Online Puja & Pandit Booking
+91 91115 12346

निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी 2027: महत्व, पौराणिक कथा और व्रत विधि

हिंदू धर्म में वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण, पावन और कठिन माना गया है। यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से अक्षय पुण्यदायी है, बल्कि यह व्यक्ति के आत्म-संयम, मानसिक दृढ़ता और शारीरिक सहनशक्ति की भी एक महान परीक्षा है।

वर्ष 2027 निर्जला एकादशी: मुख्य तिथियाँ, शुभ मुहूर्त एवं विशेष संयोग

वर्ष 2027 में निर्जला एकादशी पर ग्रहों और नक्षत्रों की बेहद विशेष स्थिति बन रही है। इस वर्ष से जुड़ी समस्त प्रामाणिक पंचांग गणनाएँ इस प्रकार हैं:

  • निर्जला एकादशी की मुख्य तिथि: यह महाव्रत सोमवार, जून 14, 2027 को रखा जाएगा। उदयातिथि और सर्वमान्य पंचांग के अनुसार इसी दिन निर्जल तप किया जाएगा।
  • एकादशी तिथि का प्रारम्भ: जून 14, 2027 को सुबह 02:11 ए एम बजे से।
  • एकादशी तिथि की समाप्ति: जून 15, 2027 को सुबह 02:07 ए एम बजे तक।
  • पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: जून 15 को सुबह 08:13 ए एम बजे। (शास्त्रों के अनुसार हरि वासर समाप्त होने के बाद ही पारण करना उत्तम माना जाता है)।
  • व्रत पारण (व्रत खोलने का) समय: मंगलबार, जून 15, 2027 को दोपहर 01:45 पी एम से शाम 04:33 पी एम के बीच।

2027 का विशेष ग्रह-नक्षत्र संयोग:

वर्ष 2027 में निर्जला एकादशी सोमवार के दिन पड़ रही है, जो कि स्वयं भगवान शिव और चंद्र देव का दिन है। इस पावन तिथि पर स्वाति नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो जीवन में संतुलन, न्यायप्रियता और मानसिक स्थिरता को दर्शाता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सूर्य देव बुध की राशि मिथुन में गोचर कर रहे होंगे, जहाँ पहले से ही बुद्धि के दाता बुध और ऐश्वर्य के कारक शुक्र विद्यमान होंगे। इसके कारण मिथुन राशि में त्रिग्रही योग और बुधादित्य योग का महासंयोग रहेगा। इसके अतिरिक्त, देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में विराजमान होकर इस व्रत की आध्यात्मिक शक्ति को कई गुना बढ़ा रहे हैं। इस दुर्लभ खगोलीय स्थिति में किया गया निर्जल तप साधकों को प्रखर बुद्धि, व्यापारिक उन्नति और मानसिक शांति प्रदान करने वाला सिद्ध होगा।

निर्जला एकादशी क्या है और इसका महत्व?

'निर्जला' का सीधा अर्थ है—बिना जल के। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्रती को सूर्योदय से लेकर अगले दिन के पारण काल (व्रत तोड़ने के समय) तक अन्न के साथ-साथ जल की एक बूंद का भी पूरी तरह त्याग करना होता है।

शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई मनुष्य वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में शारीरिक रूप से असमर्थ है, तो वह केवल इस एक निर्जला एकादशी का पूर्ण विधि-विधान और निष्ठा से व्रत करके वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त कर सकता है। ज्येष्ठ-आषाढ़ मास की प्रखर गर्मी में जल का त्याग करना इस व्रत को एक महान तपस्या का रूप दे देता है।

पौराणिक कथा: इसे 'भीमसेनी एकादशी' क्यों कहते हैं?

