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मार्गशीर्ष पूर्णिमा

मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2027 :

सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को बेहद पवित्र और मोक्षदायिनी माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष वर्ष का नौवां महीना होता है, जिसे आम बोलचाल में 'अघन का महीना' भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं कहा है— "मासानां मार्गशीर्षोऽहम्" अर्थात महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस कारण इस मास की पूर्णिमा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

वर्ष 2027 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा कई दुर्लभ और शुभ ग्रहीय संयोगों के साथ आ रही है, जो इस दिन किए जाने वाले स्नान, दान और पूजा के फल को अक्षय बनाने वाले हैं।

वर्ष 2027 तिथि, चंद्रोदय एवं शुभ मुहूर्त

वर्ष 2027 के लिए प्रामाणिक पंचांग गणना के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा की तिथि, चंद्रोदय और समय इस प्रकार है:

  • मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत व स्नान तिथि: सोमवार, दिसम्बर 13, 2027
  • पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: दिसम्बर 12, 2027 को रात 23:54 (11:54 PM) बजे से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: दिसम्बर 13, 2027 को रात 21:38 (09:38 PM) बजे तक
  • पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय का समय: शाम 17:18 (05:18 PM) बजे
  • विशेष पंचांग परिस्थिति: चूंकि पूर्णिमा तिथि 13 दिसम्बर को पूरे दिन व्यापी रहेगी और रात 09:38 बजे समाप्त होगी, इसलिए व्रत, स्नान-दान और रात्रि कालीन चंद्र पूजन व अर्घ्य इसी दिन (13 दिसम्बर) किया जाएगा।

वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय एवं ग्रहीय विन्यास

दिसम्बर 2027 की इस पूर्णिमा पर आकाश मंडल में बेहद सुंदर और आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली ग्रहीय विन्यास बन रहा है:

  1. सोमवती पूर्णिमा का महासंयोग: वर्ष 2027 में यह पूर्णिमा सोमवार के दिन पड़ रही है। सोमवार का दिन स्वयं चंद्र देव को समर्पित है और पूर्णिमा के स्वामी भी चंद्र देव ही हैं। इस पावन दिन पर सोमवारी संयोग होने से चंद्र देव की साधना, मानसिक शांति और कुंडली में चंद्रमा को मजबूत करने के लिए यह एक सर्वोत्तम महामुहूर्त बन गया है।
  2. रोहिणी/मृगशिरा नक्षत्र का प्रभाव: मार्गशीर्ष पूर्णिमा के समय चंद्रमा मुख्य रूप से अपने स्वयं के उच्च प्रभाव वाले या मित्र नक्षत्रों (जैसे रोहिणी या मृगशिरा) में गोचर करते हैं। इस वर्ष सोमवार और पूर्णिमा के साथ इस नक्षत्र विन्यास का मिलना सुख, समृद्धि और सौंदर्य में वृद्धि करने वाला है।
  3. चंद्र दोष से मुक्ति का विशेष अवसर: जिन जातकों की कुंडली में चंद्र दोष, मातृ पक्ष से कष्ट या मानसिक अशांति (अवसाद, तनाव) रहती है, उनके लिए 13 दिसम्बर की रात को चंद्र देव की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना विशेष फलदायी सिद्ध होगा।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पौराणिक व आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक दृष्टिकोण से मार्गशीर्ष पूर्णिमा का स्थान बेहद ऊंचा है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • सत्यनारायण भगवान की कृपा: इस दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा करने से घर के सारे क्लेश दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।
  • दत्तात्रेय जयंती: धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी पावन तिथि पर भगवान दत्तात्रेय (ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त अंश) का अवतार हुआ था, इसलिए इसे दत्तात्रेय जयंती के रूप में भी बेहद श्रद्धा से मनाया जाता है।
  • दान का अक्षय पुण्य: इस दिन किए गए दान का फल कभी समाप्त नहीं होता। चूंकि दिसम्बर के महीने में कड़ाके की ठंड शुरू हो जाती है, इसलिए इस दिन गर्म कपड़ों, कंबल और अन्न का दान महादान माना गया है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजन विधि

यदि आप घर पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा का व्रत और पूजन कर रहे हैं, तो इस प्रामाणिक विधि का पालन करें:

