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बछ बारस

बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) 2027:

बछ बारस, जिसे 'गोवत्स द्वादशी' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अनुपम पर्व है जो पशु प्रेम, वात्सल्य और धार्मिक आस्था का सुंदर मिश्रण है। यह त्योहार मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति और मूक जीव-जंतु हमारे मानवीय जीवन का अभिन्न और पूजनीय हिस्सा हैं।

वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय विन्यास

वर्ष 2027 में बछ बारस का पर्व बेहद शुभ खगोलीय विन्यास और विशिष्ट नक्षत्रों के प्रभाव में आ रहा है। इस वर्ष भाद्रपद मास की द्वादशी तिथि पर ग्रहों का जो संयोग बन रहा है, वह माताओं के संकल्प और संतान की दीर्घायु के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जा रहा है।

मुख्य व्रत एवं उत्सव तिथि :

इस वर्ष बछ बारस का पावन पर्व शनिवार, अगस्त 28, 2027 को मनाया जाएगा। शनिवार का दिन होने के कारण शनि देव की क्रूर दृष्टि से संतान की रक्षा करने के लिए यह व्रत बेहद फलदायी रहेगा।

द्वादशी तिथि का समय:

  • द्वादशी तिथि प्रारम्भ: अगस्त 28, 2027 को 12:42 (दोपहर १२:४२) बजे
  • द्वादशी तिथि समाप्त: अगस्त 29, 2027 को 09:35 (सुबह ०९:३५) बजे

प्रदोषकाल बछ बारस पूजा मुहूर्त: चूंकि इस व्रत में प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में पूजा का विशेष विधान है, इसलिए इस वर्ष का शुभ मुहूर्त निम्नलिखित रहेगा:

  • शुभ मुहूर्त समय: शाम 18:33 (06:33 PM) से रात्रि 20:53 (08:53 PM) तक
  • कुल शुभ अवधि: 02 घण्टे 20 मिनट्स

विशेष खगोलीय व ग्रह गोचर स्थिति: वर्ष 2027 में 28 अगस्त को बछ बारस के दिन आकाश मंडल में पुष्य नक्षत्र का मंगलकारी प्रभाव रहेगा, जिसे सभी नक्षत्रों का राजा और अत्यंत पोषणकारी माना जाता है। ग्रहों की स्थिति को देखें तो सूर्य देव अपनी स्वराशि सिंह में गोचर करेंगे, जो पुत्र सुख और आरोग्यता को बढ़ाते हैं। चंद्रमा इस दिन अपनी स्वराशि कर्क में विराजमान रहकर माताओं के हृदय में वात्सल्य और मानसिक शांति का संचार करेंगे। कर्क राशि का चंद्रमा और पुष्य नक्षत्र का यह मिलन 'सिद्धि योग' का निर्माण करता है, जिससे इस वर्ष की गई पूजा संतान के भाग्य का उदय करने वाली होगी।

क्या है बछ बारस का तात्विक स्वरूप?

'बछ' का अर्थ है बछड़ा और 'बारस' का अर्थ है द्वादशी तिथि। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व मुख्य रूप से भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। देश के कई हिस्सों में इसे दीपावली के उत्सव से ठीक पहले (कार्तिक कृष्ण द्वादशी) भी मनाया जाता है। इस दिन गौ माता (गाय) और उनके नन्हे बछड़े की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। सनातन संस्कृति में गाय को साक्षात देवत्व और बछड़े को भावी पीढ़ी व वंश वृद्धि का प्रतीक माना गया है।

बछ बारस की पावन पौराणिक कथाएँ

इस व्रत से जुड़ी कई लोककथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से दो सबसे प्रमुख कहानियाँ माताओं द्वारा बड़े चाव से सुनी जाती हैं:

1. साहूकार और उसके जीवित हुए पोते की कहानी

प्राचीन काल में एक प्रतापी साहूकार ने गाँव में जन कल्याण के लिए एक बड़ा तालाब बनवाया, परंतु कई वर्ष बीत जाने पर भी उसमें पानी नहीं रुका। चिंतित साहूकार ने ज्योतिषियों से उपाय पूछा। ज्योतिषियों ने कहा कि यदि वह अपने बड़े पोते की बलि दे, तो तालाब पानी से लबालब भर जाएगा। लोक कल्याण की भावना में बहकर साहूकार ने अपनी बहू की अनुपस्थिति में ऐसा ही क्रूर कदम उठा लिया। जब बछ बारस का दिन आया, तो उसकी बहू ने तालाब पर पूजा के समय अपने पुत्र को व्याकुल होकर याद किया। तभी गाय माता के आशीर्वाद और माँ की सच्ची ममता के कारण उसका पुत्र चमत्कारिक रूप से जीवित होकर तालाब की पाल से हंसता हुआ बाहर निकल आया। यह कथा माँ की अटूट श्रद्धा और गौ माता की असीम कृपा को दर्शाती है।

