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सोम प्रदोष व्रत

सोम प्रदोष व्रत 2027:

सनातन धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए कई विशेष दिन और व्रत बताए गए हैं, जिनमें प्रदोष व्रत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब यह प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, तो इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार का दिन स्वयं देवों के देव महादेव को समर्पित है और प्रदोष तिथि भी शिव जी की प्रिय तिथि है। इसलिए, सोम प्रदोष का संयोग सोने पर सुहागा माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोम प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य, और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। वर्ष 2027 के अंत में आने वाला सोम प्रदोष व्रत कई दिव्य और दुर्लभ ग्रहीय संयोगों के कारण शिव भक्तों के लिए विशेष फलदायी सिद्ध होने जा रहा है।

सोम प्रदोष व्रत क्या है ?

'प्रदोष' का अर्थ होता है संध्याकाल या रात्रि का प्रारंभ। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास के दोनों पक्षों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) की त्रयोदशी तिथि (13वें दिन) को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन आती है, तो इसे सोम प्रदोष कहा जाता है। सोमवार का कारक ग्रह 'चंद्रमा' है, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है। इसलिए यह व्रत मानसिक तनाव को दूर करने और कुंडली में चंद्र दोष को शांत करने के लिए अचूक माना जाता है।

वर्ष 2027 तिथि, पंचांग एवं शुभ मुहूर्त

वर्ष 2027 के पंचांगीय विन्यास के अनुसार, मार्गशीर्ष/पौष मास के संक्रमण काल में दिसम्बर 2027 को सोम प्रदोष व्रत का अत्यंत पावन संयोग बन रहा है:

  • सोम प्रदोष व्रत तिथि: सोमवार, दिसम्बर 20, 2027
  • त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ: दिसम्बर 20, 2027 को दोपहर 12:45 बजे से
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त: दिसम्बर 21, 2027 को सुबह 10:12 बजे तक
  • प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: सोमवार, दिसम्बर 20, 2027 को शाम 17:21 (05:21 PM) से रात 20:06 (08:06 PM) तक
  • अवधि: 02 घण्टे 45 मिनट्स

खरमास का विशेष काल : ध्यान रहे कि इस समय सूर्य देव धनु राशि में गोचर कर रहे होंगे, जिससे देश भर में खरमास (धनुर्मास) प्रभावी रहेगा। खरमास में भले ही भौतिक मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, मुंडन) वर्जित होते हैं, परंतु शिव उपासना, जप, तप और प्रदोष काल की साधना का फल इस अवधि में अनंत गुना बढ़ जाता है।

वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय एवं ग्रहीय विन्यास

दिसम्बर 2027 का यह सोम प्रदोष व्रत खगोलीय और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से एक महासंयोग का निर्माण कर रहा है:

  1. सोमवार, त्रयोदशी और चंद्र देव का नक्षत्र योग : यह व्रत सोमवार के दिन पड़ रहा है। इस पावन तिथि पर चंद्रमा अपनी स्वराशि या मित्र राशि में संचरण करते हुए शिव साधना के लिए अत्यंत अनुकूल मानसिक वातावरण तैयार करेंगे। सोमवार और प्रदोष का यह मिलन कुंडली में कमजोर चंद्रमा को बलवान करने तथा 'चंद्र दोष' व 'ग्रहण दोष' के अशुभ प्रभावों को शांत करने की अचूक तिथि है।
  2. धनु राशि में सूर्य (धनुर्मास का शिव प्रभाव) : सूर्य देव इस समय गुरु की राशि धनु में मौजूद होंगे। सूर्य (आत्मा) और गुरु (ज्ञान) का यह प्रभाव जब सोमवार के दिन महादेव की प्रिय तिथि से जुड़ता है, तो साधकों को गहरे ध्यान और आत्मिक शुद्धि में अपार सफलता मिलती है।
  3. शिव-शक्ति योग : इस दिन शिव जी के साथ माता पार्वती की संयुक्त पूजा करने से घर के समस्त क्लेश दूर होते हैं और अशांत मन को परम शांति की प्राप्ति होती है।

सोम प्रदोष व्रत कैसे मनाया जाता है?

सोम प्रदोष व्रत पूरे भारत में, विशेषकर उत्तर और मध्य भारत में, बड़े ही भक्तिभाव से मनाया जाता है। इस दिन शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

  • मंदिरों की सजावट: शिव मंदिरों को फूलों और सुंदर लाइटों से सजाया जाता है।
  • सामूहिक भजन-कीर्तन: शाम के समय मंदिरों में सामूहिक रूप से 'शिव चालीसा', 'महामृत्युंजय मंत्र' और शिव भजनों का गायन होता है।

इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

क्या करें:

