आखिर क्यों काल भैरव ने काट दिया था ब्रह्मा जी का सिर? जानें यह रहस्यमयी कथा
हिंदू धर्म में कालाष्टमी का दिन अत्यंत रहस्यमयी और ऊर्जावान माना जाता है। यह दिन भगवान शिव के उस रौद्र स्वरूप को समर्पित है, जिससे काल (समय) भी भयभीत रहता है— भगवान काल भैरव।हर माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी मनाई जाती है।आइए जानते हैं, भगवान शिव को यह भयानक रूप क्यों धारण करना पड़ा और क्यों उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का सिर काट दिया था।
कौन हैं भगवान काल भैरव? जानें शिव के इस 'रौद्र' लेकिन 'कृपालु' स्वरूप का रहस्य
हिंदू धर्मशास्त्रों में जहाँ भगवान शिव को 'भोलेनाथ' कहकर पुकारा जाता है, वहीं उनके एक ऐसे स्वरूप की भी पूजा होती है जिससे काल (समय) और मृत्यु भी भयभीत रहते हैं। उन्हें हम भगवान काल भैरव के नाम से जानते हैं।
अक्सर लोग उनके भयानक स्वरूप को देखकर डरते हैं, लेकिन वास्तव में काल भैरव भक्तों के रक्षक और न्याय के देवता हैं। आइए जानते हैं आखिर कौन हैं भगवान काल भैरव और उनका आध्यात्मिक महत्व क्या है।
- शिव के 'पांचवें अवतार'
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव साक्षात भगवान शिव के पांचवें अवतार माने जाते हैं। इनका प्राकट्य मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी) को हुआ था। वे महादेव के क्रोध से उत्पन्न हुए थे, इसलिए उन्हें शिव का 'रौद्र रूप' कहा जाता है।- 'भैरव' शब्द का गहरा अर्थ
'भैरव' शब्द तीन अक्षरों के मेल से बना है, जिसमें सृष्टि की तीन शक्तियां समाहित हैं:'भ' का अर्थ है: भरण (भरण-पोषण करने वाले)।'र' का अर्थ है: रमण (सृष्टि की रक्षा करने वाले)।'व' का अर्थ है: वमन (दुष्टों का संहार करने वाले)।अर्थात, भैरव वह हैं जो अपनी शरण में आने वालों का पालन करते हैं और उनके शत्रुओं का नाश करते हैं।- अद्भुत स्वरूप और वाहन
भगवान काल भैरव का स्वरूप अन्य देवताओं से काफी भिन्न और निराला है:वाहन: उनका वाहन श्वान (कुत्ता) है। हिंदू धर्म में कुत्ते को यम का दूत माना जाता है, और भैरव बाबा की सेवा का अर्थ है वफादारी और सतर्कता का गुण अपनाना।अस्त्र: उनके हाथ में एक भारी दंड होता है, जिसके कारण उन्हें 'दंडपाणि' भी कहा जाता है। वे इसी दंड से पापियों को सजा देते हैं।रूप: वे दिगंबर (आकाश को वस्त्र मानने वाले) या गहरे काले रंग के वस्त्र धारण किए हुए, गले में मुंडमाला और हाथ में खप्पर लिए नजर आते हैं।- 'काशी के कोतवाल': कानून के संरक्षक
काल भैरव का सबसे प्रमुख स्थान वाराणसी (काशी) है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के बाद महादेव ने उन्हें काशी का रक्षक नियुक्त किया था।मान्यता है कि काशी में रहने वाले या वहां आने वाले हर व्यक्ति को पहले काल भैरव की अनुमति लेनी पड़ती है।उनके दर्शन के बिना बाबा विश्वनाथ की पूजा अधूरी मानी जाती है। वे काशी के राजा या 'कोतवाल' के रूप में वहां की सुरक्षा करते हैं।- भक्तों के लिए क्यों जरूरी है काल भैरव की पूजा?
