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अटला तद्दे

अटला तद्दे मुख्य रूप से भारत के आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक बेहद पवित्र और पारंपरिक त्योहार है। इसे उत्तर भारत के 'करवा चौथ' का दक्षिण भारतीय रूप माना जा सकता है। यह त्योहार विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख के लिए और अविवाहित कन्याओं द्वारा मनचाहा और सुयोग्य वर पाने के लिए रखा जाता है।

अटला तद्दे क्या है और यह वर्ष 2026 में कब मनाया जाएगा?

तेलुगु संस्कृति का यह एक प्रमुख पर्व है। चंद्र कैलेंडर के अनुसार यह त्योहार आश्वयुज (अश्विन) महीने की पूर्णिमा के बाद तीसरे दिन (त्रितीया/तद्दे) को मनाया जाता है।तेलुगु भाषा में 'अटला' का अर्थ होता है 'डोसा' (Atlu) और 'तद्दे' का अर्थ होता है 'तीसरा दिन' (तृतीया)। इस दिन विशेष रूप से छोटे-छोटे डोसे (अटलु) बनाए जाते हैं और उन्हें देवी गौरी को अर्पित किया जाता है, इसलिए इसका नाम 'अटला तद्दे' पड़ा।

वर्ष 2026 मुख्य तिथियां और शुभ मुहूर्त:

  • अटला तद्दे व्रत तिथि: बुधवार, अक्टूबर 28, 2026
  • तृतीया तिथि प्रारम्भ: अक्टूबर 28, 2026 को सुबह 04:06 ए एम बजे से
  • तृतीया तिथि समाप्त: अक्टूबर 29, 2026 को देर रात 01:06 ए एम बजे तक
  • अटला तद्दे के दिन चन्द्रोदय: शाम 07:16 पी एम बजे

विशेष नोट: चूंकि तृतीया तिथि बुधवार, 28 अक्टूबर को सूर्योदय से पहले ही शुरू हो रही है और मध्यरात्रि के बाद तक रहेगी, इसलिए उदयव्यापिनी और चंद्रोदय व्यापिनी तिथि के नियमानुसार इस वर्ष यह व्रत 28 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। शाम 07:16 बजे चंद्र देव के दर्शन कर अर्घ्य दिया जा सकेगा।

वर्ष 2026 में महत्वपूर्ण ग्रह, नक्षत्र और गोचर योग

इस वर्ष 28 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाली अटला तद्दे बेहद शुभ और दुर्लभ ज्योतिषीय संयोगों के साथ आ रही है, जो व्रती महिलाओं के लिए सौभाग्य में वृद्धि करने वाली है:

  1. नक्षत्र स्थिति: इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च के रहेंगे, जिससे रोहिणी/मृगशिरा नक्षत्र का सुंदर संयोग बनेगा। चंद्रमा का अपनी उच्च राशि में होना मानसिक शांति, वैवाहिक सुख और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  2. ग्रह गोचर: इस दौरान देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि में और शुक्र देव (जो वैवाहिक सुख के कारक हैं) अपनी अनुकूल स्थिति में रहेंगे। बुधवार का दिन होने के कारण यह व्रत बुद्धि और समृद्धि के प्रदाता भगवान गणेश और मां गौरी की कृपा को दोगुना करने वाला होगा।
  3. अमृत योग: इस दिन शाम के समय पूजा के वक्त शुभ चौघड़िया और अमृत योग की उपस्थिति रहेगी, जिससे इस समय की गई गौरी पूजा अखंड सौभाग्य का वरदान देने वाली होगी।

यह त्योहार कैसे मनाया जाता है?