आवश्यक सामग्री:

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति/तस्वीर, चौकी, पीला कपड़ा, गंगाजल, रोली, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी दल (बेहद जरूरी), फल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), पंजीरी, सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तक, देसी घी का दीपक और कपूर।

पूजा की चरणबद्ध प्रक्रिया:

1. संकल्प और वेदी स्थापना : सोमवार, 13 दिसम्बर को सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। मंदिर की सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
2. अभिषेक और श्रृंगार : भगवान को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें पीले चंदन, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं। पीले फूल और माला अर्पित करें।
3. भोग समर्पण : भगवान विष्णु को फल, मिठाई और विशेष रूप से गेहूं के आटे की पंजीरी व पंचामृत का भोग लगाएं। याद रखें कि विष्णु जी के भोग में तुलसी दल अवश्य होना चाहिए (द्वादशी या एकादशी को तोड़ा हुआ)।
4. कथा और आरती : भगवान के समक्ष दीपक जलाएं और 'सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा' का पाठ करें। इसके बाद विष्णु जी और माता लक्ष्मी की आरती गाएं।
5. चंद्र पूजन (रात्रि काल - शाम 17:18 बजे के बाद) : रात को चंद्रमा निकलने पर एक तांबे या चांदी के लोटे में जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें और "ॐ सों सोमाय नमः" मंत्र का जाप करें।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक कथाएं

1. भगवान दत्तात्रेय के प्राकट्य की कथा

महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) साधु का भेष बनाकर उनके आश्रम पहुंचे। उन्होंने माता अनुसूया से निर्वस्त्र होकर भिक्षा देने की मांग की। माता अनुसूया ने अपने तपोबल से जान लिया कि ये स्वयं त्रिदेव हैं। उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म के बल पर तीनों देवों को छोटे शिशुओं में बदल दिया। जब तीनों देवियां (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) अपने पतियों को ढूंढते हुए आश्रम पहुंचीं, तो उन्होंने माता अनुसूया से क्षमा मांगी। माता अनुसूया ने तीनों देवों को पुनः उनके वास्तविक रूप में ला दिया। प्रसन्न होकर तीनों देवों के अंश से एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ, जिनके तीन सिर और छह भुजाएं थीं, जिन्हें 'भगवान दत्तात्रेय' कहा गया। इनका प्राकट्य इसी तिथि पर हुआ था।

2. बत्तीसी पूर्णिमा की व्रत कथा

एक गरीब ब्राह्मणी बेहद दरिद्र जीवन जी रही थी। एक बार एक ऋषि ने उसे मार्गशीर्ष पूर्णिमा के 'बत्तीसी व्रत' की महिमा बताई। ब्राह्मणी ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ 32 पूर्णिमा का व्रत किया और भगवान विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उसके घर की दरिद्रता सदा के लिए समाप्त हो गई और उसे अपार धन-धान्य तथा गुणी संतान की प्राप्ति हुई। तभी से इसे मनोकामना पूर्ति का व्रत माना जाता है।

इस दिन क्या करें और क्या न करें?

क्या अवश्य करें:

  • पवित्र नदियों या घर के नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • ठंड का मौसम होने के कारण जरूरतमंदों को ऊनी वस्त्र, कंबल, तिल और घी का दान करें।
  • रात को चंद्रमा की रोशनी में खीर बनाकर रखें और अगले दिन उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करें (यह स्वास्थ्य और इम्युनिटी के लिए सर्वोत्तम माना जाता है)।

किन बातों से बचें:

  • इस दिन घर में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) बिल्कुल न बनाएं और न ही सेवन करें।
  • किसी भी व्यक्ति, बुजुर्ग या याचक (भिखारी) का अपमान करने से बचें।
  • घर में कलह या अशांति का माहौल न बनने दें, क्योंकि पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं।

निष्कर्ष

दिसम्बर 2027 की यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा सोमवार के दुर्लभ संयोग के कारण मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने वाली एक अत्यंत पावन तिथि है। श्रद्धापूर्वक किया गया स्नान, दान और भगवान विष्णु व चंद्र देव का पूजन जीवन के सभी कष्टों को मिटाकर सुख, शांति और समृद्धि का प्रकाश फैलाएगा।

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