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कोजागर पूजा

कोजागरी पूजा 2027: शरद पूर्णिमा पर महालक्ष्मी और अमृत साधना का महापर्व

शरद ऋतु की सुहावनी रातों में सबसे चमकीली और खूबसूरत रात होती है शरद पूर्णिमा की। इसी पावन तिथि को मनाया जाता है कोजागरी पूजा या कोजागर व्रत। मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार (विशेषकर मिथिलांचल) और महाराष्ट्र में इस पर्व की अनूठी धूम देखने को मिलती है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य, समृद्धि और उल्लास का एक अद्भुत संगम है।

वर्ष 2027 : तिथि, शुभ मुहूर्त एवं निशीथ काल

वर्ष 2027 में कोजागर पूजा आपके द्वारा दी गई सटीक समय-गणना के अनुसार निम्नलिखित विशिष्ट मुहूर्तों में मनाई जाएगी। चूंकि इस व्रत में रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा और मध्यरात्रि के जागरण का महत्व है, इसलिए यह समय अत्यधिक महत्वपूर्ण है:

  • पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ: 14 अक्टूबर 2027 को शाम 18:49 बजे से होगा।
  • पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 15 अक्टूबर 2027 को शाम 19:16 बजे होगी।
  • कोजागर पूजा की मुख्य तिथि: निशीथ काल (मध्यरात्रि) में पूर्णिमा तिथि की उपलब्धता के नियम के अनुसार यह महापर्व बृहस्पतिवार, 14 अक्टूबर 2027 को मनाया जाएगा।
  • कोजागर पूजा निशिता काल (मुख्य पूजा मुहूर्त): मध्यरात्रि 23:42 से लेकर 00:31 (15 अक्टूबर की तड़के) तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त की  कुल अवधि 00 घण्टे 49 मिनट्स की होगी। इस समय महालक्ष्मी का पूजन सर्वसिद्धि दायक है।
  • कोजागर पूजा के दिन चंद्रोदय: शाम 17:04 बजे होगा, जिसके बाद से ही संपूर्ण धरा पर अमृतमयी किरणों का प्रभाव शुरू हो जाएगा।

वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय व खगोलीय महत्व

वर्ष 2027 की कोजागरी पूजा आकाश मंडल में एक बेहद दुर्लभ, शक्तिशाली और समृद्धि प्रदाता ग्रह संयोग लेकर आ रही है:

  1. बृहस्पतिवार और मीन राशि का अद्भुत योग: वर्ष 2027 में यह पावन रात बृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन पड़ रही है। ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति को धन, सुख, वैवाहिक स्थिरता और ऐश्वर्य का कारक माना जाता है। इस रात चंद्रमा स्वयं गुरु की प्रिय राशि मीन में गोचर करेंगे। गुरु के दिन चंद्र देव का मीन राशि में होना और उस पर देवगुरु की शुभ दृष्टि होना 'गजकेसरी' जैसी शुभ ऊर्जा का निर्माण करता है, जो धन वृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए महा-संयोग है।
  2. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव: इस रात चंद्रमा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में संचरण करेंगे, जिसके स्वामी न्याय के देवता शनि देव हैं और राशि स्वामी गुरु हैं। यह नक्षत्र स्थिरता, गूढ़ ज्ञान और लक्ष्मी साधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस योग में किया गया रात्रि जागरण स्थिर लक्ष्मी (स्थायी धन) की प्राप्ति कराता है।
  3. ध्रुव योग का निर्माण: इस पावन तिथि पर आकाश मंडल में ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है। यह योग किसी भी शुभ संकल्प, व्रत या पूजा को सुदृढ़ता और दीर्घायु प्रदान करता है। इस योग में की गई महालक्ष्मी की आराधना व्यापारिक बाधाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर देती है।

कोजागर पूजा क्या है?

'कोजागर' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के वाक्यांश "को जागर्ति" से हुई है, जिसका अर्थ होता है—"कौन जाग रहा है?"

पौराणिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात को धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी स्वयं स्वर्ग से पृथ्वी पर आती हैं और आकाश में भ्रमण करते हुए देखती हैं कि इस रात को कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। जो व्यक्ति इस रात जागकर मां लक्ष्मी का ध्यान करता है, मां उसकी दरिद्रता दूर कर उस पर अपनी असीम कृपा बरसाती हैं। इसीलिए इस व्रत और पूजा को 'कोजागरी पूजा' कहा जाता है।

कोजागरी पूजा का सांस्कृतिक व क्षेत्रीय महत्व

भारत के अलग-अलग प्रांतों में इस त्योहार को मनाने के रंग और ढंग बेहद खूबसूरत और विविध हैं:

पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम (बंगाल की कोजागरी लक्ष्मी पुजो) : दुर्गा पूजा के ठीक पांच दिन बाद बंगाल के घरों में मां लक्ष्मी के आगमन की तैयारी शुरू हो जाती है। यहाँ इसे 'कोजागरी लक्ष्मी पुजो' कहा जाता है। इस दिन घरों को बहुत ही सुंदर अल्पना (पिसे हुए चावल के घोल से बनी रंगोली) से सजाया जाता है। मां लक्ष्मी के पैरों के निशान मुख्य द्वार से लेकर घर के मंदिर तक बनाए जाते हैं, जो मां के प्रवेश का प्रतीक हैं।

मिथिलांचल (बिहार) का कोजागरा : बिहार के मिथिला क्षेत्र में कोजागरा का एक बेहद खास सामाजिक और पारिवारिक महत्व है, विशेषकर उन नवविवाहित पुरुषों के लिए जिनकी शादी को एक साल नहीं हुआ है। इस दिन वधू के घर (ससुराल) से वर के घर भारी मात्रा में फल, मखाने, पान, मिठाई, कपड़े और चांदी के सिक्के भेजे जाते हैं, जिसे 'भार' कहा जाता है। वर को मखाने की माला पहनाई जाती है, उसका चुमावन होता है, और सभी मेहमानों में मखाना और पान बांटा जाता है।

महाराष्ट्र और गुजरात (कोजागरी पूर्णिमा / नवान्न पूर्णिमा) : महाराष्ट्र में इसे 'कोजागरी पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन परिवार के सबसे बड़े बेटे की विशेष आरती उतारी जाती है। लोग इस रात को 'मसाला दूध' (कटे हुए मेवों और केसर से भरपूर दूध) बनाते हैं और उसे खुले आसमान के नीचे रखकर, चंद्रमा की किरणों को उसमें समाने देते हैं। गुजरात में इसे 'शरद पूनम' कहते हैं, जहां गरबा और रास का आयोजन होता है।

कोजागर पूजा की संपूर्ण विधि

यदि आप घर पर कोजागर पूजा का संकल्प ले रहे हैं, तो शास्त्रों के अनुसार निम्नलिखित विधि का पालन करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

आवश्यक सामग्री: माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा, कलश, आम के पत्ते, रोली, अक्षत, मौली, धूप, गाय के घी का दीपक, कपूर, पान के पत्ते, सुपारी, मखाने, खील-बताशे, नारियल, ताजे कमल या गुलाब के फूल, कौड़ियां, चांदी का सिक्का, दूध-चावल की खीर और गंगाजल।

चरणबद्ध पूजन प्रक्रिया:

1. व्रत का संकल्प : बृहस्पतिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर मां लक्ष्मी के सामने व्रत का संकल्प लें।

2. वेदी और कलश स्थापना : शाम के समय पूजा स्थल को साफ कर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की संयुक्त तस्वीर स्थापित करें। पास में ही चावल की ढेरी पर जल से भरा कलश स्थापित करें, जिसमें आम के पत्ते और नारियल रखें। मुख्य द्वार से लेकर पूजा स्थल तक मां लक्ष्मी के चरणों के चिह्न (अल्पना) अवश्य बनाएं।

3. षोडशोपचार पूजा : निशीथ काल के शुभ मुहूर्त में माता लक्ष्मी को कुमकुम, अक्षत, सुगंधित फूल और माला अर्पित करें। धूप और दीप जलाएं।

4. विशेष भोग : माता को मखाने, सिंघाड़ा, पान, सुपारी और सबसे महत्वपूर्ण—दूध-चावल की खीर का भोग लगाएं।

5. मंत्र जाप और आरती : मां लक्ष्मी के बीज मंत्र का जाप करें:

"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः"

6. इसके बाद श्री सूक्त या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें और अंत में कर्पूर से मां की आरती उतारें।

7. चंद्रमा को अर्घ्य : रात को जब चंद्रमा आकाश के मध्य में आ जाए, तब चांदी या तांबे के पात्र में जल, थोड़ा दूध, और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।

