सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत बड़ा और गहरा महत्व है। साल भर में कुल 24 एकादशियां आती हैं, जिनमें से वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी अपने नाम के अनुरूप ही भक्तों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। आइए इस महापर्व से जुड़े हर एक पहलू, इसकी पौराणिक कथा, पूजन विधि और इसके सामाजिक व आध्यात्मिक महत्व को पूरी गहराई से समझते हैं।
वरूथिनी एकादशी क्या है और कब आती है?
'वरूथिन्' शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है — 'प्रतिरक्षक', 'कवच' या 'रक्षा करने वाला'। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन पूरी श्रद्धा और कड़े नियमों के साथ व्रत रखता है, भगवान विष्णु स्वयं संकटों और बाधाओं से उसकी रक्षा करते हैं। यह एकादशी हर साल हिंदू कैलेंडर के मुताबिक वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में आती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अमूमन अप्रैल या मई के महीने में पड़ती है।
इस तिथि का एक और विशेष महत्व यह है कि इसी दिन पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की जयंती भी मनाई जाती है, जिससे वैष्णव संप्रदाय के लोगों के लिए इस दिन की पवित्रता और अधिक बढ़ जाती है।
यह क्यों मनाई जाती है?
ऐसी मान्यता है कि अनजाने में मनुष्य के मन, शरीर या वाणी से कई तरह के छोटे-बड़े पाप हो जाते हैं। वरूथिनी एकादशी का व्रत इन सभी संचित पापों के नकारात्मक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है। पद्म पुराण में बताया गया है कि यदि कोई दुखी या अभागिनी स्त्री इस व्रत को नियमपूर्वक करती है, तो उसे सौभाग्य, संतान सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। इसके अलावा पौराणिक काल से यह विश्वास चला आ रहा है कि शारीरिक कष्टों या गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति यदि इस व्रत के पुण्यों को अर्जित करता है, तो उसे उत्तम स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
वरूथिनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हुए एक बेहद प्राचीन कथा सुनाई थी।
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के सुरम्य तट पर राजा मान्धाता नाम के एक राजा राज करते थे। वे बेहद धार्मिक, अत्यंत दानशील और तपस्वी प्रवृत्ति के राजा थे। एक बार राजा मान्धाता अपना राजपाट छोड़कर गहरे जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठकर घोर तपस्या कर रहे थे। वे भगवान के ध्यान में इतने मग्न थे कि उन्हें अपने आस-पास के वातावरण और अपने शरीर का भी कोई होश नहीं था।
उसी समय वहां एक खूंखार जंगली भालू आया और उसने राजा के पैर को चबाना शुरू कर दिया। भालू राजा के पैर को बुरी तरह चबाते हुए उन्हें घसीटकर जंगल के भीतर ले जाने लगा। तपस्या की मर्यादा और अहिंसा के नियम में बंधे होने के कारण राजा मान्धाता ने न तो कोई क्रोध किया और न ही अपनी आत्मरक्षा में भालू पर कोई प्रहार किया। जब पीड़ा असहनीय हो गई, तो उन्होंने करुण भाव से मन ही मन भगवान विष्णु को पुकारा और अपने प्राणों की रक्षा की गुहार लगाई।
भक्त की ऐसी व्याकुल पुकार सुनकर भगवान विष्णु तुरंत वहां प्रकट हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस जंगली भालू का वध कर दिया। भालू के चंगुल से तो राजा छूट गए, लेकिन उनका पैर पूरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका था, जिसके कारण राजा अत्यंत दुखी और निराश रहने लगे।
राजा की ऐसी दशा देखकर भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा कि हे राजन्! तुम उदास मत हो। भालू ने जो तुम्हारा पैर काटा है, वह तुम्हारे पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का फल यानी तुम्हारा प्रारब्ध था। इस शारीरिक कष्ट और मानसिक दुख से मुक्ति पाने के लिए तुम तुरंत मथुरा जाओ और वहां वैशाख कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी का पूरी निष्ठा से व्रत करो। वहां मेरे वराह अवतार की प्रतिमा की पूजा करो। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से तुम्हारा पैर पहले जैसा ही सुदृढ़ और सुंदर हो जाएगा।
राजा मान्धाता ने भगवान विष्णु की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया और मथुरा जाकर पूरी श्रद्धा के साथ वरूथिनी एकादशी का व्रत व पूजन किया। इस व्रत के प्रताप से वे तुरंत ही पूर्ण रूप से रोगमुक्त हो गए और उनके सारे अंग पहले की भांति सुंदर और बलवान हो गए। जीवन के अंत में उन्हें वैकुण्ठ धाम (मोक्ष) की प्राप्ति हुई।
महत्व और महिमा
शास्त्रों में वरूथिनी एकादशी के फल को संसार के सबसे बड़े दानों से भी ऊपर आंका गया है। इसके महत्व को समझाने के लिए अलग-अलग दानों से इसकी तुलना की गई है:
