बछ बारस, जिसे 'गोवत्स द्वादशी' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अनुपम पर्व है जो पशु प्रेम, वात्सल्य और धार्मिक आस्था का सुंदर मिश्रण है। यह त्योहार मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है।
क्या है बछ बारस?
'बछ' का अर्थ है बछड़ा और 'बारस' का अर्थ है द्वादशी तिथि। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कई क्षेत्रों में इसे दीपावली से ठीक पहले (कार्तिक मास) भी मनाया जाता है। इस दिन गौ माता (गाय) और उनके बछड़े की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति और जीव-जंतु हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
बछ बारस की पौराणिक कथाएँ
इस व्रत से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से दो सबसे प्रमुख हैं:
- साहूकार और उसके पोते की कहानी:
प्राचीन काल में एक साहूकार ने गाँव में बड़ा तालाब बनवाया, पर उसमें पानी नहीं रुका। ज्योतिषियों ने कहा कि यदि वह अपने बड़े पोते की बलि दे, तो तालाब पानी से भर जाएगा। लोक कल्याण के लिए साहूकार ने ऐसा ही किया। जब बछ बारस का दिन आया, तो उसकी बहू ने पूजा के समय अपने पुत्र को याद किया। तभी गाय के आशीर्वाद से उसका पुत्र जीवित होकर तालाब की पाल से बाहर निकल आया। यह कथा माँ की श्रद्धा और गौ माता की कृपा को दर्शाती है।- गेहूंला और मूंगला की कथा:
एक अन्य लोककथा के अनुसार, एक सास ने अपनी बहू को 'गेहूंला' और 'मूंगला' (जो अनाज के नाम थे, पर घर के बछड़ों के नाम भी वही थे) पकाने को कहा। बहू ने भूलवश बछड़ों को पका दिया। जब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उसने ईश्वर से प्रार्थना की। गाय के रंभाने पर वे बछड़े चमत्कारिक रूप से जीवित हो गए। इसी कारण इस दिन गेहूं और मूंग का सेवन वर्जित माना जाने लगा।
पूजा की अनूठी विधि
बछ बारस की पूजा विधि अन्य त्योहारों से काफी भिन्न होती है:
1.गौ-पूजन: सुबह स्नानादि के बाद गाय और उसके बछड़े को नहलाया जाता है। उन्हें नए वस्त्र (चुन्नी) ओढ़ाई जाती है और उनके सींगों को सजाया जाता है।
2.तिलक और अर्घ्य: गाय और बछड़े के माथे पर रोली का तिलक लगाया जाता है। माताएं तांबे के पात्र में जल, तिल, अक्षत और फूल लेकर उनके चरणों में अर्घ्य अर्पित करती हैं।
3.तलाई फोड़ना (प्रतीकात्मक):घर के आंगन में मिट्टी का एक छोटा तालाब बनाया जाता है। उसमें दूध और जल भरा जाता है। परिवार का बेटा चाकू या लकड़ी की छड़ी से इस 'तलाई' की पाल को तोड़ता है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है।
4.बायना निकालना:एक थाली में भीगे हुए मोठ, बाजरा और सामर्थ्य अनुसार रुपए रखकर अपनी सासू माँ या घर की बुजुर्ग महिलाओं के पैर छूकर उन्हें भेंट किया जाता है।
खान-पान के विशेष नियम
इस दिन भोजन को लेकर कड़े नियमों का पालन किया जाता है, जो इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता है:
- चाकू का त्याग: इस दिन घर में चाकू, कैंची या सुई जैसी नुकीली चीजों का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है। सब्जियां पहले से काटकर रखी जाती हैं या हाथ से तोड़कर पकाई जाती हैं।
- गाय के उत्पादों का निषेध:चूंकि यह दिन बछड़े का है, इसलिए गाय का दूध, दही, घी या उससे बनी मिठाई खाना वर्जित है। इस दिन केवल भैंस के दूध का ही प्रयोग किया जाता है।
- अनाज का परहेज: इस दिन गेहूं और चावल= नहीं खाए जाते। भोजन में मुख्य रूप से बाजरा, मोठ और मक्का का उपयोग होता है। बाजरे की ठंडी रोटी और मोठ की सब्जी इस दिन का विशेष प्रसाद है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
- संतान की सुरक्षा: यह व्रत विशेष रूप से पुत्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए किया जाता है, जो भारतीय समाज में पारिवारिक जुड़ाव को मजबूत करता है।
- जीव दया: आज के मशीनी युग में यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि गाय और उसके वंशज खेती और मानव सभ्यता के आधार रहे हैं।
- लोक संस्कृति का संरक्षण: पूजा के दौरान महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और कहानियाँ सुनाती हैं, जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत जीवित रहती है।
निष्कर्ष
बछ बारस केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह कृतज्ञता का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने सुख के लिए पशुओं और प्रकृति के ऋणी हैं। बिना किसी औजार (चाकू) का प्रयोग किए और सात्विक भोजन (बाजरा-मोठ) के साथ मनाया जाने वाला यह त्योहार सरलता और प्रेम का प्रतीक है।

