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यमुना छठ

यमुना छठ

सनातन धर्म में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि साक्षात देवी और मां का स्वरूप माना गया है। भारतीय संस्कृति में गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों का स्थान अत्यंत पूजनीय है। इन्हीं में से सूर्यपुत्र और यमराज की बहन मां यमुना को समर्पित एक बेहद पावन और अलौकिक त्योहार है —"यमुना छठ" (जिसे यमुना जयंती भी कहा जाता है)।

यह पर्व मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना) के साथ-साथ पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

यमुना छठ क्या है?

यमुना छठ वह पावन दिवस है जिसे मां यमुना के पृथ्वी पर अवतरण (प्राकट्य) दिवस के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मां यमुना वैकुंठ लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। चूंकि यह उत्सव चैत्र मास की षष्ठी तिथि (छठवें दिन) को मनाया जाता है, इसलिए इसे 'यमुना छठ' कहा जाता है।

इस दिन भक्त मां यमुना की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और उनके पावन जल में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। ब्रजवासियों के लिए यह दिन किसी महाउत्सव से कम नहीं होता, क्योंकि वे यमुना जी को अपने जीवन का आधार और भगवान श्री कृष्ण की पटरानी (मुख्य रानी) मानते हैं।

यह कब आती है ?

हिंदू पंचांग (कैलेंडर) के अनुसार, यमुना छठ प्रतिवर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। यह समय अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च या अप्रैल के महीने में आता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व सुप्रसिद्ध चैत्र नवरात्रि के छठवें दिन पड़ता है, जिस दिन मां दुर्गा के छठवें स्वरूप यानी मां कात्यायनी की पूजा भी होती है।

वर्ष 2027: तिथि, नक्षत्र एवं मुख्य ग्रह गोचर

वर्ष 2027 में यमुना छठ के दिन आकाश मंडल में ग्रहों का बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, जो मां यमुना की पूजा को और भी अधिक फलदायी बनाता है:

  • षष्ठी तिथि प्रारंभ: 24 मार्च, 2027 को रात्रि 02:30 ए एम बजे से (प्रतिपदा के अनुसार गणना)
  • षष्ठी तिथि समाप्त: 24 मार्च, 2027 को रात्रि 11:56 पी एम बजे तक
  • पूजा का मुख्य समय (विशेष अवधि): दोपहर 01:41 पी एम से शाम 04:07 पी एम तक (कुल अवधि: 02 घण्टे 26 मिनट्स)
  • नक्षत्र स्थिति: इस वर्ष यमुना छठ पर रोहिणी नक्षत्र और इसके बाद मृगशिरा नक्षत्र का सुंदर प्रभाव रहेगा। रोहिणी नक्षत्र के स्वामी स्वयं चंद्रमा हैं और इसके देवता ब्रह्मा जी हैं। रोहिणी नक्षत्र में जल और प्रकृति की देवी की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।
  • चंद्रमा की स्थिति: चंद्रमा इस दिन अपनी उच्च राशि वृषभ में संचार करेंगे। उच्च के चंद्रमा का गोचर भक्तों को मानसिक शांति और असीम भक्ति प्रदान करने वाला माना गया है।
  • सूर्य देव की स्थिति: सूर्य देव इस समय अपनी मित्र राशि मीन में स्थित होंगे। मीन एक जल तत्व की राशि है। सूर्य (जो कि यमुना जी के पिता हैं) का जल तत्व की राशि में होना और उनकी पुत्री यमुना का जन्मोत्सव होना, एक अद्भुत पितृ-पुत्री ज्योतिषीय संयोग बनाता है।
  • बनने वाले शुभ योग: इस दिन रवि योग और प्रीति योग का निर्माण हो रहा है, जो आपसी प्रेम, पारिवारिक शांति और मान-सम्मान की प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।

यमुना छठ क्यों मनाई जाती है?

