भैरवी जयन्ती: दस महाविद्याओं की प्रचंड शक्ति का पावन उत्सव
सनातन धर्म में शक्ति साधना का विशेष महत्व है। आदि शक्ति के नौ रूपों (नवदुर्गा) की पूजा जहां हर घर में व्यापक रूप से की जाती है, वहीं तांत्रिक और गुप्त साधनाओं में दस महाविद्याओं की उपासना का विधान है। इन दस महाविद्याओं में से पांचवीं महाविद्या हैं—माता त्रिपुर भैरवी। माता के प्राकट्य दिवस को 'भैरवी जयन्ती' के रूप में मनाया जाता है। साधकों, तांत्रिकों और मां दुर्गा के भक्तों के लिए यह पर्व परम कल्याणकारी माना जाता है।
वर्ष 2026 में भैरवी जयन्ती की तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में भैरवी जयन्ती का पावन पर्व बुधवार, 23 दिसम्बर को मनाया जाएगा। इस वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि 23 दिसम्बर 2026 को सुबह 10:47 AM बजे से प्रारम्भ हो जाएगी, जो अगले दिन यानी 24 दिसम्बर 2026 को सुबह 06:57 AM बजे समाप्त होगी। मुख्य पूजा और व्रत 23 दिसम्बर को ही रखा जाएगा।
इस विशेष दिन के ग्रह-नक्षत्रों की बात करें तो चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में संचरण करेंगे, जिससे मन की दृढ़ता और साधना में स्थिरता प्राप्त होती है। इस दिन का मुख्य नक्षत्र मृगशिरा रहेगा, जिसके स्वामी स्वयं मंगल देव हैं। मंगल का यह प्रभाव माता भैरवी के उग्र, पराक्रमी और ऊर्जावान स्वरूप के सर्वथा अनुकूल है। इसके साथ ही, बुधवार का दिन होने के कारण बुध ग्रह का भी प्रभाव रहेगा जो बुद्धि, विवेक और वाणी को तीक्ष्णता प्रदान करता है।
महत्वपूर्ण संयोग और साधना का समय
इसी पावन तिथि पर 'दत्तात्रेय जयन्ती' और 'अन्नपूर्णा जयन्ती' भी मनाई जाएगी, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व त्रिवेणी के समान कई गुना बढ़ जाता है।
चूंकि माता भैरवी तंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए सामान्य श्रद्धालु जहां सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही अपनी सात्विक पूजा-अर्चन शुरू कर सकते हैं, वहीं तांत्रिक और गुप्त साधकों के लिए 23 दिसम्बर की मध्यरात्रि का समय (निशिता काल मुहूर्त) साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
कौन हैं माता त्रिपुर भैरवी?
'भैरवी' शब्द का अर्थ है—भय का नाश करने वाली या जो स्वयं इतनी भयानक हैं कि उनसे भय भी भयभीत हो जाए। माता का स्वरूप अत्यंत दिव्य, ओजस्वी और संहारक होने के साथ-साथ भक्तों के लिए ममतामयी है।
- शारीरिक स्वरूप: माता भैरवी का वर्ण उदीयमान सूर्य के समान लाल है। उनकी चार भुजाएं हैं और उनके तीन नेत्र हैं।
- अस्त्र-शस्त्र और मुद्रा: वे अपने हाथों में जपमाला, पुस्तक, और दो हाथों से 'वरद' तथा 'अभय' मुद्रा धारण करती हैं। कुछ तांत्रिक शास्त्रों के अनुसार, उनके हाथों में खड्ग और नरमुंड भी सुशोभित होता है।
- वेशभूषा: माता ने गले में मुंडमाला धारण की हुई है और उनके वस्त्र व आभूषण रक्त वर्ण (लाल) के हैं। वे सिंह (शेर) की सवारी करती हैं।
माता भैरवी को 'त्रिपुर भैरवी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे तीनों लोकों (आकाश, पाताल और धरती) में व्याप्त हैं और विनाश व पुनरुत्पादन के चक्र को नियंत्रित करती हैं। वे चेतना के उस स्तर का प्रतीक हैं जो अज्ञान और अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है।
भैरवी जयन्ती की पौराणिक कथाएं
माता त्रिपुर भैरवी के प्राकट्य से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं शास्त्रों में मिलती हैं। यहाँ दो सबसे प्रमुख कथाओं का वर्णन किया गया है:
1. नारद पांचरात्र के अनुसार: सती का उग्र रूप
एक बार जब प्रजापति दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने भगवान शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। माता सती ने यज्ञ में जाने की हठ की, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें जाने से रोका और कहा कि बिना निमंत्रण के जाना अपमानजनक होगा।शिव जी के बार-बार रोकने पर माता सती अत्यंत क्रोधित हो उठीं। उनके इस भयंकर क्रोध से ब्रह्मांड कांपने लगा। उनका रंग काला और रूप डरावना हो गया। जब शिव जी भयभीत होकर वहां से जाने लगे, तो माता सती ने दस दिशाओं में अपने दस रूप प्रकट कर दिए ताकि शिव जी किसी भी दिशा में भाग न सकें। इन दस रूपों को ही 'दस महाविद्या' कहा गया। इनमें से पांचवां रूप जो प्रचंड तेज, क्रोध और अग्नि के समान दैदीप्यमान था, वही माता त्रिपुर भैरवी का था। बाद में माता ने शिव जी को अपनी शक्ति का परिचय दिया और यज्ञ में प्रस्थान किया।2. महाविद्या प्राकट्य कथा: शिव का तिलक
एक अन्य कथा के अनुसार, जब सतयुग में महाप्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्निर्माण हो रहा था, तब शिव जी ने माता पार्वती की परीक्षा लेने के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं। उस समय चारों ओर घोर अंधकार छा गया।तब संसार को अंधकार से बचाने के लिए और शिव जी के भीतर के तेज को बाहर लाने के लिए माता पार्वती के शरीर से एक महान शक्ति प्रकट हुई, जिनका रंग सूर्य जैसा लाल और तेज अग्नि जैसा था। वे ही माता भैरवी कहलाईं। उनके प्रकट होते ही पूरा संसार पुनः प्रकाशमान हो गया।
भैरवी जयन्ती कैसे मनाई जाती है?