कोजागर पूजा से जुड़ी पावन पौराणिक कथाएं

कथा 1: साहुकार की दो पुत्रियों की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक साहुकार रहता था। उसकी दो पुत्रियों थीं। दोनों ही पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत रखती थी, जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत रखती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की जो भी संतान होती, वह पैदा होते ही मर जाती थी। उसने एक ज्योतिषी से इसका कारण पूछा। ज्योतिषी ने बताया, "तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, जिससे तुम्हें पूर्ण फल नहीं मिलता। यदि तुम शरद पूर्णिमा का पूरा व्रत विधि-विधान से करो और रात्रि जागरण करो, तो तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।"

छोटी पुत्री ने ऐसा ही किया। अगली बार जब उसे पुत्र हुआ, तो वह फिर शांत हो गया। लेकिन इस बार उसने बुद्धि से काम लिया। उसने बच्चे के शव को एक पीढ़े (चौकी) पर लेटा दिया और ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाकर उसे उसी पीढ़े पर बैठने को कहा। जैसे ही बड़ी बहन का वस्त्र उस बच्चे से छुआ, बच्चा जीवित होकर रोने लगा। बड़ी बहन चौंक गई और बोली, "तुम मुझे कहां बिठा रही थी? इस पर तो तुम्हारा बच्चा था, अभी दब जाता!" तब छोटी बहन ने रोते हुए कहा, "यह तो पहले से ही निष्प्राण था बहन! तुम्हारी पुण्य आत्मा और शरद पूर्णिमा व्रत के प्रभाव के स्पर्श से ही यह फिर से जीवित हो उठा है।" इसके बाद से पूरे नगर में इस व्रत की महिमा फैल गई।

कथा 2: राजा और महालक्ष्मी की कृपा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक राजा बहुत दरिद्र हो गया। उसकी रानी बहुत धार्मिक स्वभाव की थी। उसने ब्राह्मणों की सलाह पर आश्विन पूर्णिमा को 'कोजागरी व्रत' रखा और पूरी रात जागकर मां लक्ष्मी की आराधना की। रात्रि के समय जब मां लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण पर निकलीं, तो उन्होंने देखा कि इस दरिद्र राजा के घर में दीपक जल रहे हैं और रानी श्रद्धापूर्वक जागकर प्रार्थना कर रही है। मां लक्ष्मी रानी की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने राजा को पुनः धन-धान्य, वैभव और खोया हुआ राज्य वापस लौटा दिया।

शरद पूर्णिमा और कोजागर का वैज्ञानिक व स्वास्थ्य पहलू

हिंदू धर्म का यह पर्व केवल मान्यताओं पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक रहस्य छिपा है:

  • अमृत वर्षा: वैज्ञानिक दृष्टि से, शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है। इस रात चंद्रमा की किरणों में खास औषधीय गुण और सकारात्मक तरंगे होती हैं।
  • खीर का वैज्ञानिक महत्व: दूध में 'लैक्टिक एसिड' होता है और चावल में 'स्टाॅर्च'। जब इसे चांदी या मिट्टी के बर्तन में रखकर चंद्रमा की रोशनी में छोड़ा जाता है, तो यह चांद की किरणों के औषधीय गुणों को सोख लेता है। अगले दिन सुबह खाली पेट इस खीर को खाने से शरीर का पित्त दोष शांत होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है, और श्वास संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता है।

कोजागर पूजा के नियम और सावधानियां

  1. क्या करें : सात्विक भोजन करें। पूजा में लाल, पीले या सफेद रंग के वस्त्र पहनें। रात को कम से कम 12 से 1 बजे तक जागकर भजन या मंत्र जाप करें। खीर को पतले सूती कपड़े या जाली से ढंककर ही चांद की रोशनी में रखें ताकि उसमें धूल-मिट्टी न गिरे।
  2. क्या न करें : इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) का सेवन भूलकर भी न करें। काले या गहरे नीले रंग के कपड़े पहनने से बचें। सूर्यास्त के बाद या रात को जल्दी सोने की गलती न करें, क्योंकि यह जागरण की रात है। खीर को पूरी तरह से बंद या प्लास्टिक के बर्तन में न रखें।

निष्कर्ष

कोजागरी पूजा जीवन में अंधकार को मिटाकर प्रकाश, दरिद्रता को मिटाकर समृद्धि, और बीमारी को मिटाकर अच्छा स्वास्थ्य लाने का महापर्व है। वर्ष 2027 में देवगुरु बृहस्पति के दिन (गुरुवार) और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के महासंयोग में आने वाली यह रात आप सभी के जीवन को सुख, शांति और अखंड लक्ष्मी की कृपा से आलोकित करे, यही कामना है।

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