Online Puja & Pandit Booking
+91 91115 12346

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी :

सनातन धर्म में द्वादशी तिथि का विशेष महत्व है, खासकर जब वह भगवान विष्णु या उनके पूर्ण अवतार भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को कृष्ण योगेश्वर द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत और उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक और योगिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण के 'योगेश्वर' रूप की विशेष आराधना की जाती है। आइए, इस महान पर्व के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी क्या है?

'योगेश्वर' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— योग + ईश्वर, अर्थात जो समस्त योगों के स्वामी हैं। भगवान श्रीकृष्ण को शास्त्रों में 'योगेश्वर' कहा गया है क्योंकि उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय संसार के सामने प्रस्तुत किया।

भगवद्गीता के अंतिम श्लोक (18.78) में संजय कहते हैं:

"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
(अर्थात: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है।)

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के इसी सर्वशक्तिमान, ज्ञानमय और योगयुक्त स्वरूप को समर्पित है। इस दिन व्रत रखने से साधक को मानसिक शांति, इंद्रिय निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण) और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यह कब मनाई जाती है? (तिथि और शुभ समय)

हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। यह प्रसिद्ध 'पापांकुशा एकादशी' के अगले दिन आती है। कई स्थानों पर इसे विजया दशमी (दशहरे) के ठीक दो दिन बाद मनाया जाता है।

चूंकि एकादशी का व्रत रखने वाले वैष्णव जन द्वादशी के दिन ही पारण करते हैं, इसलिए इस द्वादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन सुबह का समय (सूर्योदय काल) पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

विस्तृत पूजन विधि

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप (लड्डू गोपाल) या उनके चतुर्भुज रूप (योगेश्वर) की पूजा की जाती है। इसकी संपूर्ण विधि निम्नलिखित है:

  • प्रातः काल की तैयारी
    सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। साफ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु और कृष्ण को अत्यंत प्रिय है। इसके बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत व पूजा का संकल्प लें।
  • पूजा स्थल की स्थापना
    घर के मंदिर या किसी पवित्र स्थान पर एक चौकी रखें और उस पर पीला कपड़ा बिछाएं। चौकी पर राधा-कृष्ण या योगेश्वर कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही भगवान विष्णु का चित्र भी रख सकते हैं।
  • पंचामृत स्नान और श्रृंगार
    भगवान की मूर्ति को क्रमशः दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल (पंचामृत) से स्नान कराएं। इसके बाद साफ जल से स्नान कराकर उन्हें सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान को चंदन, कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं।
  • भोग और विशेष सामग्रियां
    भगवान योगेश्वर को पीले फूल, वैजयंती माला और तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य अर्पित करें। तुलसी के बिना श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है। भोग में माखन-मिश्री, पीले फल, मिठाई या खीर अर्पित करें।
  • आरती और मंत्र जाप
    धूप और गाय के घी का दीपक जलाएं। भगवान के मंत्रों का जाप करें जैसे कि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या कृं कृष्णाय नमः। अंत में कृष्ण जी की आरती गाएं और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा याचना करें।

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी से जुड़ी पौराणिक कथा

इस पर्व से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा महाभारत काल और भगवान श्रीकृष्ण के योगेश्वर स्वरूप से जुड़ी है।

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, जब कंस के अत्याचार बढ़ गए थे और कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब से लेकर महाभारत के युद्ध तक श्रीकृष्ण ने कदम-कदम पर अपनी योगमाया का प्रदर्शन किया। महाभारत युद्ध के दौरान, अर्जुन जब अपनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए थे और उन्होंने हथियार उठाने से मना कर दिया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया। इसी उपदेश के दौरान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना 'विराट स्वरूप' दिखाया, जो उनके योगेश्वर होने का सबसे बड़ा प्रमाण था। उन्होंने दिखाया कि सृष्टि के कण-कण में वही वास करते हैं और पूरा ब्रह्मांड उन्हीं से संचालित है।

