शाकम्भरी पूर्णिमा 2027:
हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन पौष मास की पूर्णिमा का स्थान बेहद अद्वितीय है। इस दिन को 'शाकम्भरी पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। यह पावन पर्व जगत जननी मां दुर्गा के ममतामयी और पोषणकारी स्वरूप 'मां शाकम्भरी' को समर्पित है। मां शाकम्भरी को वनस्पतियों, साग-सब्जियों, फलों और अन्न की देवी माना जाता है।
यह त्योहार हमें प्रकृति से जुड़ने, पर्यावरण का सम्मान करने और पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने वाली वनस्पतियों के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देता है।
शाकम्भरी पूर्णिमा क्या है?
'शाकम्भरी' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: 'शाक' (जिसका अर्थ है साग-सब्जी या वनस्पति) और 'भरी' (जिसका अर्थ है पोषण करने वाली या धारण करने वाली)। अर्थात, जो देवी अपने अंगों से उत्पन्न शाक-भाजी से संसार का भरण-पोषण करती हैं, वे ही मां शाकम्भरी हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शाकम्भरी पूर्णिमा के दिन मां दुर्गा ने संसार को भयंकर अकाल और सूखे से बचाने के लिए शाकम्भरी देवी के रूप में अवतार लिया था। वे आदिशक्ति का ही एक सौम्य और करुणामयी स्वरूप हैं। इस दिन को 'शाकम्भरी जयंती' भी कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पौष शुक्ल अष्टमी से शुरू होने वाला 'शाकम्भरी नवरात्रि' का महापर्व इसी दिन (पूर्णिमा) संपन्न होता है।
वर्ष 2027 में तिथि, मुहूर्त एवं समय
वर्ष 2027 में शाकम्भरी पूर्णिमा जनवरी के महीने में कड़ाके की ठंड के बीच मनाई जाएगी। इस समय खेतों में सरसों, bथुआ, मेथी, पालक जैसी हरी सब्जियों की बहार होती है। वर्ष 2027 के लिए मुख्य तिथि और मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- शाकम्भरी पूर्णिमा तिथि: शुक्रवार, जनवरी 22, 2027
- पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: जनवरी 21, 2027 को 09:29 PM बजे से
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: जनवरी 22, 2027 को 05:46 PM बजे तक
विशेष नोट: चूंकि उदयातिथि 22 जनवरी को प्राप्त हो रही है, इसलिए पूर्णिमा का व्रत, स्नान-दान और मुख्य पूजा 22 जनवरी 2027, शुक्रवार को ही की जाएगी। शाकम्भरी नवरात्रि का समापन भी इसी दिन होगा।
वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय विश्लेषण: ग्रह, नक्षत्र और गोचर
वर्ष 2027 की शाकम्भरी पूर्णिमा ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोगों को लेकर आ रही है। शुक्रवार का दिन होने और पूर्णिमा तिथि के विशाखा/अनुराधा नक्षत्र के प्रभाव में आने से इस दिन की शक्ति कई गुना बढ़ गई है:
1. तिथि और दिन का अद्भुत संयोग
पूर्णिमा तिथि स्वयं मां लक्ष्मी और चंद्र देव को प्रिय है। 22 जनवरी 2027 को शुक्रवार का दिन है, जो साक्षात धन-धान्य की देवी मां लक्ष्मी (आदिशक्ति) का दिन माना जाता है। शुक्रवार के दिन शाकम्भरी पूर्णिमा का आना घर में सुख, समृद्धि और वैभव के लिए एक अचूक संयोग है।
2. नक्षत्र और चंद्रमा की स्थिति
- चंद्रमा का गोचर: इस दिन चंद्रमा अपनी नीच राशि वृश्चिक में संचार करेंगे, परंतु सूर्यदेव मकर राशि (उत्तरायण काल) में उपस्थित रहेंगे। सूर्य और चंद्रमा का यह समसप्तक योग मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति देने वाला है।
- नक्षत्र प्रभाव: इस दिन पुष्य और अश्लेषा (अष्टमी/नवमी के आरंभ काल से होते हुए) के गोचर चक्र के बाद पूर्णिमा के दिन पुनर्वसु और पुष्य का प्रभाव विभिन्न रूपों में देखने को मिलेगा। विशेष रूप से यह समय साधना के लिए उत्तम है।
3. महत्वपूर्ण योग
इस दिन सूर्य के मकर राशि में होने से 'खग्रास/उत्तरायण पुण्यकाल' का प्रभाव रहेगा। इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है। शुक्र और गुरु की शुभ स्थिति के कारण इस दिन 'गजकेसरी' और 'लक्ष्मी नारायण' जैसे सूक्ष्म शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो अकाल मृत्यु और दरिद्रता का नाश करने वाले हैं।
शाकम्भरी पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों में मां शाकम्भरी को 'शताक्षी' और 'दुर्गा' का ही रूप माना गया है। इस दिन का महत्व निम्नलिखित कारणों से अत्यधिक है:
- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: यह त्योहार हमें यह याद दिलाता है कि हमारा जीवन पूरी तरह से प्रकृति और वनस्पतियों पर निर्भर है।
- दुखों का निवारण: मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और मां की पूजा करने से घर में कभी धन-धान्य, अन्न और जल की कमी नहीं होती।
- दांपत्य और संतान सुख: महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि और बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
इस दिन क्या किया जाता है?
