गुड़ी पड़वा पर्व
गुड़ी पड़वा पर्व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। पर्व इसलिए महत्वपूर्ण है कि हिंदू नववर्ष का आरंभ इसी तिथि से होता है। खास बात ये है की इस दिन से ही चैत्र नवरात्रि भी आरंभ होती है। मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से ही सृष्टि की रचना आरम्भ की थी।
Puja starts from ₹501.00
Puja Duration: 1 hour
Culture/Rituals: Hindi
Puja Samagri: View Samagri List
Proceed to Book Chat on WhatsApp
गुड़ी पड़वा हिन्दू कैलेंडर के अनुसार नववर्ष का प्रारंभ होता है और यह महाराष्ट्र, कर्नाटका, गोवा और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में मनाया जाता है। यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है, जो आमतौर पर मार्च या अप्रैल में पड़ता है। गुड़ी पड़वा का त्यौहार खासतौर से महाराष्ट्र में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन इसे अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में भी नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं, लेकिन यह मुख्य रूप से एक नई शुरुआत, समृद्धि, खुशहाली और शांति के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
गुड़ी पड़वा के दिन घर की साफ सफाई कर रंगोली और आम या अशोक के पत्तों की तोरण लगाईं जाती है। घर के आगे एक झंडा लगाया जाता है। इसे गुड़ी कहा जाता हैं। एक बर्तन पर स्वस्तिक बनाकर उस पर रेशम का कपड़ा लपेट कर रखा जाता है। अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए इस दिन नीम की कोपल गुड़ के साथ खाई जाती है। गुड़ी पड़वा के दिन लोग नए नए कपड़े पहनते हैं और आपस में मिलने के लिए एक दूसरे के घर जाते हैं। इस दिन घरों में पूरन पोली और श्रीखंड बनाया जाता है इसके साथ ही मीठे चावल भी बनाए जाते हैं, जिसे शक्कर भात भी कहा जाता है।
पूजन विधि
गुड़ी पड़वा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई कर स्नान के बाद घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों से तोरण लगाएं। उसके बाद घर में रंगोली बनाकर घर के किसी हिस्से में गुड़ी लगाए एवं इसे फूलों से सजाएं। गुड़ी लगाने के लिए सबसे पहले घर मुख्य द्वार पर एक खंभे में पीतल का लोटा उल्टा रखकर इसमें रेशम के लाल, केसरिया और पीला वस्त्र बांधें। फिर गुड़ी को फूलों और नीम के पत्तों से सजाएं। ध्यान रखें कि गुड़ी को थोड़ा झुका हुआ रखे। इसके बाद परिवार सहित गुड़ी की पूजा कर इसे लहराए।
Puja Samagri List
- दूध 250 ग्राम
- दही 250 ग्राम
- घी 200 ग्राम
- आम पत्ते 10 पत्ते
- केले पत्ते 5 पत्ते
- बेल पत्ते 21 पत्ते
- समी पत्ते 11 पत्ते
- पान पत्ते 5 पत्ते
- फूल + माला 2 माला
- मिठाई 500 ग्राम
- फल 1 किलो
- थाली 2 नग
- कटोरी 7 कटोरी
- ताँबे के लोटे 2 नग
- दुब
- हवन कुंड 1 नग
- लकड़ी का पटा 1 नग
- अबीर 10 रु
- गुलाल 10 रु
- रोली 10 रु
- सिंदूर 15 रु
- हल्दी 15 रु
- गोल सुपारी 100 ग्राम
- खरक 50 ग्राम
- बादाम 50 ग्राम
- हल्दी की गाठें 50 ग्राम
- जनेऊ 5 नग
- रक्क्षा सूत्र 1 नग
- नारियाल 2 नग
- इत्र 1 शीशी
- कपूर 100 ग्राम
- लाल कपडा 1 मीटर
- वाइट कपडा 1 मीटर
- गेहू 1 किलो
- चावल 1 किलो
- अगरबत्ती 1 पैकेट
- धुप बत्ती 1 पैकेट
- फूल बत्ती 1 पैकेट
- शक्कर 500 ग्राम
- गंगाजल 1 पैकेट
- हवन समाग्री 500 ग्राम
- हवन लकड़ी 4 पैकेट
- नवग्रह लकड़ी 1 पैकेट
- नारियल गोला 1 गोला
- सहद 10 रु
- माचिस 1 नग
- दीपक/दिया 3 नग
- लौंग 10 रु
- इलाइची 10 रु
- श्रृंगार सामग्री 1 पैकेट
Additional Information
प्रतिपदा का यह शुभ दिन सनातन की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र मास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी महीने की प्रतिपदा को भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था एवं जल प्रलय के बीच घिरे मनु को सुरक्षित स्थल पर पहुँचाया था, जिनसे प्रलय के पश्चात नई सृष्टि का आरम्भ हुआ।
इसी दिन सतयुग का प्रारम्भ हुआ था। वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुई थीं। श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी। विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम संवत का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम संवत चला आ रहा है। इतना ही नहीं, इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करके पंचांग की रचना की थी।
विक्रम संवत को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें सौर, चन्द्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास सम्मिलित हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ एवं मीन नामक बारह राशियां सूर्य वर्ष के महीने हैं। सूर्य का वर्ष 365 दिन का होता है। इसका प्रारम्भ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से होता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन चन्द्र वर्ष के महीने हैं। चन्द्र वर्ष 355 दिन का होता है।
आज भी भारत में शिक्षा तथा कोष आदि का चालन-संचालन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर ही करने की परंपरा है। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। गुड़ी पड़वा किसानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन से रवि की फसलों की कटाई प्रारंभ हो जाती है, और खरीफ की फसलों की बुआई की तैयारी शुरू हो जाती है।
गुड़ी समृद्धि,शक्ति, विजय की प्रतीक मानी गई है। माना जाता है कि गुड़ी लगाने से घर में समृद्धि आती है। गुड़ी पड़वा के दिन नीम की पत्तियां खाने की परंपरा है, जिसके परिणाम स्वरूप हमारा रक्त शुद्ध होता है और स्वास्थ्य उत्तम होता है। इस पर्व को लोग अपने परिवारजनों के साथ पारंपरिक तरीके से मनाते हैं, जिससे जीवन में अत्यंत हर्ष-उल्लास का संचार होता है, और स्वजनों के प्रति स्नेह भी बढ़ता है।