अटला तद्दे का उत्सव बेहद जीवंत और आनंदमय होता है। इस दिन महिलाएं और लड़कियां कई पारंपरिक गतिविधियों में भाग लेती हैं:

  • गोरिंटाकु (मेहंदी): त्योहार से एक दिन पहले शाम को सभी महिलाएं और लड़कियां अपने हाथों और पैरों में गोरिंटाकु (मेंहदी) लगाती हैं। ऐसा माना जाता है कि मेंहदी का रंग जितना गहरा होता है, पति का प्रेम उतना ही गहरा होता है। यह स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी अच्छा माना जाता है क्योंकि यह शरीर को ठंडक पहुँचाती है।
  • उय्याला (झूला झूलना): इस दिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। युवतियां और महिलाएं पारंपरिक लोक गीत गाते हुए झूला झूलती हैं। यह प्रकृति के साथ जुड़ाव और खुशी व्यक्त करने का एक तरीका है।
  • चंद्रोदय का इंतजार: इस व्रत में महिलाएं पूरे दिन निर्जला (बिना पानी के) या फलाहार व्रत रखती हैं। वे शाम को चंद्रमा (चंद्र देव) के दर्शन करने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं।

इस दिन हम क्या करते हैं?

अटला तद्दे के दिन सुबह से लेकर रात तक की दिनचर्या बेहद कड़े नियमों और उत्साह से भरी होती है:

  1. सूर्योदय से पहले उठना (अल्लमुदोनम/चद्दि अन्नम): इस दिन महिलाएं सूर्योदय से काफी पहले (तड़के सुबह 3 से 4 बजे के बीच) उठ जाती हैं। वे स्नान करके'चद्दि अन्नम' (रात का बचा हुआ ठंडा चावल जिसमें दही, हरी मिर्च और अदरक मिला होता है) खाती हैं। इसे 'अल्लमुदोनम' भी कहा जाता है। सूर्योदय के बाद पूरे दिन कुछ भी खाने-पीने की मनाही होती है।
  2. पारंपरिक खेल: दोपहर के समय महिलाएं एक जगह इकट्ठी होती हैं, लोक गीत गाती हैं और 'चम्मा चक्का' जैसे पारंपरिक खेल खेलती हैं ताकि व्रत के दौरान उनका ध्यान बंटा रहे और भूख-प्यास का अहसास न हो।

अटला तद्दे पूजन विधि

शाम के समय देवी गौरी (मां पार्वती) की पूजा अत्यंत श्रद्धापूर्वक की जाती है। इसकी चरणबद्ध विधि इस प्रकार है:

आवश्यक सामग्री:
मिट्टी या हल्दी से बनी देवी गौरी की मूर्ति, 11 या 21 छोटे डोसे (अटलु जो कि मुख्य प्रसाद है), कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल), फूल, दीप, धूप, नैवेद्य (फल, मिठाई) और 'वयनाम' के लिए नए कपड़े, फल, पान के पत्ते, सुपारी व दक्षिणा।

पूजा की प्रक्रिया:

  1. वेदी तैयार करना: पूजा घर को साफ करके एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर चावल की एक ढेरी बनाएं और उस पर हल्दी से बनी गौरी मां (गौरी देवी) की प्रतिमा स्थापित करें।
  2. संकल्प और दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक जलाएं और अपने पति की लंबी उम्र या अच्छे वर के लिए प्रार्थना करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  3. षोडशोपचार पूजा: देवी गौरी को हल्दी, कुमकुम, फूल और अक्षत अर्पित करें। धूप-दीप दिखाकर उनकी आरती करें।
  4. डोसे का भोग (अटलु नैवेद्य): विशेष रूप से बनाए गए 11 या 21 छोटे डोसे देवी माँ को अर्पित किए जाते हैं। इनमें से कुछ डोसे पूजा के बाद सुहागिन महिलाओं को दान में दिए जाते हैं।
  5. वयनाम देना: पूजा समाप्त होने के बाद, प्रत्येक विवाहित महिला किसी अन्य सुहागिन महिला (या अपनी सास/ननद) को 'वयनाम' देती है। वयनाम देते समय महिलाएं एक विशेष तेलुगु श्लोक बोलती हैं: "इस्तवायनम पुचुकुंटिनi वयनाम" (यानी मैं यह सुहाग सामग्री दे रही हूँ और आप इसे स्वीकार कर रही हैं)।
  6. अर्घ्य दान (शाम 07:16 बजे): जैसे ही शाम को 07:16 पी एम पर चंद्रोदय हो, महिलाएं चंद्रमा को जल, अक्षत और रोली से अर्घ्य देकर अपना व्रत पूर्ण करती हैं।