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सोमवार, 20 दिसम्बर को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें।
  • सात्विक रहें: पूरे दिन मन में "ॐ नमः शिवाय" का जाप करते रहें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
  • दान-पुण्य: इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को सफेद वस्तुएं जैसे दूध, चावल या चीनी दान करना अत्यंत शुभ होता है।
  • प्रदोष काल में पूजा: शाम 17:21 से 20:06 के बीच की मुख्य पूजा को कभी न छोड़ें, क्योंकि यही इस व्रत का मुख्य प्राण है।

क्या न करें:

  • क्रोध और विवाद से बचें: इस दिन किसी पर गुस्सा न करें, झूठ न बोलें और घर में शांति का माहौल बनाए रखें।
  • तामसिक भोजन का त्याग: व्रत के दिन और एक दिन पहले से ही लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से पूरी तरह दूर रहें।
  • वर्जित वस्तुएं न चढ़ाएं: शिव जी की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्ते, सिंदूर (केवल शिवलिंग पर वर्जित, माता पार्वती को चढ़ाएं) और केतकी का फूल न चढ़ाएं।

विस्तृत पूजन विधि

सोम प्रदोष की पूजा दो चरणों में होती है—सुबह की संक्षिप्त पूजा और शाम की मुख्य (प्रदोष काल) पूजा।

आवश्यक पूजन सामग्री:

गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, दही, शहद, घी, बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते, सफेद चंदन, अक्षत (साबुत चावल), जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, और सफेद मिठाइयां।

पूजा की चरणबद्ध प्रक्रिया:

  • प्रातः काल की पूजा : 20 दिसम्बर की सुबह स्नान के बाद स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में दीया जलाएं और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करें।
  • प्रदोष काल (शाम की मुख्य पूजा - 17:21 से 20:06) : शाम को सूर्यास्त से ठीक पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं।
  • अभिषेक और श्रृंगार : सबसे पहले शिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक करें (गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद)। अभिषेक के बाद शिव जी को सफेद चंदन का तिलक लगाएं। अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, भांग और शमी पत्र अर्पित करें। माता पार्वती को सिंदूर और चुनरी चढ़ाएं।
  • भोग और मंत्र जाप : भगवान शिव को सफेद रंग की मिठाई (जैसे खीर या पेड़ा) का भोग लगाएं। आसन पर बैठकर कम से कम 108 बार "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। अंत में सोम प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें और कपूर जलाकर शिव-गोरी की आरती करें।

सोम प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा

सोम प्रदोष व्रत की कथा एक गरीब ब्राह्मणी और उसके पुत्र से जुड़ी है, जो इस व्रत के चमत्कारी महत्व को दर्शाती है।

राजकुमार से भेंट

पौराणिक काल में एक ब्राह्मणी थी, जिसके पति का देहांत हो चुका था। वह भीख मांगकर जो कुछ पाती, उसी से अपना और अपने बच्चे का पेट पालती थी। एक दिन जब ब्राह्मणी भीख मांगकर घर लौट रही थी, तो उसे नदी किनारे एक बालक अत्यंत घायल और असहाय अवस्था में मिला। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। शत्रुओं ने उसके राज्य पर आक्रमण करके उसके पिता को बंदी बना लिया था। ब्राह्मणी ने दयापूर्वक उस राजकुमार को अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह उसका पालन-पोषण करने लगी।

ऋषि शांडिल्य का उपदेश

कुछ समय बाद, ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर देवयोग से ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुंची। वहाँ ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को सोम प्रदोष व्रत के महत्व के बारे में बताया और उसे यह व्रत नियमपूर्वक करने की विधि सिखाती। ब्राह्मणी ने ऋषि के कहे अनुसार दोनों बालकों के साथ सोम प्रदोष का व्रत रखना और शिव जी की पूजा करना शुरू कर दिया।

राज्य की पुनः प्राप्ति

कुछ समय बाद, वह राजकुमार वन में घूमते समय एक सुंदर गंधर्व कन्या 'अंशुमती' से मिला और भगवान शिव की प्रेरणा से उन दोनों का विवाह हो गया। इसके बाद, राजकुमार ने गंधर्व राज की सेना की मदद से अपने विदर्भ देश पर दोबारा आक्रमण किया और शत्रुओं को पराजित कर अपना खोया हुआ राज्य वापस पा लिया। राजकुमार ने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया और ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया।

यह सब सुख-वैभव और खोया हुआ राज्य उन दोनों को सोम प्रदोष व्रत के प्रभाव से ही प्राप्त हुआ था। तब से यह मान्यता सुदृढ़ हो गई कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं।

निष्कर्ष

दिसम्बर 2027 का यह सोम प्रदोष व्रत खरमास की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और सोमवार के पावन संयोग के कारण भगवान शिव की असीम कृपा पाने का सबसे सरल और अचूक माध्यम है। यदि आप भी जीवन में मानसिक अशांति, आर्थिक तंगी या स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो इस शुभ मुहूर्त में पूरी श्रद्धा और नियम के साथ महादेव की आराधना कर सकते हैं।

हर हर महादेव !

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