स्थानों पर स्थित खंडोबा मंदिरों में भी चम्पा षष्ठी पर विशाल मेले (जत्रा) का आयोजन होता है।
चम्पा षष्ठी से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलू
क) 'भंडारा' (हल्दी) का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
चम्पा षष्ठी में हल्दी का अत्यधिक महत्व है। आध्यात्मिक रूप से हल्दी को ज्ञान, समृद्धि और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, मार्गशीर्ष (सर्दियों की शुरुआत) के महीने में त्वचा और स्वास्थ्य के लिए हल्दी बेहद गुणकारी होती है। भगवान को हल्दी चढ़ाना प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीका है।
ख) लोक कला और संस्कृति (वाघ्या-मुरली परंपरा)
भगवान खंडोबा के उत्सवों के साथ 'वाघ्या-मुरली' परंपरा जुड़ी हुई है। 'वाघ्या' (पुरुष लोक कलाकार) और 'मुरली' (महिला लोक कलाकार) भगवान खंडोबा के समर्पित भक्त होते हैं। चम्पा षष्ठी के दिन ये कलाकार पारंपरिक वाद्ययंत्र 'तुणतुणे' और 'कंजरी' बजाकर भगवान खंडोबा के लोकगीत (जागृत गीत और गोंधळ) गाते हैं और नृत्य करते हैं।
ग) ज्योतिषीय और पर्यावरण महत्व
- कुंडली के दोषों का निवारण: माना जाता है कि चम्पा षष्ठी का व्रत करने से कुंडली में मंगल दोष और राहु-केतु के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं, क्योंकि भगवान खंडोबा उग्र और रक्षक देवता हैं। वर्ष 2026 में मंगलवार का दिन होने से इसका महत्व दोगुना हो गया है।
- कृषि उत्सव: इस समय भारत में नई फसलें (जैसे बाजरा, नए बैंगन, सब्जियां) आती हैं। किसान अपनी पहली फसल का एक हिस्सा भगवान खंडोबा को अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसलिए यह एक तरह का 'थैंक्सगिविंग' (आभार प्रकट करने वाला) त्योहार भी है।
निष्कर्ष
चम्पा षष्ठी केवल एक पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कलाओं और प्रकृति के प्रति सम्मान का जीवंत उदाहरण है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जब-जब समाज में अन्याय और अत्याचार (मल्ल-मणी रूपी बुराइयां) बढ़ेगा, तब-तब ईश्वर किसी न किसी रूप में आकर धर्म की स्थापना करेंगे।
साल 2026 में मंगलवार, रवि योग और शतभिषा नक्षत्र के महासंयोग में आ रहा यह महापर्व हर इंसान के भीतर सकारात्मक ऊर्जा, पराक्रम और साहस का संचार करेगा। हल्दी के पीले रंग में सराबोर, चम्पा की भीनी खुशबू से महकता और "जय मल्हार" के जयकारों से गूंजता यह उत्सव सभी के जीवन में मंगल लेकर आए।

