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महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि  हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14वीं) तिथि को मनाई जाती है, जो अंग्रेजी महीने के अनुसार फरवरी या मार्च में आती है। महाशिवरात्रि भारतीयों का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है।माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव व पत्नी पार्वती की पूजा होती हैं। यह पूजा व्रत रखने के दौरान की जाती है। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है|भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है|महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र, रहस्यमय और आध्यात्मिक महत्व वाला पर्व है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, मन के शुद्धिकरण और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर माना जाता है। इस महान रात्रि से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ हैं, जो हमें भक्ति, त्याग, प्रेम, धैर्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

शिव-पार्वती के दिव्य विवाह की कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। जब सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा था और अधर्म बढ़ने लगा था, तब देवताओं ने विचार किया कि भगवान शिव का विवाह होना आवश्यक है, क्योंकि उनके और देवी पार्वती के मिलन से ही संसार में संतुलन और शक्ति का संचार होगा।माता पार्वती, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं, बचपन से ही भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। उन्होंने निश्चय किया कि वे केवल शिवजी से ही विवाह करेंगी। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ की। उन्होंने वर्षों तक घोर व्रत रखा—पहले फल खाए, फिर पत्तों पर जीवित रहीं और अंत में उन्होंने अन्न और जल तक का त्याग कर दिया। उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि देवता, ऋषि और स्वयं प्रकृति भी आश्चर्यचकित हो उठे।भगवान शिव, जो योगी और विरक्त थे, संसार के मोह से दूर रहते थे। वे पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने एक साधु का रूप धारण कर पार्वती के पास जाकर शिवजी के गुणों की निंदा करनी शुरू कर दी। उन्होंने कहा—“शिव तो भस्मधारी हैं, श्मशान में रहते हैं, उनके गले में सर्प हैं, वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं।”यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो उठीं और बोलीं—“आप चाहे जो कहें, मेरे लिए शिव ही सर्वोच्च हैं। मैं उन्हें ही अपना पति मानती हूँ।” उनकी अटूट श्रद्धा देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लिया।कहा जाता है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की उसी पावन रात्रि में उनका विवाह बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ। देवता, गंधर्व, यक्ष सभी इस दिव्य विवाह के साक्षी बने। इसी कारण यह रात्रि “महाशिवरात्रि” के रूप में मनाई जाती है।

समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा

एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन आरंभ किया। मंदराचल पर्वत को मंथन-दंड और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। जब मंथन प्रारंभ हुआ, तो सबसे पहले एक भयंकर विष “हलाहल” उत्पन्न हुआ।यह विष इतना प्रचंड था कि उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। देवता और असुर भयभीत हो उठे। तब सभी भगवान शिव की शरण में गए। शिवजी ने बिना किसी संकोच के उस विष को अपने हाथों में लिया और पी लिया, ताकि सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा हो सके।माता पार्वती ने तुरंत उनके कंठ को पकड़ लिया, जिससे विष उनके शरीर में न फैल सके। विष उनके कंठ में ही रुक गया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। यह घटना त्याग, बलिदान और लोककल्याण का सर्वोच्च उदाहरण है।महाशिवरात्रि के दिन भक्त इस घटना को स्मरण करते हुए भगवान शिव का आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने अपने कष्ट की परवाह किए बिना समस्त संसार की रक्षा की।

तांडव नृत्य और सृष्टि का रहस्य

एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी पवित्र रात्रि में भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया था। तांडव केवल नृत्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की गति और समय का प्रतीक है। उनके प्रत्येक कदम में सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार छिपा हुआ है।तांडव हमें यह सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन अनिवार्य है। जो उत्पन्न हुआ है, उसका अंत निश्चित है, और हर अंत के बाद एक नई शुरुआत होती है। यह रात्रि हमें अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और बुराइयों को समाप्त करने की प्रेरणा देती है।

शिकारी की कथा — सच्ची भक्ति का महत्व

एक बार एक गरीब शिकारी जंगल में शिकार करने गया, लेकिन उसे पूरे दिन कोई शिकार नहीं मिला। रात होने पर वह डर के कारण एक बेल के वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थित था, जिसका उसे कोई ज्ञान नहीं था।रातभर जागते हुए वह समय बिताने के लिए पेड़ की टहनियों को हिलाता रहा, जिससे बेलपत्र नीचे गिरते रहे और सीधे शिवलिंग पर अर्पित होते रहे। वह भूखा-प्यासा भी था, जिससे उसका व्रत भी हो गया। उसने पूरी रात जागरण किया।इस प्रकार उसने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के सभी नियमों—व्रत, पूजा और रात्रि जागरण—का पालन कर लिया। प्रातःकाल भगवान शिव उसकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे दर्शन देकर उसके सारे पाप नष्ट कर दिए तथा उसे मोक्ष प्रदान किया।यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान शिव केवल सच्ची भावना को देखते हैं, न कि बाहरी आडंबर को।

महाशिवरात्रि की पूजा

व्रत रखेने वाले दिनभर शिव मंत्र (ऊं नम: शिवाय) का जाप करें तथा पूरा दिन निराहार रहें। (रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।) शिवपुराण में रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा का विधान है। शाम को स्नान करके किसी शिव मंदिर में जाकर अथवा घर पर ही पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके त्रिपुंड एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प इस प्रकार लें-

ममाखिलपापक्षयपूर्वकसलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये

व्रत रखने वाले को फल, फूल, चंदन, बेल पत्र, धतूरा, धूप व दीप से रात के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए साथ ही भोग भी लगाना चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिवलिंग को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर की पूजा में शिवपंचाक्षर मंत्र यानी ऊं नम: शिवाय का जाप करें।भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से फूल अर्पित कर भगवान शिव की आरती और परिक्रमा करें।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

महाशिवरात्रि केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने और अज्ञानता के अंधकार को मिटाने का पर्व है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह रात्रि 'शिव' यानी 'कल्याण' और 'रात्रि' यानी 'विश्राम' का संगम है, जहाँ जीव अपनी इंद्रियों को वश में कर परमात्मा से मिलन का प्रयास करता है। मान्यता है कि इस दिन ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्तर अत्यंत उच्च होता है, जो मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक बनता है। उपवास और जागरण के माध्यम से भक्त अपने मन को शांत कर आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार शिव ने विष पीकर संसार की रक्षा की, वैसे ही हमें भी अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार रूपी विष को त्याग कर प्रेम और शांति का मार्ग अपनाना चाहिए।

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