इस त्योहार को मनाने के पीछे कई गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण छिपे हैं:

  1. प्राकट्य का उत्सव: यह दिन मुख्य रूप से मां यमुना के पृथ्वी पर आगमन का जन्मोत्सव है। जैसे हम अपने आराध्य या प्रियजनों का जन्मदिन मनाते हैं, वैसे ही भक्त मां यमुना के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए यह दिन मनाते हैं।
  2. भगवान श्री कृष्ण से मिलन की भूमि तैयार करना: ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के पृथ्वी पर अवतार लेने से पहले, मां यमुना उनके स्वागत और उनकी अलौकिक लीलाओं का हिस्सा बनने के लिए पृथ्वी पर आईं।
  3. पापों से मुक्ति और मोक्ष की कामना: शास्त्रों में वर्णित है कि यमुना जी के जल का स्पर्श मात्र ही मनुष्य को यमराज के भय और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिला सकता है। भक्त इस पावन अवसर पर मां यमुना का आशीर्वाद पाकर अपने पापों को नष्ट करने के लिए यह पर्व मनाते हैं।

मां यमुना के प्राकट्य की पौराणिक कथा

यमुना जी के जन्म और पृथ्वी पर उनके अवतरण से जुड़ी कथा अत्यंत दिव्य और रोचक है, जिसका वर्णन मत्स्य पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है।

1. सूर्यदेव की पुत्री और यमराज की बहन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां यमुना का जन्म भगवान सूर्य नारायण (विवस्वान) और उनकी पत्नी संज्ञा की संतान के रूप में हुआ था। इस प्रकार वे सूर्यपुत्री हैं। मृत्यु के देवता यमराज और न्याय के देवता शनिदेव इनके सगे भाई हैं। यमुना जी का एक नाम 'कालिंदी' भी है, क्योंकि इनका उद्गम कालिंद पर्वत (यमुनोत्री) से हुआ है।

2. वैकुंठ से पृथ्वी पर आगमन
गोलोक (भगवान कृष्ण का परम धाम) में यमुना जी एक दिव्य नदी के रूप में बहती थीं। जब द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया, तो उनकी लीलाओं को पूर्ण करने के लिए राधा रानी और अन्य गोपियों के साथ-साथ मां यमुना ने भी पृथ्वी पर आने की इच्छा व्यक्त की। चैत्र शुक्ल षष्ठी के दिन वे साक्षात द्रव रूप (जल स्वरूप) में पृथ्वी पर अवतरित हुईं।

3. भाई यमराज का वरदान
एक बार यमुना जी ने अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया। यमराज बहुत व्यस्त रहते थे, लेकिन अपनी बहन के बार-बार बुलाने पर वे कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) के दिन उनके घर पहुंचे। यमुना जी ने अत्यंत प्रेम से भाई का सत्कार किया और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। प्रसन्न होकर यमराज ने उनसे वरदान मांगने को कहा।तब यमुना जी ने वरदान मांगा कि जो भी मनुष्य आज के दिन (भाई दूज) और मेरे अवतरण दिवस (यमुना छठ) पर मेरे जल में स्नान करेगा, उसे मृत्यु के बाद यमलोक नहीं जाना पड़ेगा और न ही उसे अकाल मृत्यु का भय सताएगा। यमराज ने "तथास्तु" कहकर इस वरदान को स्वीकार किया। तब से यह मान्यता है कि यमुना छठ पर स्नान करने वाले को यम यातना नहीं भोगनी पड़ती।

इस दिन क्या करते हैं और इसे कैसे मनाया जाता है?

यमुना छठ के दिन श्रद्धालु अत्यंत कड़े नियमों और शुद्धता के साथ मां यमुना की आराधना करते हैं। इस दिन की मुख्य पूजा विधि और गतिविधियां सुबह से लेकर रात तक चलती हैं।

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और संकल्प
इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले उठकर यदि संभव हो तो मथुरा, वृंदावन या प्रयागराज में यमुना नदी के घाटों पर जाकर स्नान करते हैं। जो लोग वहां नहीं जा पाते, वे घर पर ही नहाने के पानी में यमुना जल मिलाकर स्नान करते हैं। स्नान के बाद हाथ में जल और फूल लेकर मां यमुना और भगवान कृष्ण के स्मरण के साथ व्रत का संकल्प लिया जाता है। यह व्रत पूर्णतः निराहार या फलाहारी रखा जाता है।

मुख्य पूजा विधि
घर के मंदिर में या नदी के किनारे एक चौकी पर मां यमुना की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। चूंकि यमुना जी को साक्षात कृष्णप्रिया माना गया है, इसलिए उनके साथ राधा-कृष्ण की पूजा भी अनिवार्य रूप से की जाती है। मां यमुना को पीले वस्त्र, चुनरी, चंदन, अक्षत, धूप-दीप और फूल अर्पित किए जाते हैं। उन्हें विशेष रूप से तुलसी दल और पीले रंग की मिठाइयां या मावे का भोग लगाया जाता है। पूजा के दौरान भक्त “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या यमुना जी के विशेष मंत्र “ॐ यमुनायै नमः” का जाप करते हैं।