काल भैरव की साधना डराने के लिए नहीं, बल्कि निर्भय बनाने के लिए की जाती है:भय से मुक्ति: वे 'भय' के विनाशक हैं। उनकी पूजा से अकाल मृत्यु, भूत-प्रेत और मानसिक विकारों का नाश होता है।ग्रह बाधा निवारण: शनि और राहु-केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दोषों को शांत करने के लिए भैरव जी की पूजा अचूक मानी जाती है।समय का प्रबंधन: 'काल' का अर्थ है समय। जो उनकी पूजा करता है, वह समय का सदुपयोग करना और जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ना सीख जाता है।
पौराणिक कथा: जब अहंकार ने लिया युद्ध का रूप
कालाष्टमी की पौराणिक कथा अहंकार के विनाश और सत्य की स्थापना की एक अद्भुत गाथा है। यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कोई भी हो, अहंकार का अंत अनिवार्य है।शिव पुराण के अनुसार, यह कथा सृष्टि के आरंभ काल की है। इस कथा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद
एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा जी का तर्क था कि चूंकि वे 'सृष्टिकर्ता' हैं, इसलिए वे सर्वोपरि हैं। वहीं, भगवान विष्णु का मत था कि वे 'जगत पालक' हैं, अतः श्रेष्ठता उन्हें मिलनी चाहिए।- दिव्य ज्योतिर्लिंग का प्रकट होना
दोनों के विवाद को शांत करने के लिए भगवान शिव एक विशाल 'ज्योतिर्लिंग' के रूप में प्रकट हुए। उस लिंग का न कोई आदि (शुरुआत) था और न ही कोई अंत। आकाशवाणी हुई कि जो भी इस ज्योतिर्लिंग का छोर (सिरा) ढूंढ लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा।भगवान विष्णु वराह का रूप लेकर पाताल की ओर गए, लेकिन अंत न मिलने पर उन्होंने हार मान ली और सत्य स्वीकार किया।ब्रह्मा जी हंस का रूप लेकर आकाश की ओर गए। उन्हें भी अंत नहीं मिला, लेकिन उन्होंने श्रेष्ठ बनने के लिए केतकी के फूल के साथ मिलकर एक झूठ रचा कि उन्होंने अंत ढूंढ लिया है।- ब्रह्मा जी का अहंकार और शिव का क्रोध
ब्रह्मा जी के इस असत्य और उनके पांचवें मुख द्वारा भगवान शिव के प्रति कहे गए अपमानजनक शब्दों को सुनकर महादेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उसी क्षण उनके क्रोध से एक भयंकर शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिनका नाम था 'काल भैरव'।- पांचवें सिर का कटना
काल भैरव का स्वरूप अत्यंत रौद्र था। उनके हाथ में दंड था और वे काले रंग के थे। महादेव के आदेश पर काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का वह पांचवां सिर काट दिया, जिससे उन्होंने झूठ बोला था और शिव की निंदा की थी।- ब्रह्महत्या का पाप और मुक्ति
ब्रह्मा जी का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लगा और वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया। शिव जी ने उन्हें प्रायश्चित के लिए तीनों लोकों का भ्रमण करने को कहा। भटकते हुए जब काल भैरव काशी (वाराणसी) पहुंचे, तो वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से स्वतः ही छूट गया। महादेव ने प्रसन्न होकर उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया और कहा कि जो भी काशी आएगा, उसे पहले काल भैरव के दर्शन करने होंगे।- 'काशी के कोतवाल'
ब्रह्मा जी का सिर काटने के कारण काल भैरव पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लगा। वह कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए वे तीनों लोकों में भटके। जब काल भैरव काशी (वाराणसी) पहुंचे, तो वह सिर उनके हाथ से गिर गया और वे पाप मुक्त हुए। महादेव ने उन्हें वहीं ठहरने का आदेश दिया और वे 'काशी के कोतवाल' कहलाए। आज भी माना जाता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन तब तक पूरे नहीं होते, जब तक भक्त काल भैरव के दर्शन न कर लें।
कालाष्टमी पूजा का महत्व और समय
कालाष्टमी के दिन निशिता काल (मध्यरात्रि) की पूजा सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है।
- पूजा विधि: इस दिन काल भैरव की मूर्ति के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है।
- विशेष भोग: उन्हें काले तिल, उड़द और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।
- कुत्ते की सेवा: चूंकि कुत्ता इनका वाहन है, इसलिए इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यंत शुभ और संकटों को टालने वाला माना जाता है।

