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अखुरथ संकष्टी

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी 2026 :

सनातन परंपरा में भगवान श्री गणेश जी को प्रथम पूजनीय माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनकी पूजा के बिना अधूरी मानी जाती है। मान्यता है कि गजानन की पूजा से बड़े से बड़ा संकट शीघ्र ही दूर होता है और सारे काम बिना किसी बाधा के सफल होते हैं। गणपति को प्रसन्न करके जीवन के समस्त दुखों से मुक्ति पाने के लिए ही पौष मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि पर अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा जाता है।

हिंदू मान्यता के अनुसार, जो भी साधक इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास के साथ पूरे विधि-विधान से करता है, उसकी बड़ी से बड़ी समस्याएं और संकट पलभर में दूर हो जाते हैं।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी क्या है और कब मनाई जाती है ?

'संकष्टी' का अर्थ होता है संकटों को हरने वाली। पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के 'अखुरथ' स्वरूप की पूजा की जाती है और उनके वाहन मूषक (चूहे) का भी विशेष महत्व होता है।

यह व्रत मुख्य रूप से चंद्रोदय पर आधारित होता है। दिनभर उपवास रखने के बाद रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही इस व्रत को पूर्ण माना जाता है।

वर्ष 2026 में अखुरथ संकष्टी चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त

वर्ष 2026 में अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत 26 दिसम्बर, शनिवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार मुख्य समय और मुहूर्त इस प्रकार हैं:

  • अखुरथ संकष्टी चतुर्थी तिथि : शनिवार, दिसम्बर 26, 2026
  • चतुर्थी तिथि प्रारम्भ : दिसम्बर 26, 2026 को रात 08:04 बजे से
  • चतुर्थी तिथि समाप्त : दिसम्बर 27, 2026 को शाम 05:12 बजे तक
  • संकष्टी के दिन चन्द्रोदय का समय : रात 08:19 पी एम (PM)
  • विशेष नोट : संकष्टी चतुर्थी का व्रत उसी दिन रखा जाता है जिस रात को चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय हो रहा हो। इसलिए 26 दिसम्बर को ही यह व्रत रखा और खोला जाएगा।

वर्ष 2026 का विशेष ज्योतिषीय घटनाक्रम

दिसम्बर 2026 में आने वाली इस अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन आकाश मंडल में बेहद अद्भुत और शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इस व्रत के महत्व को कई गुना बढ़ा देते हैं:

1.शनिवार का संयोग (शनि-गणेश कृपा): इस बार संकष्टी चतुर्थी शनिवार के दिन पड़ रही है। ज्योतिष शास्त्र में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है। इस दिन व्रत करने से कुंडली में शनि दोष (साढ़ेसाती या ढैय्या) का प्रभाव कम होता है।
2.पुष्य/अश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव: इस दिन चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में गोचर करेंगे, जिससे चंद्रमा बेहद मजबूत स्थिति में होंगे। यह मानसिक शांति और माता के स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।
3.ब्रह्म/इंद्र योग: इस तिथि पर धार्मिक कार्यों के लिए बेहद शुभ माने जाने वाले 'ब्रह्म योग' या 'इंद्र योग' की उपस्थिति रहेगी, जिससे इस दिन की गई पूजा और मंत्र जाप का फल अनंत गुना हो जाता है।
4.सूर्य का धनु राशि में गोचर: इस समय सूर्य देव धनु राशि (पौष मास) में स्थित होंगे, जिसे 'धनु संक्रांति' का काल भी कहा जाता है। इस दौरान किए गए दान-पुण्य से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की पूजन विधि

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत बेहद फलदायी माना गया है, बशर्ते इसे सही विधि-विधान से किया जाए। इसकी संपूर्ण पूजन विधि इस प्रकार है:

  • प्रातः काल की तैयारी और संकल्प
    सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के) धारण करें। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थल की स्थापना
    घर के मंदिर या किसी साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान श्री गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। गजानन के सामने देसी घी का दीपक और धूप जलाएं।
  • मुख्य पूजन प्रक्रिया
    भगवान गणेश को गंगाजल से स्नान कराएं (यदि मूर्ति धातु की हो)। इसके बाद उन्हें सिंदूर, अक्षत, चंदन, जनेऊ और पुष्प अर्पित करें। गणेश जी को उनका सबसे प्रिय भोग—मोदक या लड्डू और दूर्वा (दूब घास) अवश्य चढ़ाएं। दूर्वा के बिना गणेश जी की पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • चंद्र दर्शन और अर्घ्य (रात 08:19 बजे)
    संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा की पूजा का अनिवार्य महत्व है। रात को जब **08:19 पी एम** पर चंद्रोदय हो, तब चांदी के पात्र या लोटे में दूध, गंगाजल, चंदन और शहद मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्र देव से अपने जीवन के कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करें और इसके बाद ही अपना व्रत खोलें।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की महिमा स्वयं देवताओं और राजाओं ने भी स्वीकार की है। इससे जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है :

