Online Puja & Pandit Booking
+91 91115 12346

वट सावित्री

वट सावित्री व्रत 2027: सुहाग, आत्मबल और दीर्घायु की महागाथा

वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत पवित्र और श्रद्धापूर्ण पर्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सती सावित्री ने वट वृक्ष (बरगद) के नीचे ही अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा और बुद्धिमत्ता से मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। इसी कारण इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा और परिक्रमा करना परम कल्याणकारी माना जाता है।

भारतीय परंपरा में यह व्रत दो रूपों में रखा जाता है—अमावस्यांत पंचांग के अनुसार जेठ अमावस्या को और पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा को। वर्ष 2027 में इन दोनों व्रतों की तिथियाँ इस प्रकार हैं:

वट सावित्री व्रत 2027: मुख्य तिथियाँ एवं शुभ मुहूर्त

वर्ष 2027 में वट सावित्री व्रत की महत्वपूर्ण पंचांग तिथियाँ और समय नीचे दिए गए हैं, जिनका पालन व्रती महिलाओं को करना चाहिए:

  • वट सावित्री अमावस्या व्रत: शुक्रवार, जून 04, 2027
  • अमावस्या तिथि प्रारम्भ: जून 04, 2027 को सुबह 04:05 ए एम बजे से।
  • अमावस्या तिथि समाप्त: जून 05, 2027 को मध्यरात्रि बाद 01:09 ए एम बजे तक।
  • वट सावित्री पूर्णिमा व्रत: शुक्रवार, जून 18, 2027

ज्योतिषीय विश्लेषण: नक्षत्र, योग और ग्रहों की स्थिति (वर्ष 2027)

वर्ष 2027 का वट सावित्री व्रत (अमावस्या) ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सुहागिन महिलाओं के लिए सुख और सौभाग्य की वृद्धि करने वाले अद्भुत संयोगों के साथ आ रहा है:

  1. रोहिणी नक्षत्र का महासंयोग: 4 जून 2027 को अमावस्या तिथि के दौरान रोहिणी नक्षत्र प्रभावी रहेगा। रोहिणी नक्षत्र को समृद्धि, सौंदर्य और वंश वृद्धि का कारक माना जाता है। माता सावित्री ने भी अखंड सौभाग्य का वरदान इसी ऊर्जा के प्रभाव में प्राप्त किया था।
  2. लक्ष्मी-नारायण योग और ग्रहों की स्थिति: इस दिन धन और वैभव के प्रदाता शुक्र देव अपनी स्वराशि वृषभ (Taurus) में विराजमान रहेंगे। सूर्य देव भी वृषभ राशि में रहकर चंद्र देव के साथ युति करेंगे। शुक्रवार का दिन होना, माता लक्ष्मी के प्रिय नक्षत्र (रोहिणी) का मिलना और शुक्र का अपनी स्वराशि में होना सुहागिनों के जीवन में प्रेम, सामंजस्य और आर्थिक संपन्नता को बढ़ाने वाला 'लक्ष्मी-नारायण कृपा योग' बनाता है।
  3. शनि देव की स्थिति: इस समय शनि देव अपनी अनुकूल राशि में संचरण कर रहे होंगे, जिससे इस दिन वट वृक्ष (जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है) की पूजा करने से कुंडली के सभी प्रकार के ग्रह दोषों और पितृ दोषों का शमन होता है।

सती सावित्री और सत्यवान की पावन व्रत कथा

प्राचीन काल में मद्र देश के एक परम प्रतापी और धर्मात्मा राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे अत्यंत दुखी रहते थे। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों की कठिन साधना के बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया कि उनके घर एक अत्यंत तेजस्वी कन्या का जन्म होगा। सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण इस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर अद्वितीय रूपवान और गुणी हुई। योग्य वर न मिलने के कारण सावित्री के पिता चिंतित थे, इसलिए उन्होंने सावित्री को स्वयं अपना वर तलाशने के लिए तपोवन भेजा। तपोवन में साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, जिनका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था और वे अंधे होकर अपनी पत्नी व पुत्र के साथ वहां कुटिया में रहते थे। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने उन्हें पति के रूप में वरण कर लिया।

जब ऋषिराज नारद को यह बात पता चली, तो वे राजा अश्वपति के पास पहुंचे और बोले, "हे राजन! यह आप क्या कर रहे हैं? सत्यवान सर्वगुण संपन्न, धर्मात्मा और बलवान तो हैं, परंतु वे अल्पायु हैं। आज से ठीक एक वर्ष के बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी।" यह सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए और उन्होंने सावित्री को किसी अन्य योग्य वर को चुनने की सलाह दी।

इस पर सावित्री ने दृढ़ता से कहा, "पिताजी! आर्य कन्याएं अपने पति का वरण जीवन में एक बार ही करती हैं। राजा एक बार ही आज्ञा देता है, पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। अब चाहे जो हो, मेरे पति केवल सत्यवान ही होंगे।" सावित्री के हठ के आगे राजा को झुकना पड़ा और दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही राजसी वैभव भूलकर वनवासी सास-ससुर की सेवा में लीन हो गई। समय बीतता गया और वह दिन करीब आ गया जो नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु के लिए नियत किया था। सावित्री ने मृत्यु के तीन दिन पहले से ही कठिन उपवास शुरू कर दिया। निश्चित तिथि पर सत्यवान जब लकड़ी काटने जंगल जाने लगे, तो सावित्री भी उनके साथ चल पड़ीं।

जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में असहज और तेज दर्द होने लगा। वे व्याकुल होकर पेड़ से नीचे उतरे और सावित्री की गोद में अपना सिर रख दिया। सावित्री समझ गईं कि अंतिम क्षण आ गया है। तभी वहां साक्षात मृत्यु के देवता यमराज आते दिखाई दिए, जो सत्यवान के प्राणों (सूक्ष्म शरीर) को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सती सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें बहुत समझाया कि यह विधि का विधान है, परंतु सावित्री के पातिव्रत्य धर्म के आगे उन्हें झुकना पड़ा। सावित्री की निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा:

  • पहला वरदान: सावित्री ने मांगा कि वनवासी और नेत्रहीन सास-ससुर को दिव्य ज्योति (आंखों की रोशनी) प्राप्त हो जाए। यमराज ने कहा—"तथास्तु!"
  • दूसरा वरदान: सावित्री ने मांगा कि उनके ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए। यमराज ने यह वरदान भी दे दिया और कहा कि अब तुम लौट जाओ।
  • तीसरा वरदान: सावित्री ने अपनी चतुरता और बुद्धिमत्ता से यमराज से 100 संतानों (पुत्रों) की माता बनने और अखंड सौभाग्य का वरदान मांग लिया। यमराज ने बिना सोचे-समझे "तथास्तु" कह दिया।

तब सावित्री ने विनम्रता से यमराज से कहा, "प्रभु! मैं एक पतिव्रता नारी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है, जो मेरे पति के बिना संभव नहीं है।" अपनी ही प्रतिज्ञा के चक्रव्यूह में बंधकर यमराज को मुस्कुराते हुए सत्यवान के प्राणों को मुक्त करना पड़ा।

यमराज के अंतर्ध्यान होने के बाद सावित्री उसी वट वृक्ष के पास लौटीं, जहां उनके पति का मृत शरीर रखा था। वट वृक्ष की अनुकंपा और सती के प्रताप से सत्यवान पुनः जीवित हो उठे। जब वे अपने आश्रम लौटे, तो देखा कि माता-पिता की आंखों की रोशनी वापस आ गई थी और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया था। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक सुख भोगते रहे।

वट सावित्री व्रत की संपूर्ण पूजा विधि

वर्ष 2027 में 4 जून (अमावस्या) और 18 जून (पूर्णिमा) के दिन सुहागिन महिलाएं इस शास्त्रीय विधि से पूजन संपन्न करें:

  1. प्रातः स्नान व संकल्प: व्रती महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि करके स्वच्छ व सुंदर (संभव हो तो लाल या पीले) वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थल की तैयारी: पूजा के स्थान को साफ करके वहां एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। यदि साक्षात वट वृक्ष (बरगद) के पास जाना संभव न हो, तो घर पर बरगद के पेड़ की एक छोटी टहनी लाकर स्थापित करें या बरगद के पेड़ का चित्र/प्रतिमा रखें।
  3. प्रतिमा स्थापना व पूजन: वट वृक्ष के पास माता सावित्री और सत्यवान की मिट्टी की या धातु की प्रतिमा स्थापित करें। मूर्तियों पर रोली, चंदन, अक्षत, मौसमी फल (जैसे आम, लीची, खरबूजा), फूल, भीगे हुए चने और मिठाई अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएं।
  4. कच्चा सूत लपेटना और परिक्रमा: वट वृक्ष या उसकी टहनी के चारों ओर श्रद्धापूर्वक कच्चा सूत (सूत का धागा) या कलावा लपेटें। सूत लपेटते हुए वृक्ष की 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करें। प्रत्येक परिक्रमा पर एक भीगा हुआ चना या फल अर्पित किया जा सकता है।
  5. कथा श्रवण व आरती: परिक्रमा पूर्ण होने के बाद शांत चित्त होकर वट सावित्री व्रत की पावन कथा का पाठ करें या श्रवण करें। इसके बाद माता सावित्री और सत्यवान की आरती उतारें।
  6. आशीर्वाद व पारण: पूजा संपन्न होने के बाद घर के बड़े-बुजुर्गों और सास-ससुर के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें। पूरे दिन व्रत रखने के बाद शाम को यथायोग्य (फलाहार या सात्विक अन्न से) व्रत का पारण करें।

निष्कर्ष

वट सावित्री का यह पावन व्रत हमें सिखाता है कि इच्छाशक्ति, बुद्धिमत्ता और पातिव्रत्य धर्म में इतनी शक्ति होती है कि वह नियति की रेखा को भी बदल सकती है। शास्त्रों के अनुसार, जो भी सुहागिन स्त्री ज्येष्ठ मास में इस कथा का श्रवण करती है और वट वृक्ष की पूजा करती है, उसके दांपत्य जीवन पर आया हुआ हर संकट दूर हो जाता है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास बना रहता है।

॥ जय सती सावित्री माता की! जय सत्यवान नारायण! ॥

For Customer
Login Register
Join as Partner

Become Pandit, Agent or Associate
Click below button to register or login

Join as Partner

For any query call us:

+91 9111512346
Your Cart

Your cart is currently empty.
Let us help you find the perfect item!