हाथी और घोड़े के दान से बड़ा भूमि का दान माना जाता है। भूमि दान से बड़ा तिल का दान और तिल दान से भी बड़ा स्वर्ण (सोने) का दान माना जाता है। शास्त्रों में स्वर्ण दान से भी श्रेष्ठ अन्न दान को बताया गया है क्योंकि अन्न से देवता, पितर और समस्त मनुष्य तृप्त होते हैं। हिंदू शास्त्रों में कन्यादान को महादान की संज्ञा दी गई है। परंतु वरूथिनी एकादशी के व्रत का फल अन्न दान और कन्यादान दोनों के संयुक्त फल के बराबर अकेले ही प्राप्त हो जाता है।
इसके अलावा मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय एक मन (लगभग 40 किलो) सोना दान करने से जो असीम पुण्य मिलता है, वह पुण्य फल केवल वरूथिनी एकादशी का एक दिन का व्रत रखने से आसानी से मिल जाता है। इस व्रत के महात्म्य को केवल निष्ठापूर्वक पढ़ने या सुनने मात्र से ही एक हजार गायों के दान (गोदान) का फल मिलता है और अंत में मनुष्य को यमलोक की यातनाएं नहीं सहनी पड़तीं।
व्रत के कड़े नियम और वर्जित बातें
इस व्रत का अनुष्ठान केवल एकादशी के एक दिन नहीं, बल्कि पूरे तीन दिनों तक चलता है, जिसमें दशमी, एकादशी और द्वादशी शामिल हैं। इन तीन दिनों में कुछ खास चीजों का त्याग करना अनिवार्य बताया गया है।
दशमी के दिन (एकादशी से एक दिन पहले):
व्रती को दशमी की रात से ही सात्विक जीवनशैली अपना लेनी चाहिए। इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन करना, उड़द की दाल, मसूर की दाल, चना, कोदो (एक प्रकार का मोटा अनाज), शाक (हरी पत्तेदार सब्जियां), शहद, किसी दूसरे का अन्न (पराया अन्न), दिन में दो बार भोजन करना और संभोग (रति क्रिया) जैसी चीजों का पूरी तरह त्याग करना होता है।
एकादशी के दिन (मुख्य व्रत वाले दिन):
इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को जुआ खेलना, दिन के समय सोना, पान खाना, दातून करना (पेड़ की टहनी तोड़ना वर्जित माना जाता है, इसलिए केवल पानी से कुल्ला कर सकते हैं), दूसरों की निंदा या चुगली करना, चोरी, हिंसा, क्रोध और झूठ बोलने जैसी प्रवृत्तियों से पूरी तरह दूर रहना चाहिए।
द्वादशी के दिन (पारणा वाले दिन):
व्रत खोलने वाले दिन भी कुछ नियम लागू रहते हैं। इस दिन भी कांसे के पात्र में भोजन करना, उड़द की दाल खाना, मदिरा, शहद, तेल का सेवन, दो बार भोजन करना और भारी शारीरिक व्यायाम करना वर्जित माना गया है।
विस्तृत पूजन विधि
वरूथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के 'वराह अवतार' या उनके 'मधुसूदन' रूप की पूजा की जाती है। इसकी विस्तृत विधि नीचे दी गई है:
- प्रातः काल का संकल्प: एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले (सुबह 4 से 6 बजे के बीच) उठकर स्नान करें और साफ, स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले रंग के) धारण करें। इसके बाद पूजा घर में हाथ में थोड़ा सा जल और अक्षत लेकर भगवान विष्णु के सामने अपने व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल सजाना: घर के मंदिर में या एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। वहां एक तांबे या मिट्टी के शुद्ध कलश की स्थापना करें, जिसमें गंगाजल, आम के पत्ते और ऊपर एक नारियल (लाल चुनरी में लिपटा हुआ) रखा हो।
- मुख्य पूजा: चौकी पर भगवान विष्णु या उनके वराह अवतार की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। उन्हें गंगाजल के छीटें देकर पवित्र करें। इसके बाद उन्हें पीले फूल, अक्षत (बिना टूटे चावल), धूप, दीप, चंदन और पीला वस्त्र अर्पित करें।
- भोग और तुलसी दल अर्पण: भगवान को मौसमी फल (जैसे खरबूजा, आम) और सात्विक मिठाइयों का भोग लगाएं। याद रखें कि भगवान विष्णु के किसी भी भोग में तुलसी का पत्ता होना अनिवार्य है, अन्यथा वे भोग स्वीकार नहीं करते। ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी का पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए, इसलिए इसे एक दिन पहले (दशमी को) ही तोड़कर रख लें।
- व्रत कथा और आरती: घी का दीपक जलाकर स्थिर मन से वरूथिनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें या दूसरों से सुनें। कथा पूरी होने के बाद 'ॐ जय जगदीश हरे' की आरती गाएं और अंत में कपूर से आरती करके पूरे घर में उसका आशीर्वाद लें।
रात्रि जागरण और पारण
इस व्रत में रात्रि जागरण का अत्यधिक महत्व है। एकादशी की रात को सोना वर्जित माना गया है। भक्त पूरी रात जागकर भगवान विष्णु के भजनों का कीर्तन करते हैं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं या श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करते हैं। ऐसा करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सुबह उठकर पुनः स्नान और पूजा की जाती है। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है या सीधे के रूप में कच्चा राशन और दान-दक्षिणा दी जाती है। इसके बाद ही शुभ मुहूर्त को देखकर व्रती स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करके अपना व्रत खोलता है (जिसे पारणा कहा जाता है)। जो लोग किन्हीं कारणों से व्रत नहीं भी रखते, उन्हें भी इस पवित्र दिन पर चावल, लहसुन, प्याज या तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