आश्विन शुक्ल द्वादशी के दिन ही ऋषियों और मुनियों ने भगवान के इस द्वेष-मुक्त, शांत और ज्ञान से भरे योगेश्वर रूप की स्तुति की थी। माना जाता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति एकाग्र चित्त होकर श्रीकृष्ण के इस रूप का ध्यान करता है, उसके जीवन का अज्ञान और अंधकार वैसे ही दूर हो जाता है जैसे गीता के उपदेश से अर्जुन का मोह भंग हुआ था।एक अन्य मान्यता के अनुसार, राजा अमरीश ने भी इसी द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु के निमित्त कठोर व्रत किया था, जिसके कारण स्वयं सुदर्शन चक्र ने उनकी रक्षा की थी।

त्योहार के अन्य महत्वपूर्ण पहलू

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी केवल एक साधारण उपवास नहीं है, बल्कि इसके कई सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयाम हैं:

  1. आध्यात्मिक महत्व (इंद्रिय संयम)
    'योग' का अर्थ है जोड़ना— अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ना। इस दिन भक्त केवल शारीरिक उपवास नहीं रखते, बल्कि अपनी जीभ (वाणी), आंखों और विचारों पर संयम रखने का संकल्प लेते हैं। यह दिन ध्यान और आत्म-निरीक्षण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  2. दान-पुण्य का विशेष महत्व
    इस द्वादशी पर दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। ब्राह्मणों, गरीबों या जरूरतमंदों को अन्न, पीले वस्त्र, फल और सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन गौशाला में जाकर गायों को हरा चारा खिलाने से पितृदोष और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
  3. गीता पाठ और कीर्तन
    चूंकि यह दिन योगेश्वर कृष्ण को समर्पित है, इसलिए कई घरों और मंदिरों में सामूहिक रूप से भगवद्गीता के 11वें अध्याय (विश्वरूप दर्शन योग) का पाठ किया जाता है। शाम के समय 'हरे कृष्ण' महामंत्र का कीर्तन करना इस पर्व की शोभा को और बढ़ा देता है।
  4. मौसम और स्वास्थ्य का संबंध (आयुर्वेद दृष्टि)
    आश्विन मास के दौरान ऋतु परिवर्तन (शरद ऋतु का आगमन) हो रहा होता है। इस समय पित्त का प्रकोप बढ़ता है। उपवास रखने और सात्विक भोजन (या फलाहार) करने से शरीर का शुद्धिकरण होता है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

इस दिन क्या करें और क्या न करें

क्या करना चाहिए:

  • पूजा में और भगवान के भोग में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें।
  • पूरा दिन मन को शांत रखें और सकारात्मक विचारों के साथ बिताएं।
  • भोजन में केवल सात्विक या फलाहारी चीजें ही ग्रहण करें।
  • यदि संभव हो तो रात्रि में जागरण करें या भगवान के भजन-कीर्तन करें।

क्या नहीं करना चाहिए:

  • भगवान को तुलसी दल के बिना कोई भी भोग अर्पित न करें।
  • किसी भी व्यक्ति के प्रति क्रोध, ईर्ष्या या अपशब्दों का प्रयोग न करें।
  • तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस या मदिरा से पूरी तरह दूर रहें।
  • द्वादशी के पवित्र दिन पर सुबह देर तक सोने से बचें।

निष्कर्ष

कृष्ण योगेश्वर द्वादशी का यह पावन व्रत हमें सिखाता है कि संसार के सभी कर्तव्यों (कर्मयोग) को निभाते हुए भी भगवान में अपनी निष्ठा कैसे बनाए रखनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन ही अपने आप में एक संपूर्ण संदेश है। यदि आप इस दिन सच्चे मन से, पूर्ण समर्पण के साथ योगेश्वर रूप की आराधना करते हैं, तो आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अंततः ईश्वरीय कृपा का वास हमेशा बना रहता है।

For Customer
Login Register
Join as Partner

Become Pandit, Agent or Associate
Click below button to register or login

Join as Partner

For any query call us:

+91 9111512346
Your Cart

Your cart is currently empty.
Let us help you find the perfect item!