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रामलला प्राण प्रतिष्ठा दिवस

रामलला प्राण प्रतिष्ठा दिवस भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। सदियों के इंतजार, अनगिनत संघर्षों और करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के प्रतिफल के रूप में यह दिवस अस्तित्व में आया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक है।

रामलला प्राण प्रतिष्ठा दिवस क्या है?

सनातन धर्म में 'प्राण प्रतिष्ठा' एक बेहद पवित्र और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब किसी मूर्ति का निर्माण होता है, तो वह केवल पाषाण (पत्थर) या धातु की एक सुंदर संरचना होती है। प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान द्वारा उस मूर्ति में वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजन और पवित्र वैदिक गतिविधियों से 'प्राण' यानी दैवीय ऊर्जा का संचार किया जाता है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद वह मूर्ति 'जीवंत विग्रह' यानी भगवान का साक्षात रूप बन जाती है और पूजा के योग्य होती है।

अयोध्या में प्रभु श्री राम के बाल रूप (रामलला) के नूतन विग्रह को उनके भव्य और दिव्य जन्मभूमि मंदिर के गर्भगृह में स्थापित करने के इस परम पावन उत्सव को 'रामलला प्राण प्रतिष्ठा दिवस' कहा जाता है। यह दिन राम जन्मभूमि आंदोलन के सफल समापन और रामराज्य की परिकल्पना के धरातल पर उतरने का महापर्व है।

यह कब मनाया जाता है?

रामलला की ऐतिहासिक प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को संपन्न हुई थी। हिंदू पंचांग के अनुसार उस दिन पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि थी और विक्रम संवत 2080 चल रहा था। इस दिन आकाश में मृगशिरा नक्षत्र और आनंद योग का अद्भुत संयोग बना था, जिसे ज्योतिष शास्त्र में बेहद शुभ माना जाता है।

इस ऐतिहासिक घटना के बाद से, अब हर वर्ष 22 जनवरी को पूरे देश और दुनिया में 'रामलला प्रतिष्ठा दिवस' या 'अयोध्या दीपोत्सव' के रूप में मनाया जाता है। कई लोग इसे पारंपरिक पंचांग के अनुसार पौष शुक्ल द्वादशी को भी मनाते हैं।

यह क्यों मनाया जाता है?

इस दिवस को मनाए जाने के पीछे 500 वर्षों का लंबा संघर्ष, कानूनी लड़ाई और करोड़ों भक्तों का त्याग छिपा है।

  • पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भ
    त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर माता कौशल्या के गर्भ से श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। अयोध्या उनकी जन्मभूमि है। मध्यकाल में, सन 1528 के दौरान विदेशी आक्रमणकारी बाबर के सेनापति मीर बांकी ने अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर को तोड़कर वहां एक ढांचे का निर्माण करवा दिया था। तभी से हिंदू समाज अपनी इस सबसे पवित्र भूमि को वापस पाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा था। इस दौरान कई युद्ध हुए और अनगिनत रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
  • कानूनी विजय और मंदिर निर्माण
    दशकों तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, 9 नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने विवादित भूमि को रामलला विराजमान का माना और वहां भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर का भूमि पूजन किया। महज साढ़े तीन साल के भीतर मंदिर का प्रथम तल और गर्भगृह बनकर तैयार हुआ, जहां रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की गई। यह दिन अन्याय पर न्याय की और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।

रामलला की मूर्ति की अलौकिक विशेषताएँ

जिस विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की गई, वह अत्यंत दिव्य और सम्मोहक है। इस मूर्ति को कर्नाटक के प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बनाया है। मूर्ति का निर्माण 'कृष्ण शिला' यानी काले पत्थर से किया गया है, जिसकी आयु हजारों वर्ष मानी जाती है। इस पत्थर की विशेषता यह है कि इस पर दूध या जल के अभिषेक से मूर्ति को कोई नुकसान नहीं होता।

यह भगवान श्री राम के 5 वर्ष के बालक का स्वरूप है, जिसकी ऊंचाई 51 इंच है। यदि आप मूर्ति को ध्यान से देखें, तो इसके चारों ओर बने आभामंडल में भगवान विष्णु के 10 अवतारों—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को उकेरा गया है। मूर्ति के निचले हिस्से में एक तरफ हनुमान जी और दूसरी तरफ गरुड़ जी के चित्र भी बने हैं, जो इसकी दिव्यता को कई गुना बढ़ा देते हैं।

इस दिन क्या-क्या किया जाता है और कैसे मनाते हैं?

इस उत्सव को पूरे भारत और वैश्विक स्तर पर 'द्वितीय दिवाली' (दूसरी दीपावली) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देश भर में कई तरह के आयोजन होते हैं।

  1. घरों और मंदिरों की सजावट
    शाम के समय हर घर, गली, चौराहे और मंदिरों में मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। लोग अपने घरों को रंग-बिरंगी लाइटों और गेंदे के फूलों से सजाते हैं। घरों के मुख्य द्वार पर सुंदर रंगोली बनाई जाती है और आम के पत्तों का तोरण बांधा जाता है।
  2. धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन
    इस दिन जगह-जगह पर 24 घंटे का अखंड रामायण या रामचरितमानस का पाठ आयोजित किया जाता है। कॉलोनियों और सोसायटियों में सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन के कार्यक्रम होते हैं, जहां "राम आएंगे" और "नगरी हो अयोध्या सी" जैसे भजनों पर लोग झूमते हैं। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर भंडारे आयोजित किए जाते हैं, जिसमें हलवा, पूरी और बूंदी के लड्डू का प्रसाद बांटा जाता है।

