पद्मिनी एकादशी क्या है?
पद्मिनी एकादशी हर साल नहीं आती। यह केवल 'अधिक मास'(जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है) के दौरान आती है। हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे अधिक मास कहते हैं। इस महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही 'पद्मिनी एकादशी' कहा जाता है। चूँकि यह पुरुषोत्तम मास में आती है, इसलिए इसका महत्व अन्य सभी एकादशियों से कई गुना अधिक माना जाता है।
यह कब मनाई जाती है?
जैसा कि बताया गया है, यह केवल अधिक मास में आती है। पिछली बार यह 2023 में मनाई गई थी। आगामी वर्षों में जब भी अधिक मास आएगा, तब यह तिथि फिर से आएगी। (अगला अधिक मास 2026 में लगने की संभावना है, जिसमें यह पुनः मनाई जाएगी)।
पद्मिनी एकादशी की पौराणिक कथा
इस एकादशी के पीछे कार्तवीर्य अर्जुन के जन्म की कथा प्रचलित है:
कथा:
त्रेतायुग में महिष्मति पुरी के राजा कृतवीर्य की कई रानियाँ थीं, लेकिन किसी से भी उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। संतान की इच्छा में राजा अपनी प्रिय रानी पद्मिनी के साथ तपस्या करने गंधमादन पर्वत पर चले गए।
वर्षों की तपस्या के बाद भी जब सफलता नहीं मिली, तब रानी पद्मिनी ने देवी अनुसूया से उपाय पूछा। माता अनुसूया ने उन्हें 'अधिक मास' के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। रानी पद्मिनी ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।
रानी ने राजा के लिए एक ऐसा पुत्र माँगा जो सर्वगुण संपन्न हो और जिसे देवताओं के अतिरिक्त कोई और न जीत सके। इसी व्रत के प्रभाव से कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म हुआ, जो अत्यंत पराक्रमी थे और जिन्होंने आगे चलकर रावण को भी बंदी बना लिया था।
इस दिन क्या किया जाता है?
पद्मिनी एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है, इसके मुख्य नियम और विधि इस प्रकार हैं:
1. व्रत का संकल्प : दशमी तिथि से ही तामसिक भोजन का त्याग कर देना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
2. निर्जला या फलाहार : यह व्रत संभव हो तो निर्जला (बिना पानी के) रखा जाता है, अन्यथा केवल फल और जल ग्रहण किया जाता है।
3. मिट्टी के पात्र का प्रयोग : इस व्रत में विशेष रूप से मिट्टी के पात्र में भोजन (यदि कर रहे हों) या जल रखने का महत्व है।
4. विष्णु पूजा : भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप निरंतर किया जाता है।
5. रात्रि जागरण : इस एकादशी पर रात को सोना वर्जित माना गया है। पूरी रात भजन, कीर्तन और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए।
6. पारण : द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान देने के बाद ही व्रत खोलना चाहिए।
इस व्रत के लाभ
- संतान प्राप्ति: जैसा कि कथा से स्पष्ट है, यह व्रत संतान प्राप्ति की बाधाओं को दूर करता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: अधिक मास में होने के कारण यह व्यक्ति के सभी संचित पापों का नाश करता है और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति कराता है।
- दुर्लभ फल: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जो फल कठिन तपस्या और यज्ञों से नहीं मिलता, वह केवल श्रद्धा से पद्मिनी एकादशी करने से मिल जाता है।
निष्कर्ष
पद्मिनी एकादशी हमें धैर्य और अटूट श्रद्धा की सीख देती है। यह वह समय है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा 'अधिक मास' के कारण बहुत अधिक होती है, और इस दिन किया गया दान व भक्ति सीधे भगवान पुरुषोत्तम (विष्णु) तक पहुँचती है।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