शाकम्भरी पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु कई तरह के धार्मिक और सामाजिक कार्य करते हैं:
- पवित्र नदियों में स्नान: इस दिन गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने का बहुत महत्व है। यदि नदी स्नान संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है।
- दान-पुण्य: पूर्णिमा तिथि दान के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। इस दिन विशेष रूप से कच्ची सब्जियां, फल, अनाज और गर्म कपड़ों का दान जरूरतमंदों को किया जाता है।
- शाक-भाजी का भोग और वितरण: इस दिन घरों और मंदिरों में मां को तरह-तरह की हरी सब्जियों का भोग लगाया जाता है और उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
- अन्नकूट महोत्सव: कई मंदिरों में इस दिन विशाल अन्नकूट या शाकंभरी उत्सव का आयोजन होता है, जहां सैकड़ों किलो सब्जियों को मिलाकर एक विशेष प्रसाद (मिक्स वेज) बनाया जाता है।
मां शाकम्भरी पूजन विधि
शाकम्भरी पूर्णिमा की पूजा बेहद अनूठी होती है क्योंकि इसमें पारंपरिक पूजा सामग्री के साथ-साथ ताजी हरी सब्जियों और फलों का बहुतायत में उपयोग किया जाता है।
आवश्यक सामग्री:
मां दुर्गा या मां शाकम्भरी की तस्वीर/मूर्ति, चौकी, लाल कपड़ा, गंगाजल, कुमकुम, अक्षत (चावल), रोली, कलावा, धूप, दीप, कपूर और शुद्ध देसी घी। इसके साथ ही विशेष सामग्री के रूप में मौसमी हरी सब्जियां (जैसे- पालक, मेथी, बथुआ, लौकी, तोरई, मटर, गोभी), ताजे फल, फूल और भोग के लिए हलवा, पूरी या खीर।
विस्तृत पूजा विधि:
- ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के) धारण करें।
- व्रत का संकल्प लें: हाथ में जल और अक्षत लेकर मां शाकम्भरी के सामने व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- चौकी की स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर मां शाकम्भरी या मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें।
- सब्जियों की सजावट: मां की मूर्ति के चारों ओर ताजी हरी सब्जियों, साग और फलों को कलात्मक रूप से सजाएं। यह इस पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- अभिमंत्रण और तिलक: मां को गंगाजल के छींटे दें। इसके बाद उन्हें कुमकुम, चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
- धूप-दीप प्रज्वलित करें: गाय के घी का दीपक जलाएं और धूप बत्ती सुलगाएं। मां को लाल रंग के पुष्प या फूलों की माला अर्पित करें।
- भोग लगाएं: मां को ऋतु फलों, हरी सब्जियों और घर में बने शुद्ध भोजन (जैसे- हलवा-पूरी या खीर) का भोग लगाएं।
- कथा और आरती: मां शाकम्भरी की प्राकट्य कथा का श्रवण या वाचन करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा का पाठ करें और अंत में मां की कपूर से आरती उतारें।
- क्षमा याचना: पूजा के अंत में अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए मां से क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद को सभी में वितरित करें।
मां शाकम्भरी के प्राकट्य की पौराणिक कथा
देवी भागवत पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती के 'मूर्ती रहस्य' में मां शाकम्भरी के प्राकट्य की कथा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
भयंकर अकाल और रुरु का पुत्र 'दुर्गमासुर'
पौराणिक काल में 'दुर्गमासुर' नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर दैत्य हुआ। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो दुर्गमासुर ने उनसे चारों वेदों को अपने वश में करने और देवताओं को शक्तिहीन करने का वरदान मांग लिया। वेदों के लुप्त हो जाने के कारण पृथ्वी से ब्राह्मणों का तेज, यज्ञ, हवन और धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह समाप्त हो गए।
इसके परिणामस्वरूप देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया। पृथ्वी पर लगातार 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियां, तालाब, कुएं सब सूख गए। चारों तरफ हाहाकार मच गया। पानी और अन्न के अभाव में मनुष्य, पशु-पक्षी और वनस्पतियां तड़प-तड़प कर मरने लगे।
देवताओं की करुण पुकार और मां का 'शताक्षी' रूप