अटला तद्दे से जुड़ी पौराणिक कथा

इस त्योहार के पीछे एक बहुत ही प्रसिद्ध लोक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है:

प्राचीन काल में एक अत्यंत सुंदर और गुणी राजकुमारी थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो उसने मनचाहा वर पाने के लिए 'अटला तद्दे' का व्रत रखने का निश्चय किया। लेकिन व्रत के दिन अत्यधिक भूख और प्यास के कारण वह बेहोश हो गई।उसके भाइयों से अपनी बहन की यह दशा देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी बहन का व्रत पूरा करवाने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने दूर एक पेड़ के पीछे आग जलाई और एक गोल बड़ा दर्पण (शीशा) इस तरह रखा कि आग की रोशनी उसमें कृत्रिम चंद्रमा की तरह दिखने लगी। भाइयों ने राजकुमारी को जगाया और कहा, "देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, अपना अर्घ्य देकर व्रत खोलो।"

राजकुमारी ने उस कृत्रिम चंद्रमा को ही असली समझकर अपना व्रत तोड़ दिया। चूंकि उसका व्रत अधूरा और अशुद्ध रह गया था, इसलिए इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उसका विवाह एक अत्यंत वृद्ध और बीमार राजा से हो गया।राजकुमारी अपने भाग्य पर बहुत रोई। तब देवी पार्वती ने उसे दर्शन दिए और उसकी भूल का अहसास कराया। देवी ने कहा कि उसने अनजाने में ही सही, लेकिन झूठे चंद्रमा को देखकर व्रत तोड़ा था। देवी पार्वती ने उसे अगले वर्ष पूरी निष्ठा और बिना किसी भूल के दोबारा 'अटला तद्दे' का व्रत रखने को कहा।राजकुमारी ने अगले वर्ष आश्वयुज तृतीया को पूरे विधि-विधान से निर्जला व्रत रखा और रात को वास्तविक चंद्रमा को अर्घ्य दिया। देवी गौरी के आशीर्वाद से उसका वृद्ध पति एक युवा, सुंदर और स्वस्थ राजा में बदल गया। तब से महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा के लिए इस व्रत को पूरी सावधानी और श्रद्धा से करती आ रही हैं।

त्योहार के अन्य महत्वपूर्ण पहलू और सामाजिक महत्व

इस पावन व्रत के धार्मिक महत्व के साथ-साथ कई अन्य जरूरी पहलू भी हैं जो इसे खास बनाते हैं:

  • वैज्ञानिक और स्वास्थ्य पहलू
    यह त्योहार शरद ऋतु की शुरुआत में आता है, जब मौसम बदल रहा होता है। सुबह-सुबह ठंडा दही-चावल (चद्दि अन्नम) खाने से पेट को ठंडक मिलती है और शरीर बदलते मौसम के अनुकूल ढलता है। इसके साथ ही, हाथों में लगाई जाने वाली मेंहदी त्वचा को संक्रमण से बचाती है और शरीर के बढ़े हुए तापमान को नियंत्रित करने का काम करती है।
  • सामाजिक समरसता और स्त्री-शक्ति
    इस दिन महिलाएं जाति, उम्र और वर्ग का भेद भूलकर एक जगह इकट्ठा होती हैं, आपस में सुख-दुख बांटती हैं, झूला झूलती हैं और खेल खेलती हैं। यह समाज में आपसी भाईचारे, सामूहिक एकता और स्त्री-शक्ति को बढ़ावा देने का एक बेहतरीन माध्यम है।

प्रकृति की पूजा

पूजा में मिट्टी से बनी गौरी की प्रतिमा का उपयोग करना और आंगन में लगे पेड़ों पर झूले डालना इस बात का प्रतीक है कि यह त्योहार हमारी प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान व्यक्त करता है।

अटला तद्दे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह तेलुगु संस्कृति की समृद्धि, पारिवारिक मूल्यों, और महिलाओं के आपसी प्रेम व उल्लास का एक अद्भुत संगम है।

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