2. गेहूंला और मूंगला की कथा

एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, एक सास ने अपनी नई बहू को 'गेहूंला' और 'मूंगला' पकाने को कहा। वास्तव में 'गेहूंला' और 'मूंगला' अनाज के नाम थे, पर घर के दो नन्हे बछड़ों के नाम भी भूलवश यही रखे गए थे। बहू ने नासमझी में बछड़ों को ही पका दिया। जब उसे अपनी भयंकर भूल का एहसास हुआ, तो उसने रोते हुए ईश्वर से प्रार्थना की। शाम को जब गाय चरकर वापस लौटी और अपने बच्चों को पुकारते हुए रंभाने लगी, तो वे बछड़े मिट्टी के ढेर से चमत्कारिक रूप से जीवित होकर बाहर दौड़ आए। इसी कारण इस दिन से बछ बारस पर गेहूं और मूंग का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाने लगा।

पूजा की अनूठी शास्त्रीय विधि

बछ बारस की पूजा विधि अन्य सामान्य त्योहारों से काफी भिन्न और रोचक होती है:

  • गौ-पूजन: शनिवार की सुबह स्नानादि के बाद गाय और उसके बछड़े को नहलाया जाता है। उन्हें नई चुनरी ओढ़ाई जाती है, फूलों की माला पहनाई जाती है और उनके सींगों पर तेल व रंग लगाकर सजाया जाता है।
  • तिलक और अर्घ्य: गाय और बछड़े के माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाया जाता है। माताएं तांबे के पात्र में पवित्र जल, तिल, अक्षत और फूल लेकर उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित करती हैं।
  • तलाई फोड़ना (प्रतीकात्मक परंपरा): घर के आंगन में गोबर या मिट्टी से एक छोटा प्रतीकात्मक तालाब (तलाई) बनाया जाता है। उसमें दूध और जल भरा जाता है। पूजा के बाद परिवार का बेटा चाकू या लकड़ी की छड़ी से इस 'तलाई' की पाल को तोड़ता है, जिसे वंश सुरक्षा के लिए बहुत शुभ माना जाता है।
  • बायना निकालना: एक थाली में भीगे हुए मोठ, बाजरा और सामर्थ्य के अनुसार रुपए रखकर अपनी सासू माँ या घर की बुजुर्ग महिलाओं के पैर छूकर उन्हें सादर भेंट किया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

खान-पान के कड़े और विशेष नियम

इस दिन भोजन को लेकर कुछ बेहद कड़े नियमों का पालन किया जाता है, जो इस व्रत की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता है:

  1. चाकू और नुकीली वस्तुओं का सर्वथा त्याग: इस दिन घर में चाकू, कैंची, हँसिया या सुई जैसी किसी भी नुकीली वस्तु का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है। सब्जियां या तो पहले से काटकर रखी जाती हैं या फिर इस दिन हाथ से तोड़कर पकाई जाती हैं। यहाँ तक कि फल भी हाथों से ही तोड़े जाते हैं।
  2. गाय के उत्पादों का पूर्ण निषेध: चूंकि यह विशेष दिन बछड़े के अधिकार का माना गया है, इसलिए इस दिन इंसानों के लिए गाय का दूध, दही, घी, छाछ या उससे बनी मिठाइयों का सेवन पाप माना जाता है। इस दिन केवल भैंस के दूध या बकरी के दूध के उत्पादों का ही प्रयोग किया जाता है।
  3. अनाज का परहेज: इस दिन धरती को चीरकर (हल चलाकर) उपजाए जाने वाले मुख्य अनाज जैसे गेहूं और चावल नहीं खाए जाते। भोजन में मुख्य रूप से मोटे और प्राचीन अनाज जैसे बाजरा, मोठ और मक्का का उपयोग होता है। बाजरे की ठंडी रोटी (सोगरा) और मोठ की सूखी सब्जी इस दिन का विशेष और पवित्र प्रसाद है।

सामाजिक, सांस्कृतिक और आधुनिक महत्व

  • संतान की सुरक्षा का कवच: यह व्रत विशेष रूप से संतानों की सुरक्षा, उनके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए किया जाता है, जो आज के बिखरते दौर में भी पारिवारिक जुड़ाव और माँ-बेटे के आत्मीय संबंध को मजबूत करता है।
  • जीव दया और पर्यावरण संतुलन: आज के इस मशीनी और कंक्रीट के युग में यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि गाय और उसके वंशज सदियों से हमारी खेती, अर्थव्यवस्था और मानव सभ्यता के मुख्य आधार रहे हैं। यह पर्व पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने की प्रेरणा देता है।
  • लोक संस्कृति का संरक्षण: पूजा के दौरान ग्रामीण और शहरी महिलाएं एक साथ बैठकर पारंपरिक बछ बारस के लोकगीत गाती हैं और पौराणिक कहानियाँ सुनाती हैं, जिससे हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती है।

निष्कर्ष:

वर्ष 2027 की यह बछ बारस केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या उपवास नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन और सुख के लिए इन मूक पशुओं और वनस्पति के ऋणी हैं। बिना किसी आधुनिक औजार (चाकू) का प्रयोग किए और बेहद सात्विक व मोटे भोजन (बाजरा-मोठ) के साथ मनाया जाने वाला यह अनूठा त्योहार सादगी, सरलता और निश्छल प्रेम का सर्वोत्कृष्ट प्रतीक है।

।। गौ माता की जय ।।

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