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भुवनेश्वरी जयंती

हिंदू धर्म, तंत्र शास्त्र और शाक्त परंपरा (शक्ति उपासना) में दस महाविद्याओं का सर्वोच्च स्थान है। इन दस महाशक्तियों में से चौथी महाविद्या को मां भुवनेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। मां भुवनेश्वरी संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी और चराचर सृष्टि की आधारशिला हैं। प्रत्येक वर्ष उनकी उत्पत्ति के पावन दिन को भुवनेश्वरी जयंती के रूप में बेहद श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है।

भुवनेश्वरी जयंती 2026: तिथि, मुहूर्त और पंचांग गणना

हिंदू पंचांग के अनुसार, मां भुवनेश्वरी जयंती प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 23 सितंबर, दिन बुधवार को मनाया जाएगा।

तिथि और समय

  • द्वादशी तिथि प्रारंभ: मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को रात 09:43 बजे से।
  • द्वादशी तिथि समाप्त: बुधवार, 23 सितंबर 2026 को रात 10:50 बजे तक।
  • उदयातिथि की मान्यता: चूंकि हिंदू धर्म में उदयातिथि (सूर्योदय के समय की तिथि) को प्रधानता दी जाती है, इसलिए भुवनेश्वरी जयंती का मुख्य व्रत और उत्सव 23 सितंबर 2026, बुधवार को ही रखा जाएगा।

वर्ष 2026 के विशेष ग्रह, नक्षत्र और योग

इस वर्ष भुवनेश्वरी जयंती के दिन आकाश मंडल में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति साधना के लिए अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बना रही है:

  • नक्षत्र: इस दिन श्रवण नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसके स्वामी स्वयं चंद्र देव हैं और राशि स्वामी भगवान विष्णु (शनि की मकर राशि) हैं। यह नक्षत्र सुख, समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक है।
  • ग्रह स्थिति: इस दिन सूर्य देव अपनी सिंह या कन्या राशि के संचरण काल में होंगे। चूंकि मां भुवनेश्वरी सूर्य ग्रह की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए बुधवार के दिन श्रवण नक्षत्र और द्वादशी का यह मिलन तंत्र साधना और भौतिक उन्नति के लिए "सिद्धि दायक" माना जा रहा है।
  • शुभ चौघड़िया मुहूर्त (23 सितंबर 2026):
    लाभ चौघड़िया: सुबह 06:10 से 07:41 तक (पूजा प्रारंभ के लिए उत्तम)
    अमृत चौघड़िया: सुबह 07:41 से 09:12 तक (मंत्र दीक्षा और साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ)
    शुभ चौघड़िया: सुबह 10:43 से दोपहर 12:14 तक

क्या है भुवनेश्वरी जयंती?

भुवनेश्वरी शब्द दो शब्दों के दिव्य मेल से बना है —'भुवन' (अर्थात चौदह भुवन या संपूर्ण ब्रह्मांड) और 'ईश्वरी' (अर्थात स्वामिनी या रानी)। इसका सीधा अर्थ है — संपूर्ण ब्रह्मांड की परम रानी।

मां भुवनेश्वरी को आदि शक्ति का सबसे सौम्य, सुंदर और ममतामयी रूप माना जाता है। शास्त्रों में उनके अद्भुत स्वरूप का वर्णन मिलता है:

  • वे उदित होते हुए सूर्य के समान दैदीप्यमान (चमकदार) और लाल वर्ण की हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं, जो भूत, भविष्य और वर्तमान पर दृष्टि रखते हैं।
  • उनके मस्तक पर बाल-चंद्रमा (दूज का चांद) सुशोभित है।
  • उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे एक हाथ में वरद मुद्रा (वरदान देने वाली), दूसरे में अभय मुद्रा (भयमुक्त करने वाली), तीसरे में अंकुश और चौथे में पाश धारण किए हुए हैं।

विशेष तथ्य: जहां अन्य महाविद्याएं (जैसे मां काली या छिन्नमस्ता) उग्र रूप में जानी जाती हैं, वहीं मां भुवनेश्वरी केवल संहारक नहीं, बल्कि सृष्टि का पोषण करने वाली माता हैं। इन्हें 'जगद्धात्री' (संसार को अपनी गोद में धारण करने वाली) और 'शाकम्भरी' भी कहा जाता है।

मां भुवनेश्वरी के प्राकट्य की पौराणिक कथाएं

मां भुवनेश्वरी के इस संसार में प्रकट होने के पीछे पुराणों में कई दिव्य और रहस्यमयी कथाएं मिलती हैं। यहाँ दो सबसे प्रमुख कथाओं का वर्णन किया जा रहा है:

1.सृष्टि निर्माण की कथा (देवी भागवत पुराण के अनुसार) - सृष्टि के प्रारंभ में न तो सूर्य था, न चंद्रमा, न तारे थे और न ही यह पृथ्वी। चारों ओर केवल घना अंधकार और अनंत शून्य था। उस समय केवल एक निराकार परम तत्व (सच्चिदानंद) विद्यमान था। समय आने पर उस परम तत्व के मन में सृष्टि निर्माण की इच्छा जाग्रत हुई।तभी उस निराकार तत्व ने एक परम दिव्य साकार रूप धारण किया, जिसे 'मां भुवनेश्वरी' कहा गया। मां भुवनेश्वरी ने ही प्रकट होकर अपने दाहिने भाग से ब्रह्मा, मध्य भाग से विष्णु और बाएं भाग से रुद्र (शिव) को प्रकट किया। इसके बाद उन्होंने इन तीनों देवों को क्रमशः सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार का कार्य सौंपा। इस प्रकार, मां भुवनेश्वरी को इस संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि जननी और त्रिदेवों की भी माता (मूल प्रकृति) माना जाता है।

2. ब्रह्मा, विष्णु और महेश के गर्व-हरण की कथा - एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मन में यह अहंकार आ गया कि वे ही इस संसार के नियंता और सर्वेसर्वा हैं और उनके बिना इस ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व ही नहीं है। देवताओं के इस सूक्ष्म भ्रम और अहंकार को तोड़ने के लिए मां आदि शक्ति ने उन्हें अपने दिव्य लोक — 'मणियों के द्वीप' (मणिद्वीप) में आमंत्रित किया।जब तीनों देव वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि एक अत्यंत दिव्य और देदीप्यमान सिंहासन पर करोड़ों सूर्यों की चमक लिए माँ भुवनेश्वरी विराजमान हैं। माँ के अद्भुत तेज के सामने त्रिदेव निष्प्रभ (चमकहीन) हो गए। जैसे ही वे माँ के करीब गए, माँ ने अपनी योगमाया से उन तीनों को स्त्रियों में बदल दिया। तब तीनों देवों को तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ और उनका अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने माँ भुवनेश्वरी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और उनकी भावपूर्ण स्तुति की। प्रसन्न होकर माता ने उन्हें पुनः उनके वास्तविक रूप में लौटाया और सृष्टि के सुचारू संचालन की दिव्य शक्ति और आशीर्वाद प्रदान किया।

इस दिन क्या किया जाता है?

भुवनेश्वरी जयंती के दिन श्रद्धालु और तांत्रिक साधक सुबह से ही विशेष पूजा-अनुष्ठान में लीन हो जाते हैं। इस दिन मुख्य रूप से निम्नलिखित विधि से पूजा की जाती है:

  • प्रातः काल संकल्प
    भक्त को बुधवार, 23 सितंबर को सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) उठकर स्नान आदि से निवृत्त होना चाहिए। साफ वस्त्र (विशेषकर लाल, पीले या केसरिया रंग के) धारण करके पूजा घर में मां के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
  • कलश स्थापना और चौकी सज्जा
    पूजा घर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर मां भुवनेश्वरी की मूर्ति, चित्र या 'भुवनेश्वरी यंत्र' स्थापित करें। माँ के समक्ष तांबे या मिट्टी के कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सिक्का और दूर्वा डालकर कलश स्थापना करें, जिसे सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • षोडशोपचार पूजन
    मां को कुमकुम, सिंदूर, अक्षत (बिना टूटे चावल), लाल चंदन और लाल फूल (विशेषकर गुड़हल, कमल या लाल गुलाब) अर्पित करें। धूप और गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। मां भुवनेश्वरी को नैवेद्य में पंचमेवा, मौसमी फल, सफेद मिठाई और विशेष रूप से मिश्री-मावे की खीर का भोग लगाया जाता है।
  • मंत्र जाप और दिव्य पाठ
    चूंकि यह दिन मंत्रों को सिद्ध करने के लिए सर्वोत्तम है, इसलिए स्फटिक, कमल गट्टे या रुद्राक्ष की माला से मां के विशेष मंत्रों का जाप करें।
    मां भुवनेश्वरी का मूल महामंत्र: || ऐं ह्रीं श्रीं नमः ||
    या माता का सबसे शक्तिशाली एकाक्षरी बीज मंत्र: || ह्रीं ||
    नोट: तांत्रिक ग्रंथों में 'ह्रीं' (Hreem) को लज्जा बीज या भुवनेश्वरी बीज कहा गया है। इसके जाप से सोई हुई चेतना और भाग्य जाग्रत हो जाते हैं। इस दिन 'भुवनेश्वरी चालीसा','भुवनेश्वरी कवच' और 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करना परम कल्याणकारी है।
  • हवन और महाआरती
    पूजा के अंत में आम की लकड़ी, कपूर, शुद्ध घी, हवन सामग्री और कमलगट्टे मिलाकर एक छोटा सा यज्ञ (हवन) करें। इसके बाद कपूर से मां की आरती गाएं और उपस्थित सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।

यह त्योहार कैसे मनाया जाता है?

