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मकर संक्रांति

मकर संक्रान्ति भारत और नेपाल के सबसे पावन और प्रमुख पर्वों में से एक है। यह त्योहार पूर्णतः खगोलीय गणना और सूर्य के गोचर पर आधारित है। वर्ष 2027 में मकर संक्रान्ति का यह उत्सव विशेष ग्रहों के संयोग, तिथि और नक्षत्रों के प्रभाव के साथ आ रहा है।

पौष मास में जिस विशेष क्षण सूर्य धनु राशि (और खरमास की समाप्ति) को छोड़कर अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करता है, उसी क्षण को 'मकर संक्रान्ति' कहा जाता है। इस वर्ष संक्रान्ति का क्षण 14 जनवरी की रात को हो रहा है, जिसके कारण उदय तिथि के अनुसार पुण्यकाल और मुख्य उत्सव 15 जनवरी 2027 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।

मकर संक्रान्ति 2027 : शुभ मुहूर्त और पुण्य काल

वर्ष 2027 में मकर संक्रान्ति के पावन स्नान, दान और पूजा-अर्चना के लिए शास्त्रों के अनुसार निम्नलिखित सटीक समय निर्धारित है:

  • संक्रान्ति का सटीक क्षण: 14 जनवरी 2027, रात्रि 09:14 बजे (इस क्षण सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे)
  • मकर संक्रान्ति पुण्य काल: 15 जनवरी 2027, प्रातः 07:15 बजे से सायं 05:46 बजे तक
  • कुल अवधि: 10 घण्टे 31 मिनट्स
  • मकर संक्रान्ति महा पुण्य काल: 15 जनवरी 2027, प्रातः 07:15 बजे से प्रातः 09:00 बजे तक
  • कुल अवधि: 01 घण्टा 45 मिनट्स

विशेष निर्देश: चूँकि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात को सूर्यास्त के बाद हो रहा है, इसलिए शास्त्रों (मुहूर्त चिन्तामणि) के अनुसार इसका संपूर्ण पुण्य काल और महा पुण्य काल अगले दिन यानी 15 जनवरी 2027 को सूर्योदय से ही प्रारंभ होगा। इसी दिन पवित्र नदियों में महास्नान और दान-पुण्य करना अनंत गुना फलदायी रहेगा।

वर्ष 2027 का ज्योतिषीय समीकरण: तिथि, नक्षत्र और ग्रह स्थिति

वर्ष 2027 की मकर संक्रान्ति आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत अनूठी है। इस दिन ब्रह्मांड में निम्नलिखित ग्रहों और नक्षत्रों का विशेष योग बन रहा है:

  1. तिथि और पक्ष: हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस दिन पौष मास, शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि रहेगी। शुक्ल पक्ष में संक्रान्ति का होना अत्यंत शुभ और सात्विक ऊर्जा को बढ़ाने वाला माना जाता है।
  2. नक्षत्र संचरण: इस वर्ष संक्रान्ति के समय उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। यह नक्षत्र स्थायित्व, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है, जो इस दिन किए गए जप-तप के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।
  3. सूर्य-शनि का अनूठा संबंध: मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य देव के पुत्र हैं। ज्योतिष शास्त्र में पिता-पुत्र होने के बावजूद इनके बीच वैचारिक शत्रुता मानी जाती है। सूर्य का अपने पुत्र शनि की राशि (मकर) में प्रवेश एक 'कठिन परीक्षा और सामंजस्य' का काल होता है। इस दिन शनि से संबंधित वस्तु (काला तिल) और सूर्य से संबंधित वस्तु (गुड़) का एक साथ सेवन और दान करने से कुण्डली के कई पितृ दोष और सूर्य-शनि जनित कष्ट शांत होते हैं।
  4. खरमास की समाप्ति: पिछले एक महीने से चल रहा खरमास (मलमास), जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, 14 जनवरी की रात्रि 09:14 बजे सूर्य के राशि बदलते ही समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे समस्त मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ हो जाएंगे।