घाटों पर छटा और 'दीपदान'
शाम के समय यमुना जी के घाटों (जैसे मथुरा का विश्राम घाट) पर भव्य आरती का आयोजन होता है। सैकड़ों पुजारी बड़े-बड़े दीपकों से मां यमुना की महाआरती करते हैं, जो देखने में अत्यंत अलौकिक लगती है। आरती के बाद भक्त पत्तों के दोने में दीपक जलाकर यमुना जी के प्रवाहमान जल में प्रवाहित करते हैं। रात के समय तैरते हुए हजारों दीपक नदी को सोने की तरह चमका देते हैं।

यमुना छठ का महत्व और विभिन्न दृष्टिकोण

यमुना छठ का महत्व केवल एक स्तर पर नहीं, बल्कि कई अलग-अलग रूपों में हमारे जीवन को प्रभावित करता है।

  • आध्यात्मिक शुद्धि के रूप में: माना जाता है कि गंगा जी में स्नान करने से पाप धूलते हैं, लेकिन यमुना जी का केवल श्रद्धापूर्वक स्मरण करने या उनका आचमन (जल पीना) करने से ही आत्मा शुद्ध हो जाती है।
  • कृष्ण भक्ति का मार्ग: पुष्टिमार्ग (वैष्णव संप्रदाय) के अनुसार, मां यमुना भगवान कृष्ण की 'कृपा शक्ति' हैं। उनकी अनुमति और आशीर्वाद के बिना कोई भी जीव कृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। वे जीव को कृष्ण के सम्मुख लाती हैं।
  • ज्योतिषीय दृष्टिकोण (वर्ष 2027 विशेष): चूंकि यमुना जी सूर्यपुत्री और शनिदेव की सगी बहन हैं, और इस वर्ष चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में हैं, इसलिए इस दिन यमुना जी की पूजा करने से कुंडली में सूर्य-चंद्रमा जनित दोष दूर होते हैं। साथ ही शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के मानसिक कष्टों से भारी राहत मिलती है।

ब्रज संस्कृति में उत्सव का अनूठा स्वरूप

यमुना छठ का सबसे भव्य, जीवंत और सजीव रूप ब्रजभूमि (मथुरा और वृंदावन) में देखने को मिलता है। ब्रजवासियों के लिए यमुना जी केवल एक नदी नहीं हैं, वे उनके परिवार की मुखिया और मां की तरह पूजी जाती हैं।

मथुरा के प्रसिद्ध विश्राम घाट पर इस दिन पैर रखने की जगह नहीं होती। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ इकट्ठा होते हैं। सभी घाटों को रंग-बिरंगे फूलों और आकर्षक लाइटों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। कई बड़े मंदिरों और घाटों पर मां यमुना को 'छप्पन भोग' (56 प्रकार के व्यंजन) अर्पित किए जाते हैं। ब्रज की महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जैसे — "चलो री सखी यमुना नहाने चलें..." या "जय यमुना रस रानी..."। मंदिरों में विशेष रूप से 'यमुनाष्टक' (महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा रचित यमुना जी की स्तुति) का सस्वर पाठ किया जाता है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

पर्यावरण संरक्षण का आधुनिक संदेश

आज के परिप्रेक्ष्य में यमुना छठ का महत्व धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर व्यावहारिक धरातल पर भी बेहद प्रासंगिक हो जाता है। पौराणिक काल में जिस यमुना जी का जल नीले रंग का और अमृत के समान पवित्र था, आज बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण के कारण उसकी स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।

यमुना छठ का वास्तविक संदेश यही है कि मां यमुना की केवल मूर्तियों और दीपों से पूजा करना ही काफी नहीं है। इस त्योहार का सच्चा अर्थ तब सार्थक होगा जब हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने जलस्रोतों को गंदा नहीं करेंगे। यमुना नदी में कचरा, प्लास्टिक या रासायनिक पदार्थ न बहाना ही मां यमुना की सच्ची सेवा है। जल ही जीवन है, और अपनी जीवनदायिनी नदियों की रक्षा करना हमारा परम मानवीय और नैतिक धर्म है।

निष्कर्ष

यमुना छठ का यह पावन पर्व हमें भक्ति, श्रद्धा, प्रकृति प्रेम और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय सिखाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति नदियों की गोद में ही फली-फूली है। मां यमुना की कृपा हम सब पर बनी रहे, हमारा मन और पर्यावरण दोनों स्वच्छ रहें — यही इस पावन छठ पर्व की मूल भावना है।

जय मां यमुना! यमुना मैया की जय!

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