भैरवी जयन्ती पर सामान्य भक्त सात्विक रूप से और तांत्रिक/साधक तामसिक या गुप्त रूप से पूजा करते हैं। यहाँ आम भक्तों के लिए सरल और शास्त्रोक्त विधि दी गई है:
पूजा की तैयारी और सामग्री
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर एक चौकी स्थापित करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। माता भैरवी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। यदि चित्र न हो, तो माता दुर्गा की प्रतिमा के सामने भी यह पूजा की जा सकती है।
चरण-दर-चरण पूजा विधि
1.संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर माता भैरवी के सामने वर्ष 2026 की मार्गशीर्ष पूर्णिमा के इस शुभ संयोग में अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए व्रत या पूजा का संकल्प लें।
2.आह्वान और स्थापना: माता को कुमकुम, चंदन, अक्षत (चावल) और लाल रंग के फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।
3.भोग: माता भैरवी को कंदमूल, फल और मुख्य रूप से हलवा, पूरी या खीर का भोग लगाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में उन्हें उड़द की दाल के बड़े भी चढ़ाए जाते हैं।
4.दीपक: माता के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
5.मंत्र जाप: इस दिन माता के विशेष मंत्रों का लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए।
जाप के लिए सिद्ध मंत्र: ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा अथवा ॐ त्रिपुर भैरव्यै नमः
6.आरती और क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में माता की आरती करें और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगें।
उत्सव के अन्य महत्वपूर्ण पहलू और सामाजिक महत्व
भैरवी जयन्ती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके कई सामाजिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं:
- तंत्र साधना में सर्वोच्च स्थान: अघोरियों और तांत्रिकों के लिए यह रात 'सिद्धि' प्राप्त करने की रात होती है। शक्तिपीठों (जैसे कामाख्या, तारापीठ) में इस दिन विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किए जाते हैं। माना जाता है कि इस रात की गई साधना कभी निष्फल नहीं होती।
- भय और शत्रुओं पर विजय: माता भैरवी का मुख्य गुण भय का नाश करना है। जो लोग मानसिक तनाव, भूत-प्रेत के भय, या अज्ञात डर से पीड़ित होते हैं, वे इस दिन माता की विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा, कोर्ट-कचहरी के मामलों और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए भी यह दिन अचूक माना जाता है।
- 'वाक सिद्धि' की प्राप्ति: माता भैरवी को विद्या और बुद्धि की देवी भी माना जाता है। उनकी कृपा से साधक को 'वाक सिद्धि' (जो बोलो वो सच हो जाना) और उत्कृष्ट लेखन क्षमता प्राप्त होती है।
- दान-पुण्य का महत्व: चूंकि यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन होता है, इसलिए इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व है। पूजा के बाद गरीबों, ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराना और लाल रंग के वस्त्र या कंबल दान करना अत्यंत शुभ फल देता है।
निष्कर्ष
माता त्रिपुर भैरवी का स्वरूप भले ही उग्र और भयानक दिखाई देता हो, लेकिन एक मां के रूप में वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य, करुणामयी और रक्षक हैं। वे केवल उन्हीं प्रवृत्तियों का विनाश करती हैं जो अधर्मी हैं या जो उनके भक्तों को नुकसान पहुंचाती हैं।
23 दिसम्बर 2026 को आने वाला भैरवी जयन्ती का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि हमारे भीतर छिपे 'भय', 'क्रोध' और 'अज्ञान' रूपी राक्षसों का नाश करके ही हम ज्ञान और प्रकाश के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। इस दिन पूर्ण श्रद्धा और शुद्ध मन से की गई पूजा जीवन के सभी कष्टों को हर लेती है।

