Online Puja & Pandit Booking
+91 91115 12346

विजया एकादशी

विजया एकादशी 2026:

विजया एकादशी हिन्दू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कल्याणकारी व्रत माना गया है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को 'विजया एकादशी' के रूप में पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

जैसा कि इसके नाम 'विजया' से ही स्पष्ट है, यह एकादशी अपने भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाली और समस्त कठिनाइयों, शत्रुओं तथा बाधाओं पर जीत प्रदान करने वाली मानी गई है। पद्मपुराण में इस एकादशी के विशेष महात्म्य का विस्तार से वर्णन मिलता है। जो भी श्रद्धालु अपने जीवन के संकटों से मुक्ति पाना चाहते हैं, मानसिक व शारीरिक शांति चाहते हैं और किसी भी शुभ कार्य में सफलता या विजय की कामना रखते हैं, वे इस पावन दिन पूरी निष्ठा के साथ व्रत का पालन करते हैं।

विजया एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त एवं पारण समय

वर्ष 2026 में विजया एकादशी का व्रत 13 फरवरी, शुक्रवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार मुख्य समय इस प्रकार हैं:

  • एकादशी तिथि प्रारम्भ: 12 फरवरी, 2026 को दोपहर 12:22 बजे से
  • एकादशी तिथि समाप्त: 13 फरवरी, 2026 को दोपहर 02:25 बजे तक
  • विजया एकादशी व्रत तिथि: 13 फरवरी, 2026 (शुक्रवार)
  • पारण (व्रत तोड़ने का) समय: 14 फरवरी, 2026 को सुबह 07:00 ए एम से 09:14 ए एम तक
  • पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय: 14 फरवरी, 2026 को शाम 04:01 पी एम बजे

वर्ष 2026 का विशेष ज्योतिषीय योग और ग्रह-नक्षत्र

विशेष महासंयोग: वर्ष 2026 की विजया एकादशी के दिन आकाशमंडल में बेहद शुभ और दुर्लभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन मूल नक्षत्र और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो कि किसी भी नए कार्य की शुरुआत और विजय प्राप्ति के लिए अत्यंत बलवान माने जाते हैं।
इसके साथ ही, शुक्रवार का दिन होने के कारण माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की संयुक्त कृपा का मार्ग खुलेगा। इस दिन ग्रहों की स्थिति साधकों के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और संकल्प शक्ति को बढ़ाने वाली होगी, जिससे शत्रुओं और बाधाओं पर विजय पाना अत्यंत सुगम हो जाएगा।

विजया एकादशी की पावन व्रत कथा

द्वापर युग में जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से इस एकादशी का महात्म्य पूछा, तब श्री कृष्ण ने कहा—"हे अर्जुन! यह कथा तुमसे पूर्व केवल देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से सुनी है। जो भी इस व्रत को करता है, वह सदा विजयी रहता है।"

कथा :  त्रेतायुग से जुड़ी है। जब भगवान श्री रामचंद्र जी माता सीता की खोज में वानर सेना सहित समुद्र तट पर पहुँचे, तो लंका पहुँचने के लिए जल जीवों से भरा दुर्गम सागर एक बड़ी बाधा बनकर खड़ा हो गया। मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में लीला कर रहे श्रीराम एक आम मानव की भांति चिंतित हो गए। तब लक्ष्मण जी ने उन्हें सुझाव दिया कि यहाँ से आधा योजन दूर परम ज्ञानी वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है, हमें उनसे उपाय पूछना चाहिए।
भगवान श्रीराम मुनिवर के आश्रम पहुँचे। मुनि ने उन्हें अपनी सेना सहित फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखने को कहा। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस व्रत के प्रभाव से वे समुद्र पार कर रावण को अवश्य पराजित करेंगे। श्रीराम ने सेना सहित मुनि के बताए विधान के अनुसार व्रत रखा। इसके प्रभाव से समुद्र पर पुल का निर्माण हुआ, लंका पर चढ़ाई की गई और युद्ध में रावण का वध कर धर्म की विजय हुई।

विजया एकादशी व्रत के विशेष लाभ और अनुष्ठान

इस व्रत को करने का एक विशेष वैदिक अनुष्ठान विधान है, जिसे पूर्ण करने से अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है:

  • विशेष जलपात्र की स्थापना: एकादशी तिथि से ठीक एक दिन पहले (यानी दशमी की शाम, 12 फरवरी को) सोने, चांदी या तांबे की धातु से बना एक सुंदर जलपात्र (कलश) तैयार करना चाहिए। यदि ये धातुएं उपलब्ध न हों, तो शुद्ध मिट्टी के घड़े का उपयोग भी किया जा सकता है।
  • कलश की सजावट और अनाज की वेदी: इस पात्र में स्वच्छ जल भरें और मुख को आम के पत्तों से सजाएं। पूजा स्थल पर सात प्रकार के अनाजों (सप्तधान्य: गेहूं, जौ, मक्का, चावल, कुकानी, चना और मटर) की एक ढेरी बनाएं। इस ढेर के ऊपर उस जलपात्र को स्थापित करें और उसे एक सुंदर ढक्कन से ढक दें।
  • देव पूजन और रात्रि जागरण: 13 फरवरी की सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर, इस जलपात्र को फूलों की मालाओं और चंदन से सुसज्जित करें। कलश के ऊपर रखे ढक्कन में जौ, श्रीफल (नारियल) और अनार के दाने रखें। इसके बाद, भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की एक सुंदर स्वर्ण प्रतिमा को उस ढक्कन पर स्थापित कर षोडशोपचार पूजा करें। एकादशी की पूरी रात दीप प्रज्वलित कर भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी को दान का विधान: 14 फरवरी (द्वादशी) की सुबह, उस पवित्र जल के घड़े और प्रतिमा को किसी पवित्र नदी या तालाब के तट पर ले जाकर पुनः पूजा करें। इसके बाद, उस जलपात्र, स्वर्ण प्रतिमा, अनाज और पूजा सामग्री को किसी सदाचारी ब्राह्मण को सादर दान कर दें।

संपूर्ण पूजन विधि (चरणबद्ध)

विजया एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को निम्नलिखित नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए:

1.ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: एकादशी (13 फरवरी) के दिन सूर्योदय से पूर्व उठें, पवित्र जल से स्नान करें और ईश्वर का ध्यान करें।
2.वस्त्रों का चयन: स्नान के बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ होता है।
3.व्रत का संकल्प: पूजा घर में भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का दृढ़ संकल्प लें।
4.प्रतिमाओं की स्थापना: अपने पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की प्रतिमाओं या चित्रों को एक साथ स्थापित करें।
5.सामग्री अर्पण: भगवान को ताजे मौसमी फल, पवित्र तुलसी के दल (पत्ते) और सुगंधित चंदन का लेप अर्पित करें।
6.मंत्र जाप: पूजा के दौरान एकाग्रचित्त होकर इस मंत्र का उच्चारण अवश्य करें:

"ॐ श्री विष्णु पदं वन्दे संसार दुःख नाशनम्।"

7.विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ: इस दिन भगवान विष्णु के 1000 पवित्र नामों वाले 'विष्णु सहस्त्रनाम' का पाठ अवश्य करना चाहिए।
8.विशेष माला का उपयोग: मंत्रों का जाप करते समय क्रिस्टल स्फटिक डायमंड कट माला का उपयोग बेहद फलदायी होता है, जो साधक को भगवान की चेतना से जोड़ती है।
9.खान-पान के कड़े नियम: व्रत के संपूर्ण दिन और रात के दौरान किसी भी प्रकार के अनाज, दालें, चावल या तामसिक भोजन का सेवन न करें। यह व्रत फलाहारी या निर्जला रखा जाता है।
10.मंदिर दर्शन: इस पावन अवसर पर पास के किसी विष्णु मंदिर में जाकर महाआरती या धार्मिक समारोहों में भाग लें।
11.पारणा या व्रत खोलना (14 फरवरी): द्वादशी की सुबह (07:00 AM से 09:14 AM के बीच) पुनः स्नान व पूजन करें। ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के बाद स्वयं सात्विक भोजन (ताजे फल, गाय का दूध और आलू का सात्विक भोजन, बिना तेल-मसाले के) ग्रहण कर व्रत खोलें।

इस प्रकार, जो भी व्यक्ति वर्ष 2026 में फाल्गुन मास की इस महान विजया एकादशी के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और उसे हर कार्य में निश्चित रूप से विजयश्री प्राप्त होती है।

For Customer
Login Register
Join as Partner

Become Pandit, Agent or Associate
Click below button to register or login

Join as Partner

For any query call us:

+91 9111512346
Your Cart

Your cart is currently empty.
Let us help you find the perfect item!