मकर संक्रान्ति का मुख्य महत्व

1. धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि
सूर्य का उत्तरायण होना (उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होना) देवताओं के दिन की शुरुआत माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, 6 महीने का उत्तरायण देवताओं का एक 'दिन' होता है और दक्षिणायन 'रात'। यह अंधकार से प्रकाश और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने का प्रतीक है। मान्यता है कि उत्तरायण के पावन काल में शरीर त्यागने वाले जीव को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. पौराणिक कथाएँ और भीष्म पितामह का संकल्प
महाभारत काल की सबसे प्रसिद्ध कथा भीष्म पितामह से जुड़ी है। इच्छा मृत्यु का वरदान पाने वाले भीष्म पितामह ने महाभारत युद्ध में बाणों की शय्या पर लेटे हुए हफ्तों तक सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। उन्होंने जानबूझकर माघ मास के इसी शुभ काल (उत्तरायण) में अपने प्राण त्यागे ताकि उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और मोक्ष मिल सके। इसके अतिरिक्त, माना जाता है कि इसी दिन राजा भगीरथ के कठिन तप से प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से धरती पर आईं और कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगासागर में जाकर मिली थीं, जहाँ उन्होंने भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया था।

3. कृषि, ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य
मकर संक्रान्ति मूल रूप से भारत की आत्मा यानी कृषि का त्योहार है। यह समय सर्दियों की ठिठुरन के अंत, गुनगुनी धूप की शुरुआत और रबी की फसलों (जैसे गेहूं, सरसों, चना) की कटाई का संदेश लाता है। ग्रामीण इलाकों में घरों की सफाई की जाती है, पशुओं को सजाया जाता है और अन्न भंडारों को भरकर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। स्वास्थ्य के लिहाज से इस समय तिल और गुड़ का सेवन किया जाता है। तिल में भरपूर तेल (स्निग्धता) और गुड़ में गर्मी होती है, जो सर्दियों में शुष्क हुए शरीर को भीतर से ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं।

भारत के विभिन्न कोनों में उत्सव के रंग

भौगोलिक विविधताओं से भरे भारत में मकर संक्रान्ति को अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन सबका मूल संदेश एक ही है—कृतज्ञता और सामाजिक समरसता:

उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश): यहाँ इसे मुख्य रूप से 'खिचड़ी' या 'तिला संक्रांत' कहा जाता है। लोग सुबह-सुबह गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं। इस दिन उड़द दाल और चावल से बनी खिचड़ी खाने, खिलाने और दान करने की अद्भुत परंपरा है।

पंजाब और हरयाणा : यहाँ संक्रान्ति से ठीक एक दिन पहले (14 जनवरी की शाम) लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। नई फसल के स्वागत में पवित्र अग्नि जलाई जाती है, जिसमें तिल, रेवड़ी और मूंगफली अर्पित कर ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा किया जाता है।

गुजरात और राजस्थान: पश्चिमी भारत में इसे उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण 'पतंगबाजी' है। 15 जनवरी को पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। लोग छतों पर "कापो छे" के नारों के साथ इस उत्सव का आनंद लेते हैं।

तमिलनाडु: दक्षिण भारत में इसे पोंगल नामक 4 दिवसीय वृहद उत्सव के रूप में मनाया जाता है। नई फसल के चावल, दूध और गुड़ को मिट्टी के नए बर्तन में उबालकर 'पोंगल' नामक विशेष व्यंजन बनाया जाता है और सूर्य देव को भोग लगाकर धन्यवाद दिया जाता है।

कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश: यहाँ इसे केवल 'संक्रांति' या 'मकर संक्रामक' कहते हैं। केरल के सबरीमाला मंदिर में इसी दिन प्रसिद्ध 'मकरज्योति' के दर्शन होते हैं, जिसे देखने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं।

असम: उत्तर-पूर्व में इसे माघ बिहू या 'भोगली बिहू' कहा जाता है, जहाँ लोग फसलों की कटाई के बाद सामुदायिक भोज (उरुका) का आयोजन करते हैं और बांस व सूखी घास से 'मेजी' (अलाव) बनाकर उसकी पूजा करते हैं।

सामाजिक समरसता का संदेश: "तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो"

महाराष्ट्र और मध्य भारत में इस दिन एक बेहद खूबसूरत परंपरा है, जहाँ लोग एक-दूसरे को सफेद तिल और गुड़ के लड्डू (तिलगुल) देते हैं और कहते हैं—"तिलगुल घ्या, आणि गोड-गोड बोला" (अर्थात तिल-गुड़ खाइए और साल भर मीठा-मीठा बोलिए)।

यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिस प्रकार तिल और गुड़ आपस में मिलकर एक स्वादिष्ट लड्डू बन जाते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने आपसी मतभेदों, कड़वाहट और अहंकार को भुलाकर समाज में प्रेम, मिठास और भाईचारे का विस्तार करना चाहिए। वर्ष 2027 की मकर संक्रान्ति आपके जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और समृद्धि लेकर आए!

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