कृष्ण भीष्म द्वादशी (गोविंद द्वादशी)
सनातन संस्कृति में तिथियों और व्रतों का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, बल्कि इनके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और पारिवारिक मूल्य छिपे होते हैं। माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला 'भीष्म द्वादशी' (जिसे कृष्ण भीष्म द्वादशी या गोविंद द्वादशी भी कहा जाता है) एक ऐसा ही महान पर्व है। यह दिन महाभारत के महानायक, अखंड प्रतिज्ञा के प्रतीक गंगापुत्र भीष्म पितामह और भगवान श्री कृष्ण की दिव्य कृपा को समर्पित है।
भीष्म द्वादशी क्या है?
भीष्म द्वादशी मुख्य रूप से त्याग, तपस्या और पितृ ऋण से मुक्ति का पर्व है। यह पर्व माघ मास की 'भीष्म अष्टमी' के ठीक चार दिन बाद आता है। मान्यता है कि माघ शुक्ल अष्टमी के दिन जब भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्यागे थे, तो उसके बाद द्वादशी तिथि पर पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति में पितामह का अंतिम संस्कार, तर्पण और पिंड दान से जुड़े अनुष्ठान पूरे किए थे। तब से इस तिथि को 'भीष्म द्वादशी' के रूप में पूजा और साधना के लिए नियत कर दिया गया।
यह व्रत न केवल भीष्म पितामह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है, बल्कि इस दिन भगवान लक्ष्मी-नारायण (श्री कृष्ण) की पूजा करने से मनुष्य के समस्त शारीरिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह कब आती है ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व प्रतिवर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह सामान्यतः जनवरी या फरवरी के महीने में आता है।
विशेष पंचांग गणना: यह व्रत माघ शुक्ल एकादशी (जया एकादशी) के ठीक अगले दिन मनाया जाता है। एकादशी के उपवास की पूर्णता और पारण भी इसी द्वादशी के शुभ संकल्पों के साथ होता है।
क्यों मनाया जाता है यह पर्व ?
इस पर्व को मनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
- भीष्म पितामह को श्रद्धांजलि और सम्मान: जिन्होंने राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा दिया और इच्छा-मृत्यु का वरदान होने के बावजूद बाणों की शय्या पर रहकर सही समय की प्रतीक्षा की, उनके प्रति संपूर्ण मानवता ऋणी है।
- पितृ दोष से मुक्ति: भीष्म पितामह ने आजीवन विवाह नहीं किया, इसलिए उनका तर्पण करने के लिए कोई सीधी संतान नहीं थी। तब भगवान श्री कृष्ण ने घोषणा की थी कि जो भी मनुष्य माघ शुक्ल द्वादशी को भीष्म के नाम से जल तर्पण करेगा, उसके पितृ तृप्त हो जाएंगे और उसे पितृ दोष से मुक्ति मिलेगी।
- श्री कृष्ण की शरण: इस दिन को 'गोविंद द्वादशी' भी कहते हैं क्योंकि भीष्म के प्राण त्यागते समय स्वयं भगवान श्री कृष्ण वहां उपस्थित थे और उन्होंने भीष्म को मोक्ष प्रदान किया था।
इस दिन क्या करते हैं और इसे कैसे मनाया जाता है ?
भीष्म द्वादशी के दिन देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर पवित्र नदियों के तटों और वैष्णव मंदिरों में भारी भीड़ उमड़ती है। इस दिन मुख्य रूप से निम्नलिखित अनुष्ठान किए जाते हैं:
पवित्र स्नान: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी) या घर पर ही पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान किया जाता है। माघ के महीने में स्नान का अत्यधिक महत्व है।
भीष्म तर्पण: अंजलि में जल, कुशा (एक पवित्र घास) और काले तिल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भीष्म पितामह के निमित्त जल अर्पण किया जाता है। तर्पण करते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है:
वैयाघ्रपद्यगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥
मंत्र का अर्थ: मैं वैयाघ्रपद्य गोत्र और सांकृत्य प्रवर के अपुत्र (जिनकी संतान नहीं है) वीर भीष्म को यह सम्मान स्वरूप जल अर्पित करता हूँ।
दीपदान और ब्राह्मण भोज: शाम के समय मंदिरों और नदियों के किनारे दीपदान किया जाता है। साथ ही, ब्राह्मणों को आदरपूर्वक घर बुलाकर सात्विक भोजन कराया जाता है और उन्हें तिल, वस्त्र तथा सामर्थ्य के अनुसार दान दिया जाता है।
भीष्म द्वादशी से जुड़ी पौराणिक कथा
इस पर्व की कथा महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध और भीष्म पितामह की अटूट 'भीष्म प्रतिज्ञा' से जुड़ी है।
भीष्म पितामह (पूर्व नाम देवव्रत) राजा शंतनु और माता गंगा के पुत्र थे। जब उनके पिता शंतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, तब सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और कभी राजा न बनने की कठोर प्रतिज्ञा की, जिसके कारण उनका नाम 'भीष्म' पड़ा। इस महान त्याग से प्रसन्न होकर राजा शंतनु ने उन्हें 'इच्छा-मृत्यु' का वरदान दिया।
