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मोक्षदा एकादशी

मोक्षदा एकादशी :

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। वर्षभर में आने वाली सभी २४ एकादशियों में मोक्षदा एकादशी को अत्यंत महत्वपूर्ण और कल्याणकारी माना गया है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है—'मोक्षदा' यानी मोक्ष प्रदान करने वाली।

यह एकमात्र ऐसी एकादशी है, जिसके दिन मानवता को जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान मिला था। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था, इसलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में भी बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मोक्षदा एकादशी क्या है और इसका महत्व ?

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत न केवल व्रत रखने वाले व्यक्ति के पापों का नाश करता है, बल्कि इसके पुण्य से व्रती अपने पितरों (पूर्वजों) को भी नरक की यातनाओं से मुक्त कराकर मोक्ष दिला सकता है।

  • पितरों की मुक्ति का मार्ग: यदि किसी के पूर्वज अपने बुरे कर्मों के कारण यमलोक या नरक में कष्ट भोग रहे हैं, तो इस दिन विधि-विधान से व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पितरों को दान करने से उन्हें तुरंत मुक्ति मिल जाती है।
  • नरक के द्वारों का बंद होना: शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के लिए स्वर्ग और मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं और नरक के द्वार बंद हो जाते हैं।
  • गीता जयंती का महासंयोग: इस दिन भगवान विष्णु के स्वरूप दामोदर और साक्षात श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। इस दिन गीता पाठ करने का पुण्य अनंत गुना बढ़ जाता है।

मोक्षदा एकादशी कब मनाई जाती है?

मोक्षदा एकादशी हिंदू कैलेंडर के अनुसार मार्गशीर्ष (अघन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तिथि आमतौर पर नवंबर या दिसंबर के महीने में आती है। एकादशी का व्रत हमेशा उदया तिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के आधार पर रखा जाता है। इस दिन वैष्णव संप्रदाय और सामान्य गृहस्थ दोनों ही नियमों का पालन करते हुए व्रत रखते हैं।

मोक्षदा एकादशी की प्रामाणिक व्रत कथा

पद्म पुराण के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने मोक्षदा एकादशी की कथा विस्तार से सुनाई थी, जो इस प्रकार है:

प्राचीन काल में गोकुल नाम के नगर में वैखानस नाम के राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत धार्मिक, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे। उनके राज्य में चारों वेद के ज्ञाता ब्राह्मण और सुखी प्रजा रहती थी।

राजा का भयानक स्वप्न
एक रात राजा वैखानस ने एक बहुत ही भयानक स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि उनके दिवंगत पिता नरक की भीषण यातनाएं भोग रहे हैं, वे लोहे की जंजीरों में बंधे हैं और रो-रोकर अपने पुत्र से मुक्ति की भीख मांग रहे हैं। अपने पिता को ऐसी दयनीय स्थिति में देखकर राजा की नींद खुल गई और वे अत्यंत व्याकुल हो गए। सुबह होते ही राजा ने राजपुरोहितों और विद्वान ब्राह्मणों की सभा बुलाई और अपना स्वप्न सुनाया। राजा ने कहा कि इस दृश्य ने उन्हें हिलाकर रख दिया है और अब उन्हें इस राजपाट में कोई सुख दिखाई नहीं देता। उन्होंने ब्राह्मणों से पिता की मुक्ति का उपाय पूछा।

पर्वत मुनि का आश्रम
विद्वान ब्राह्मणों की सलाह पर राजा त्रिकालदर्शी पर्वत मुनि के आश्रम पहुंचे। पर्वत मुनि ने अपनी योगदृष्टि से राजा के पिता के भूतकाल को देखा और कहा कि तुम्हारे पिता ने अपने पूर्व जन्म में एक बड़ी भूल की थी। उन्होंने अपनी कामुकता के वश में होकर अपनी बड़ी रानी के होते हुए, ऋतुकाल में अपनी छोटी रानी की प्रार्थना को ठुकरा दिया था। इसी पाप कर्म के कारण आज वे नरक की यातनाएं भोग रहे हैं।

उपाय और मुक्ति
राजा ने अत्यंत दुखी होकर जब मुक्ति का उपाय पूछा, तो पर्वत मुनि ने कहा कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में 'मोक्षदा' नाम की एकादशी आती है। तुम पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से उस एकादशी का व्रत करो और उस व्रत का संपूर्ण पुण्य अपने पिता को दान कर दो। तुम्हारे पुण्य के प्रभाव से ही तुम्हारे पिता की नरक से मुक्ति होगी। राजा वैखानस ने मुनि के कथानुसार व्रत रखा, रात्रि जागरण किया और द्वादशी के दिन व्रत का पुण्य अपने पिता को संकल्प करके अर्पित कर दिया। पुण्य दान करते ही राजा के पिता नरक से मुक्त होकर दिव्य देह धारण कर बैकुंठ धाम को चले गए।