भारत के विभिन्न सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भुवनेश्वरी जयंती को अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है:

  1. शक्तिपीठों में भव्य उत्सव: इस दिन देश के प्रमुख शक्तिपीठों जैसे असम के कामाख्या मंदिर, तारापीठ (पश्चिम बंगाल) और विशेष रूप से ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर (जिसका नाम ही मां भुवनेश्वरी के नाम पर है) में स्थित 'मां भुवनेश्वरी मंदिर' में विशाल मेले और उत्सव का आयोजन होता है।
  2. तांत्रिकों की 'सिद्ध रात्रि': तांत्रिक और शाक्त संप्रदाय के साधकों के लिए 23 सितंबर 2026 की रात एक 'महारात्रि' की तरह होगी। वे इस रात गुप्त रूप से अष्ट-सिद्धियों की प्राप्ति, चक्र जाग्रत करने और मंत्र शक्ति को बढ़ाने के लिए निशा-पूजन और ध्यान करते हैं।
  3. भंडारा और दान-पुण्य: इस दिन कई धार्मिक संस्थाएं सामूहिक कीर्तन और विशाल भंडारे का आयोजन करती हैं। चूंकि मां भुवनेश्वरी अन्न और पोषण की देवी हैं, इसलिए इस दिन गरीबों, कन्याओं और जरूरतमंदों को भोजन कराने से घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती।

भुवनेश्वरी जयंती के अन्य महत्वपूर्ण और गुप्त पहलू

  • ज्योतिषीय महत्व: सूर्य दोष से मुक्ति
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दस महाविद्याओं में से प्रत्येक देवी किसी न किसी ग्रह का संचालन करती हैं। मां भुवनेश्वरी को सूर्य ग्रह की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। जिन लोगों की कुंडली में सूर्य नीच का हो, राहु-केतु से पीड़ित हो (ग्रहण दोष हो), समाज में मान-सम्मान न मिल रहा हो, या सरकारी नौकरी/कार्यों में लगातार बाधा आ रही हो, उनके लिए भुवनेश्वरी जयंती का व्रत संजीवनी के समान है। इस दिन की गई पूजा से सूर्य जनित सारे दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
  • 'मणिद्वीप' की अलौकिक अवधारणा
    सनातन ग्रंथों (विशेषकर देवी भागवत) में 'मणिद्वीप' का विशद वर्णन है। यह द्वीप इस भौतिक ब्रह्मांड, बैकुंठ और कैलाश से भी ऊपर सर्वोच्च स्थान पर स्थित है, जो पूरी तरह चिंतामणियों से बना है। माना जाता है कि मां भुवनेश्वरी के सच्चे साधक को मृत्यु के पश्चात सीधे मणिद्वीप में स्थान मिलता है, जहां वह परम आनंद को प्राप्त करता है और संसार के आवागमन (जन्म-मरण) के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।
  • सर्वसुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति
    'भुवन' की स्वामिनी होने के कारण इस संसार का हर भौतिक सुख मां के अधीन है। जो व्यक्ति इस दिन निष्काम या सकाम भाव से मां की शरण में आता है, उसे भूमि, उत्तम भवन (मकान), सुखद वाहन, अटूट धन और समाज में सर्वोच्च पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। शास्त्रों का वचन है कि मां भुवनेश्वरी के सच्चे उपासक के कुल में कभी दरिद्रता (गरीबी) पैर नहीं पसार सकती।

सारांश

वर्ष 2026 की भुवनेश्वरी जयंती (23 सितंबर) हमारे लिए केवल एक पारंपरिक व्रत नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की उस परम अदृश्य, ममतामयी और सृजनकारी ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है जो हर क्षण हमारा भरण-पोषण कर रही है। मां भुवनेश्वरी का यह दिव्य स्वरूप हमें संदेश देता है कि वास्तविक शक्ति का प्रदर्शन विनाश या क्रोध में नहीं, बल्कि धैर्य, सृजन, प्रेम और करुणा में है।इस पावन दिन पर मां भुवनेश्वरी का ध्यान और पूजन करने से हमारे भीतर के अज्ञात भय, मानसिक अवसाद, संशय और नकारात्मकता का पूरी तरह नाश होता है; तथा जीवन में अखंड सुख, अपार शांति और दिव्य समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

जय मां भुवनेश्वरी!

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