प्राण प्रतिष्ठा की शास्त्रीय पूजन विधि

शास्त्रों के अनुसार, प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान अत्यंत जटिल और कई दिनों तक चलने वाली प्रक्रिया है। अयोध्या में यह अनुष्ठान सात दिनों तक चला था, जिसकी मुख्य विधियां इस प्रकार थीं:

सबसे पहले यजमान द्वारा सरयू नदी में स्नान कर शुद्धि और अनुष्ठान का 'संकल्प' लिया गया। इसके बाद 'जलाधिवास' हुआ, जिसमें मूर्ति को पवित्र जल में डुबाकर रखा गया ताकि पत्थर की सभी अशुद्धियां दूर हो सकें। इसके बाद क्रमवार 'धान्याधिवास' (अनाज के बीच रखना), 'घृताधिवास' (घी में रखना) और 'गंधाधिवास' (सुगंधित द्रव्यों में रखना) की प्रक्रियाएं पूरी की गईं।

इसके बाद मूर्ति को नए वस्त्रों और बिस्तरों पर 'शय्याधिवास' कराया गया। मुख्य दिन गर्भगृह में 81 कलशों के पवित्र जल से नवग्रह पूजा और महाहवन किया गया। इस अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण क्षण 'चक्षु उन्मीलन' (आंखें खोलना) था। इसमें सोने की शलाका (सलाई) से शहद और घी लगाकर रामलला की आंखों से पट्टी हटाई गई और उन्हें पहली बार दर्पण दिखाया गया। अंत में, प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण होने पर भगवान को छप्पन भोग लगाया गया और पहली महाआरती की गई।

घर पर 'रामलला प्रतिष्ठा दिवस' कैसे मनाएं?

यदि आप घर पर इस उत्सव को मनाना चाहते हैं, तो बहुत ही सरल और भावपूर्ण विधि से पूजन कर सकते हैं:

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या नए वस्त्र (विशेषकर पीले या भगवा रंग के) धारण करें। इसके बाद अपने पूजा घर में एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर अक्षत (चावल) रखकर कलश स्थापित करें। चौकी पर श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर रखें। यदि आपके पास बाल रूप (रामलला) की तस्वीर है, तो उसे विशेष स्थान दें। मूर्तियों को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद चंदन, रोली, अक्षत, धूप और फूल अर्पित करें। भगवान राम को केसरिया भात (मीठे चावल), खीर या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। याद रखें कि भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें, क्योंकि इसके बिना विष्णु अवतार का भोग अधूरा माना जाता है। इसके बाद राम रक्षा स्तोत्र या "ॐ रामाय नमः" मंत्र का जाप करें। शाम के समय घर के मंदिर और मुख्य द्वार पर कम से कम 5 या 11 घी के दीपक जलाकर दीपोत्सव मनाएं।

इस उत्सव के अन्य महत्वपूर्ण पहलू

इस भव्य उत्सव के कुछ ऐसे अनूठे पहलू भी हैं जो इसके महत्व को और अधिक बढ़ा देते हैं:

  • राष्ट्रीय एकता और समरसता का प्रतीक
    रामलला की प्राण प्रतिष्ठा ने जाति, वर्ग और क्षेत्र की दीवारों को तोड़कर पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया। मंदिर के निर्माण और अनुष्ठानों में समाज के हर वर्ग—चाहे वे आदिवासी हों, पिछड़े हों या समाज के किसी भी तबके के लोग हों—सभी की सहभागिता रही। यह त्रेतायुग के उस रामराज्य की याद दिलाता है जहां राम ने शबरी के बेर खाए थे और केवट को गले लगाया था।
  • वैश्विक उत्सव
    यह त्योहार केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। जब अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी, तब अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर की विशाल स्क्रीन्स पर प्रभु राम की तस्वीरें प्रदर्शित की जा रही थीं। पेरिस के एफिल टॉवर से लेकर ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मॉरीशस जैसे देशों में भव्य रैलियां और दीपोत्सव मनाए गए। दुनिया भर के हिंदू प्रवासियों ने इसे एक वैश्विक उत्सव बना दिया।
  • अयोध्या का कायाकल्प और आर्थिक उन्नति
    इस दिवस के बाद से अयोध्या एक वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में उभरी है। यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक रेलवे स्टेशन और चौड़ी सड़कें बनी हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा हुए हैं और भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिली है।
  • पर्यावरण अनुकूल उत्सव
    इस उत्सव के दौरान 'हरित उत्सव' की अवधारणा पर विशेष जोर दिया गया। लोगों से प्लास्टिक का उपयोग न करने, केवल मिट्टी के दीयों का उपयोग करने और बड़े पैमाने पर कल्पवृक्ष, पारिजात और तुलसी जैसे पवित्र पौधों का रोपण करने का संदेश दिया गया।

निष्कर्ष

रामलला प्रतिष्ठा दिवस केवल एक पत्थर की मूर्ति की स्थापना या मंदिर के निर्माण का जश्न नहीं है, बल्कि यह भारत के 'स्व' (आत्मसम्मान) और उसकी प्राचीन संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा है। यह दिन हमें सिखाता है कि धैर्य, न्याय और निरंतर प्रयास से सत्य की जीत अवश्य होती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जीवन हमें त्याग, कर्तव्य और प्रेम का संदेश देता है। इस दिवस को मनाते समय हमारा संकल्प होना चाहिए कि हम अपने भीतर भी 'रामत्व' को जगाएं और समाज में शांति, सद्भाव और लोक-कल्याण की भावना का विस्तार करें।

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