मोक्षदा एकादशी की संपूर्ण पूजन विधि

मोक्षदा एकादशी का व्रत तीन दिनों तक चलने वाले नियमों (दशमी, एकादशी और द्वादशी) से बंधा होता है। इसकी सटीक पूजन विधि निम्नलिखित है:

1.दशमी के नियम (व्रत से एक दिन पहले)
दशमी तिथि की शाम को सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए। इस दिन का भोजन पूरी तरह सात्विक होना चाहिए। तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और मसूूर की दाल का पूरी तरह त्याग करें।

2.एकादशी के दिन की पूजा (मुख्य दिन)

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों और स्वच्छ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
  • व्रत का संकल्प: पूजा घर में भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने हाथ में जल, अक्षत और तिल लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप अपने या अपने पितरों के कल्याण के लिए यह व्रत पूरी निष्ठा से रख रहे हैं।
  • पूजा की तैयारी: भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और श्री कृष्ण की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं। उन्हें पीले फूल, पीले फल, तुलसी दल, धूप, दीप और चंदन अर्पित करें।
  • नैवेद्य और भोग: भगवान को पंचामृत और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। याद रखें, भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी के पत्ते का होना अनिवार्य है, इसके बिना भोग स्वीकार नहीं होता।
  • पाठ और आरती: इस दिन विष्णु सहस्रनाम, मोक्षदा एकादशी व्रत कथा और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ अवश्य करें। इसके बाद धूप-दीप से आरती करें।

3.रात्रि जागरण
एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। रात के समय भगवान के भजनों, कीर्तन और महामंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जाप करते हुए जागरण करना चाहिए।

4.द्वादशी पारण विधि (व्रत खोलना)
अगले दिन (द्वादशी) सुबह स्नान करके पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा (अन्न, वस्त्र, धन) दें। इसके पश्चात शुभ मुहूर्त में ही व्रत का पारण (व्रत खोलना) करें। पारण हमेशा सात्विक भोजन या तुलसी दल और जल से करना चाहिए।

इस दिन क्या करें और क्या न करें?

मोक्षदा एकादशी के दिन नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

क्या करना चाहिए:

  • तुलसी के पौधे में घी का दीपक जलाएं और उनकी परिक्रमा करें।
  • श्रीमद्भगवद्गीता के अध्यायों का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक सुनें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का मन ही मन निरंतर जाप करते रहें।
  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार भूखों और गरीबों को अन्न-वस्त्र का दान करें।

क्या नहीं करना चाहिए:

  • इस दिन भूलकर भी चावल का सेवन न करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चावल खाने वाला व्यक्ति रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म लेता है।
  • किसी की निंदा, चुगली, झूठ बोलना या क्रोध करने से पूरी तरह बचें।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें और इस दिन दाढ़ी-मूंछ, बाल या नाखून न काटें।
  • पेड़-पौधों के पत्ते या टहनियां न तोड़ें। पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (दशमी को) ही तोड़कर रख लें।

मोक्षदा एकादशी के अन्य महत्वपूर्ण पहलू

  1. गीता जयंती का विशेष उत्सव
    चूंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से पूरी दुनिया को गीता का अमर संदेश दिया था, इसलिए इस दिन देश के सभी इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों, कुरुक्षेत्र और अन्य विष्णुलयों में गीता जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। लोग इस दिन गीता की पोथियों का दान करते हैं और सामूहिक रूप से गीता पाठ का आयोजन करते हैं।
  2. वैज्ञानिक और स्वास्थ्य दृष्टिकोण
    प्राचीन ऋषियों ने एकादशी व्रत को केवल धर्म से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से भी जोड़ा है। महीने में दो बार आने वाली एकादशी पर उपवास रखने से हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है। इससे शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं, जिससे मानसिक स्पष्टता और शारीरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
  3. मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति
    'मोक्ष' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद की मुक्ति नहीं है, बल्कि जीवित रहते हुए काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह के बंधनों से मुक्त होना भी है। यह व्रत व्यक्ति के मन को शांत करता है और उसे सात्विकता की ओर ले जाता है।

निष्कर्ष

मोक्षदा एकादशी का व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम प्रकट करने का एक दिव्य अवसर है। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक अस्वस्थता के कारण उपवास रखने में असमर्थ है, तो भी वह इस दिन सात्विक रहकर भगवान विष्णु की पूजा, दान और गीता का पाठ करके इस दिन के महान पुण्य का लाभ उठा सकता है।

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