इस एकादशी को 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' भी कहा जाता है। महाभारत काल में पांडवों में भीमसेन को भोजन अत्यंत प्रिय था और उनकी जठराग्नि (भूख) इतनी तीव्र थी कि वे इस पर नियंत्रण नहीं कर पाते थे। जहाँ उनके सभी भाई (युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव), द्रौपदी और माता कुंती वर्ष की प्रत्येक एकादशी का नियमपूर्वक व्रत रखते थे, वहीं भीम अपनी भूख के कारण ऐसा करने में लाचार थे। उन्हें सदैव यह ग्लानि और भय रहता था कि वे इस कारण भगवान विष्णु की परम कृपा से वंचित रह जाएंगे।

अपनी इस व्यथा को लेकर भीम पितामह महर्षि वेदव्यास जी के पास गए। व्यास जी ने उनकी स्थिति को समझते हुए एक परम समाधान दिया—"हे भीम! यदि तुम वर्ष भर की कठिन एकादशियों का व्रत नहीं रख सकते, तो केवल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस 'निर्जला एकादशी' का पूरे सयंम से व्रत करो। इस एक व्रत के प्रभाव से तुम्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य स्वतः ही सुलभ हो जाएगा।" भीम ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य किया और अत्यंत कठिनाई के बावजूद जल की एक बूंद ग्रहण किए बिना यह व्रत पूर्ण किया। तभी से इसका नाम भीमसेनी एकादशी पड़ा।

पूजा विधि और अनुष्ठान

निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु के 'त्रिविक्रम' रूप की पूजा की जाती है:

  1. ब्रह्म मुहूर्त स्नान: 14 जून 2027 की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और शुद्ध पीले वस्त्र धारण करें। सोमवार का दिन होने के कारण शिव-हरि का ध्यान एक साथ करना विशेष फलदायी होगा।
  2. व्रत का संकल्प: भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में जल लेकर पूर्ण निर्जल व्रत का सच्चा संकल्प लें।
  3. पूजन सामग्री: भगवान नारायण को पीले पुष्प, पीला चंदन, धूप-दीप, ऋतु फल और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें।
  4. मंत्र साधना: इस दिन मौन रहकर या शांत चित्त से 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का निरंतर मानसिक जाप करते रहें।
  5. पारण विधान: अगले दिन 15 जून को हरि वासर समाप्त होने के बाद शुभ पारण मुहूर्त (दोपहर 01:45 पी एम से शाम 04:33 पी एम) में योग्य ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान देने के बाद जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलें।

नियम: क्या करें और क्या न करें?

क्या करें (दान का विशेष महत्व): ज्येष्ठ की भीषण गर्मी को देखते हुए इस दिन राहगीरों और बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए ठंडे पानी की व्यवस्था (प्याऊ) करना सर्वश्रेष्ठ पुण्य माना गया है। इसके अतिरिक्त जल से भरे मिट्टी के घड़े, हाथ के पंखे, छाता, खरबूजा, सत्तू और वस्त्रों का दान करना अत्यंत शुभ और पितरों को तृप्ति देने वाला होता है। रात्रि में सोने के बजाय कीर्तन-जागरण करें।

क्या न करें (वर्जित कार्य): अन्य एकादशियों की भांति इस दिन भी घर में चावल बनाना और उसका सेवन करना पूरी तरह वर्जित है। तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का विचार भी मन में न लाएं। अपने व्यवहार को संयमित रखें, किसी की पीठ पीछे निंदा न करें और क्रोध से पूरी तरह बचें।

व्रत का आध्यात्मिक फल

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति इस कठिन व्रत को पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ पूर्ण करता है, उसके पूर्वजन्मों के संचित पाप भी भस्म हो जाते हैं। मान्यता है कि ऐसे व्रती को मृत्यु के पश्चात यमदूत लेने नहीं आते, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद उसे सीधे वैकुंठ धाम ले जाते हैं। यह व्रत मनुष्य को दीर्घायु, उत्तम आरोग्य, पारिवारिक सुख-समृद्धि और अंत में परम मोक्ष प्रदान करने वाला है।

॥ जय श्री हरि विष्णु ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

For Customer
Login Register
Join as Partner

Become Pandit, Agent or Associate
Click below button to register or login

Join as Partner

For any query call us:

+91 9111512346
Your Cart

Your cart is currently empty.
Let us help you find the perfect item!