इस महाविपत्ति से मुक्ति पाने के लिए सभी देवता, ऋषि-मुनि और मानव हिमालय की कंदराओं में एकत्रित हुए और उन्होंने आदिशक्ति जगदम्बा की कठोर आराधना की। सबकी करुण पुकार सुनकर मां भगवती अत्यंत द्रवित हो उठीं। वे अनंत नेत्रों वाली देवी के रूप में प्रकट हुईं। मां ने जब पृथ्वी की ऐसी दयनीय स्थिति देखी, तो उनके सौ नेत्रों (शताक्षी) से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी। मां के आंसुओं से पूरी पृथ्वी गीली हो गई, सूखी नदियों और समुद्रों में फिर से जल भर गया और चारों तरफ हरियाली छाने लगी।
मां का 'शाकम्भरी' अवतार
जल का संकट दूर होने के बाद भी जीवों की भूख शांत नहीं हुई थी। तब मां भगवती ने अपने दिव्य शरीर से अनंत प्रकार की जड़ी-बूटियां, हरी सब्जियां (शाक), कंद-मूल और स्वादिष्ट फल उत्पन्न किए। मां ने स्वयं इन शाक-भाजियों को अपने हाथों में धारण किया और भूखे जीवों का भरण-पोषण किया। चूंकि मां ने शाक (वनस्पतियों) के माध्यम से संसार की रक्षा की, इसलिए उनका नाम 'शाकम्भरी' पड़ा। श्री दुर्गा सप्तशती में मां स्वयं कहती हैं:
"ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकौः॥
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि।"
(अर्थात: जब मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाकों द्वारा संसार का पोषण करूंगी, तब पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' नाम से विख्यात होऊंगी।)
दुर्गमासुर का वध और वेदों की वापसी
जब दुर्गमासुर को इस बात का पता चला, तो उसने अपनी विशाल सेना के साथ देवी पर आक्रमण कर दिया। मां शाकम्भरी ने देवताओं और ऋषियों की रक्षा के लिए एक विशाल सुरक्षा कवच बनाया और दुर्गमासुर के साथ भयंकर युद्ध किया। अंत में, मां ने अपने त्रिशूल से दुर्गमासुर का वध कर दिया। उसके वध के साथ ही मां ने उसके शरीर से चारों वेदों को मुक्त कराया और पुनः देवताओं को सौंप दिया। दुर्गमासुर का वध करने के कारण मां का एक नाम 'दुर्गा' भी पड़ा।
भारत में प्रमुख शाकम्भरी देवी मंदिर
शाकम्भरी पूर्णिमा के दिन देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित मां शाकम्भरी के शक्तिपीठों पर भव्य मेलों और उत्सवों का आयोजन होता है। भारत के प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं:
- शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ (सहारनपुर, उत्तर प्रदेश): यह मां शाकम्भरी का सबसे प्रमुख और प्राचीन सिद्धपीठ है। यहां माता की मूर्ति के साथ अनूठी शाक-सब्जियों की सजावट देखते ही बनती है। उत्तर भारत के श्रद्धालुओं के लिए यह एक परम पवित्र स्थल है।
- शाकम्भरी माता मंदिर (साकंभरी - सांभर, राजस्थान): यह मंदिर राजस्थान की प्रसिद्ध नमक की झील के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित है। चौहान वंश की कुलदेवी के रूप में मां की यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और यहाँ का प्राकृतिक परिवेश बहुत दिव्य है।
- बणशंकरी अम्मा मंदिर (बादामी, कर्नाटक): दक्षिण भारत में मां शाकम्भरी को 'बनशंकरी' (अर्थात वनों की देवी) कहा जाता है। बादामी में स्थित इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है और यहाँ प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला 'बनशंकरी जात्रे' (वार्षिक मेला) पूरे दक्षिण भारत में बहुत प्रसिद्ध है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में शाकम्भरी पूर्णिमा की प्रासंगिकता
आज के युग में, जहां ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, वनों की कटाई और पर्यावरण असंतुलन एक गंभीर समस्या बन चुके हैं, शाकम्भरी पूर्णिमा का त्योहार और भी प्रासंगिक हो जाता है।
- पर्यावरण संरक्षण का संदेश: यह पर्व हमें सिखाता है कि पेड़-पौधों और वनस्पतियों में भी ईश्वरीय अंश है। पर्यावरण की रक्षा करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है।
- सात्विक जीवन (प्राकृतिक जीवन): मां शाकम्भरी की पूजा हमें कृत्रिम रसायनों से दूर रहकर प्रकृति द्वारा दिए गए शुद्ध, सात्विक और शाकाहारी भोजन को अपनाने की प्रेरणा देती है।
- जल और अन्न का सम्मान: यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि पानी की एक-एक बूंद और अन्न का एक-एक दाना कितना कीमती है, जिसे हमें कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।
निष्कर्ष:
शाकम्भरी पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के अटूट रिश्ते का उत्सव है। इस वर्ष 22 जनवरी 2027 को हमें न केवल मां की पूजा करनी चाहिए, बल्कि प्रकृति की रक्षा के लिए कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प भी लेना चाहिए।

