स्कंद षष्ठी: भगवान कार्तिकेय की शक्ति और विजय का पर्व
स्कंद षष्ठी, जिसे कंध षष्ठी या सुब्रमण्यम षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को समर्पित एक अत्यंत पावन दिन है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और भक्तों के जीवन से बाधाओं को दूर करने का प्रतीक माना जाता है।
यह पर्व कब आता है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, स्कंद षष्ठी हर महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है।
- मासिक पर्व: यह व्रत हर माह आता है, लेकिन कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) और आषाढ़ (जून-जुलाई) मास की स्कंद षष्ठी का महत्व सबसे अधिक है।
- मुख्य उत्सव: दक्षिण भारत में कार्तिक मास की षष्ठी को 'सूरसम्हारम' के रूप में बड़े स्तर पर मनाया जाता है।
स्कंद षष्ठी क्या है?
भगवान कार्तिकेय देवताओं के सेनापति हैं। 'स्कंद' उनका एक प्रमुख नाम है और 'षष्ठी' वह तिथि है जिस दिन उन्होंने अपनी शक्ति का परिचय दिया था। यह दिन साहस, अनुशासन और जीत का उत्सव है। उत्तर भारत में इन्हें भगवान गणेश का बड़ा भाई माना जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इन्हें 'मुरुगन' के नाम से छोटे भाई के रूप में पूजा जाता है।
पौराणिक कथा: तारकासुर का वध
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नाम के राक्षस ने ब्रह्मा जी से वरदान लिया था कि उसे केवल शिव-पुत्र ही मार सकता है। उसने सोचा कि महादेव तो समाधि में लीन हैं, अतः उनका पुत्र होना असंभव है। इस अहंकार में उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया।
देवताओं की प्रार्थना पर शिव और शक्ति के तेज से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। उन्हें देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया। स्कंद षष्ठी के दिन ही कार्तिकेय जी ने अपने दिव्य अस्त्र 'वेल' (भाला) से तारकासुर का वध किया और धर्म की स्थापना की। इसी विजय की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।
पूजा विधि: कैसे करें पूजन?
स्कंद षष्ठी के दिन भक्त कठोर संयम और नियमों का पालन करते हैं:
- प्रातः काल स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र स्नान करें और स्वच्छ (संभव हो तो लाल या पीले) वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ ही शिव-पार्वती की भी पूजा करें।
- अभिषेक: मूर्ति पर जल, दूध, दही, घी और शहद (पंचामृत) से अभिषेक करें।
- अर्पण: उन्हें चंदन, अक्षत, सिंदूर, नीले फूल (या लाल फूल) और मोरपंख अर्पित करें। मोरपंख और नीला रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान "ॐ स्कन्दाय नमः" या "ॐ शरवणभवाय नमः" का निरंतर जाप करें।
- आरती और कथा: स्कंद षष्ठी की व्रत कथा का पाठ करें और अंत में कपूर से आरती करें।
इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
क्या करें:
- उपवास: कई भक्त इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं।
- कंध षष्ठी कवचम: इस शक्तिशाली स्तोत्र का पाठ करने से भय और शत्रुओं का नाश होता है।
- दान: गरीबों को फल, वस्त्र या अनाज का दान करना शुभ माना जाता है।
- शयन: शास्त्रों के अनुसार इस दिन जमीन पर सोना शुभ माना गया है।
क्या न करें:
- तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) और मदिरा का पूरी तरह त्याग करें।
- किसी भी प्रकार के विवाद, क्रोध या किसी की निंदा न करें।
- ब्रह्मचर्य का कड़ाई से पालन करें।
व्रत का फल और लाभ
- संतान सुख: यह व्रत उन दंपत्तियों के लिए विशेष फलदायी है जो संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं।
- मंगल दोष निवारण: जिनकी कुंडली में मंगल दोष है, उनके लिए कार्तिकेय जी की पूजा अचूक उपाय है।
- साहस और विजय: यह व्रत शत्रुओं पर विजय दिलाने और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है।
निष्कर्ष:
स्कंद षष्ठी केवल एक बाहरी युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के नकारात्मक विचारों (राक्षसों) पर नियंत्रण पाने का आध्यात्मिक अभ्यास है। भगवान मुरुगन की कृपा से जीवन में ज्ञान और विजय का प्रकाश फैलता है।
।। ॐ शरवण भवाय नमः ।।

