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निर्जला एकादशी

निर्जला एकादशी: व्रत का महात्म्य, पौराणिक कथा और नियम

हिंदू धर्म में वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण और कठिन माना गया है। यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से पुण्यदायी है, बल्कि यह व्यक्ति के आत्म-संयम और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा है।

निर्जला एकादशी क्या है?

'निर्जला' का अर्थ है—बिना जल के। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग करना होता है।

महत्व: शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में असमर्थ है, तो वह केवल निर्जला एकादशी का पूर्ण विधि-विधान से व्रत करके सभी 24 एकादशियों के समान फल प्राप्त कर सकता है।

कब मनाई जाती है? 

यह व्रत प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह समय मई या जून के महीने में आता है। ज्येष्ठ मास में सूर्य अपनी प्रखरता पर होता है और भीषण गर्मी पड़ती है, ऐसे समय में बिना जल के रहना इस व्रत को एक महान तपस्या बना देता है।

पौराणिक कथा: भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?

इस एकादशी को 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' भी कहा जाता है।

कथा: महाभारत काल में पांडवों में भीमसेन को भोजन अत्यंत प्रिय था और वे अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं कर पाते थे। जहाँ उनके सभी भाई और माता कुंती वर्ष की प्रत्येक एकादशी का व्रत रखते थे, वहीं भीम अपनी भूख के कारण ऐसा नहीं कर पाते थे। उन्हें डर था कि वे इस कारण भगवान विष्णु की कृपा से वंचित रह जाएंगे।

अपनी व्यथा लेकर भीम महर्षि वेदव्यास जी के पास गए। व्यास जी ने उन्हें समाधान दिया—"हे भीम! यदि तुम वर्ष भर की एकादशियों का व्रत नहीं रख सकते, तो केवल ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी का व्रत करो। इस एक व्रत के प्रभाव से तुम्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाएगा।" भीम ने इस आज्ञा का पालन किया और अत्यंत कठिनाई के बावजूद यह व्रत पूर्ण किया।

पूजा विधि और नियम

इस दिन भगवान विष्णु के 'त्रिविक्रम' रूप की पूजा की जाती है:

  • ब्रह्म मुहूर्त स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें।
  • संकल्प: भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए निर्जल व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा सामग्री: भगवान को पीले फूल, पीला चंदन, धूप, दीप और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करें।
  • दान का महत्व: इस दिन दान का विशेष महत्व है। भीषण गर्मी को देखते हुए जल से भरे घड़े, पंखा, छाता, खरबूजा, वस्त्र और सत्तू का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • मंत्र जाप: दिन भर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।

क्या करें और क्या न करें?

क्या करें:

  • गरीबों और राहगीरों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था (प्याऊ) करना।
  • रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु के भजनों का कीर्तन करना।
  • तुलसी के पौधे की पूजा करना।

क्या न करें:

  • चावल का त्याग: अन्य एकादशियों की तरह इस दिन भी चावल खाना वर्जित है।
  • तामसिक भोजन: लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का विचार भी मन में न लाएं।
  • क्रोध और कलह: इस दिन शांत रहें और किसी की निंदा न करें।

व्रत का फल

माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धापूर्वक पूर्ण करता है, उसे मृत्यु के पश्चात यमदूत लेने नहीं आते, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद उसे सीधे वैकुंठ धाम ले जाते हैं। यह व्रत दीर्घायु, आरोग्य और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला है।

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