एक बार लंकापति रावण ने स्वर्ग के सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली। इसके बाद जब उसने किष्किंधा के राजा बालि की असीमित शक्ति के बारे में सुना, तो वह अहंकार में चूर होकर उससे युद्ध करने के लिए पहुंच गया। लेकिन रावण से कहीं अधिक ताकतवर बालि ने युद्ध भूमि में रावण को आसानी से हरा दिया और उसे अपनी कांख (बाजू) में दबा लिया।
बालि रावण को उसी अवस्था में अपने महल ले आया और उसने रावण को अपने पुत्र अंगद को खिलौने की तरह खेलने के लिए दे दिया। जब अंगद ने रावण को एक साधारण खिलौने की तरह रस्सी से बांधकर इधर-उधर घसीटना और खेलना शुरू किया, तो रावण को अत्यधिक पीड़ा और घोर अपमान का सामना करना पड़ा।इस भीषण संकट से बचने के लिए रावण ने अपने पितामह ऋषि पुलस्त्य का स्मरण किया। रावण की ऐसी दयनीय दशा देखकर ऋषि पुलस्त्य को अत्यंत दुख हुआ। तब उन्होंने रावण को इस बड़े संकट से उबरने के लिए विघ्नविनाशक श्री गणेश जी की पूजा और व्रत करने का उपाय बताया। ऋषि पुलस्त्य ने रावण को बताया कि इसी व्रत के पुण्य प्रभाव से पूर्व काल में देवताओं के राजा इन्द्र को भी भयंकर राक्षस वृत्रासुर पर विजय मिली थी।पितामह की आज्ञा पाकर रावण ने पूरे विधि-विधान से संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। इस व्रत के पुण्य और मंगलकारी प्रभाव से बालि का क्रोध शांत हो गया और उसने रावण को बंधन से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, बालि ने रावण के साथ मित्रवत व्यवहार भी किया।

व्रत से मिलने वाले अद्भुत लाभ और विशेष उपाय

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा-पाठ करने और कुछ विशेष उपाय आजमाने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • नौकरी में प्रमोशन और धन वृद्धि : इस पावन दिन पर "श्री गणाधिपतये नम:" मंत्र का जाप करते हुए भगवान गणेश को हल्दी की पांच गांठें अर्पित करनी चाहिए। इस उपाय को करने से नौकरीपेशा लोगों को शीघ्र ही उच्च पद या प्रमोशन की प्राप्ति होती है और घर में धन की वृद्धि होती है।
  • नकारात्मकता से मुक्ति : इस चतुर्थी तिथि पर भगवान श्री गणेश और चंद्र देव की संयुक्त रूप से पूजा करने से जीवन और घर-परिवार में व्याप्त हर तरह की नकारात्मक ऊर्जा पूरी तरह दूर हो जाती है।
  • सौभाग्य और संतान सुख : अखुरथ चतुर्थी का व्रत पूरी निष्ठा से रखने से दांपत्य जीवन में सौभाग्य बना रहता है। साथ ही, संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले भक्तों की मनोकामना भी इसके प्रभाव से शीघ्र ही पूर्ण होती है।
  • घर में सुख-समृद्धि का वास : इस व्रत को नियमित रूप से करने से घर में निरंतर सुख-समृद्धि का आगमन होता है और परिवार हर तरह की मानसिक व आर्थिक परेशानियों से मुक्त हो जाता है।
  • संकटों का नाश : चूंकि यह चतुर्थी सभी संकटों को हरने वाली मानी गई है, इसलिए व्रतधारी को इस तिथि पर भगवान श्री गणेश का विशेष ध्यान लगाकर पूजन करना चाहिए। इससे जीवन के बड़े से बड़े विघ्न और बाधाएं पलभर में समाप्त हो जाती हैं।

इस दिन क्या करें और क्या न करें?

  1. क्या करें: इस दिन मन ही मन "ॐ गं गणपतये नमः" का जाप करते रहें। जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र का दान करें तथा गाय को हरी घास अवश्य खिलाएं।
  2. क्या न करें: इस दिन भूलकर भी लहसुन, प्याज या तामसिक भोजन न खाएं। किसी भी जीव (विशेषकर चूहे) को न सताएं और मन में किसी के प्रति क्रोध या अपशब्द न लाएं।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का यह पावन व्रत हर भक्त के लिए कल्याणकारी है। यदि आप भी जीवन में बाधाओं से घिरे हैं, तो इस चतुर्थी पर विघ्नहर्ता की शरण में जाकर अपने दुखों से मुक्ति पा सकते हैं।

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