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से सेनापति थे। जब पांडव उन्हें परास्त नहीं कर पा रहे थे, तब भगवान श्री कृष्ण की कूटनीति के तहत अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाणों की बौछार कर दी। भीष्म पितामह बाणों से बिंधकर रथ से गिर गए, लेकिन तीरों की अत्यधिक संख्या के कारण उनका शरीर जमीन को नहीं छू सका और वे 'बाण-शय्या' पर लेट गए।
उस समय सूर्य दक्षिणायन था। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन में शरीर त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता, इसलिए इच्छा-मृत्यु के वरदानी पितामह ने 58 दिनों तक असहनीय वेदना सहते हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने अपने प्राण श्री कृष्ण के चरणों में त्याग दिए। इसके बाद द्वादशी तिथि को पांडवों ने उनका श्राद्ध कर्म संपन्न किया, जिसके बाद यह तिथि 'भीष्म द्वादशी' के रूप में अमर हो गई।
भीष्म द्वादशी की पूजा विधि
यदि आप घर पर भीष्म द्वादशी का पूजन कर रहे हैं, तो इस शास्त्रीय क्रम का पालन करें:
- संकल्प और शुद्धि: प्रातः काल
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर व्रत और तर्पण का संकल्प लें।- चौकी की स्थापना: पूजा कक्ष में
एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान लक्ष्मी-नारायण (या श्री कृष्ण) और भीष्म पितामह के चित्र या मूर्ति की स्थापना करें।- पूजन सामग्री अर्पण: षोडशोपचार पूजा
भगवान विष्णु और पितामह को गंगाजल से स्नान के प्रतीक स्वरूप जल छिड़कें। इसके बाद चंदन, रोली, हल्दी, कुमकुम, मौली और पीले फूल अर्पित करें। भगवान को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अत्यंत प्रिय हैं, उन्हें अवश्य चढ़ाएं।- भोग और पंचामृत: नैवेद्य
दूध, घी, शहद, दही और गंगाजल से बना पंचामृत अर्पित करें। भुने हुए गेहूं के आटे और चीनी से बना प्रसाद (पंजीरी) या ऋतु फल का भोग लगाएं।- कथा और आरती: सत्संग
भीष्म द्वादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। अंत में घी के दीपक से भगवान विष्णु की आरती करें।
पर्व का महत्व और ज्योतिषीय दृष्टिकोण
धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों ही दृष्टिकोण से इस दिन की महिमा अपरंपार है:
- संतान सुख की प्राप्ति: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो विवाहित जोड़े संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उनके लिए यह व्रत रामबाण माना गया है। इसे करने से कुल की वृद्धि होती है और योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
- सर्वपाप नाशक: जाने-अनजाने में हुए कर्मों के दोषों को दूर करने के लिए माघ द्वादशी का उपवास सर्वश्रेष्ठ है।
- ज्योतिषीय महत्व (पितृ दोष निवारण): ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि जिनकी कुंडली में सूर्य या चंद्रमा राहु-केतु से पीड़ित होते हैं या नौवें घर (पितृ भाव) में दोष होता है, उन्हें इस दिन तर्पण और दान अवश्य करना चाहिए। माघ का महीना पितृ ऊर्जा से जुड़ा होता है, इसलिए इस दिन किया गया दान वंश को स्थिरता और समृद्धि देता है।
भीष्म अष्टमी और भीष्म द्वादशी में मुख्य अंतर
अक्सर लोग इन दोनों तिथियों को लेकर असमंजस में रहते हैं। इन्हें आसानी से इस प्रकार समझा जा सकता है:
- तिथि का अंतर: भीष्म अष्टमी माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जबकि भीष्म द्वादशी उसके चार दिन बाद यानी माघ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आती है।
- घटना का अंतर: भीष्म अष्टमी वह पावन दिन है जब भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा से बाणों की शय्या पर अपने प्राण त्यागे थे। वहीं दूसरी ओर, भीष्म द्वादशी वह दिन है जब पांडवों ने पितामह का अंतिम तर्पण, पिंड दान और श्राद्ध कर्म से जुड़े अनुष्ठान पूर्ण किए थे।
- ऊर्जा का स्वरूप: भीष्म अष्टमी मुख्य रूप से मृत्यु के स्मरण, वैराग्य और पितामह के बलिदान को याद करने का दिन है। इसके विपरीत, भीष्म द्वादशी अनुष्ठान की पूर्णता, पुण्यों के अर्जन, पितृ ऋण से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति का पर्व है।
निष्कर्ष
कृष्ण भीष्म द्वादशी का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में 'कर्तव्य' और 'प्रतिज्ञा' का क्या स्थान होना चाहिए। पितामह भीष्म का चरित्र जहां हमें अनुशासन और अडिगता सिखाता है, वहीं भगवान श्री कृष्ण का इस दिन से जुड़ा होना हमें भक्ति और शरणागति की राह दिखाता है। इस दिन पूरी श्रद्धा से किया गया छोटा सा प्रयास भी हमारे पूर्वजों की आत्मा को शांति देता है और हमारे जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता का संचार करता है।

