कजरी तीज : अखंड सौभाग्य, आस्था और लोक संस्कृति का महापर्व
कजरी तीज, जिसे कजली तीज, सातुड़ी तीज या बड़ी तीज भी कहते हैं, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखद वैवाहिक जीवन और संतान की प्राप्ति के लिए रखती हैं। यह हरियाली तीज के ठीक 15 दिन बाद आती है, जिसमें माता पार्वती और भगवान शिव की संयुक्त पूजा की जाती है।
सावन और भादों के इस मिलन काल में जब प्रकृति अपनी पूर्ण भव्यता पर होती है, तब कजरी तीज नारीत्व की भावना, प्रेम और समर्पण के उत्सव के रूप में मनाई जाती है।
वर्ष 2027 व्रत तिथि एवं शुभ मुहूर्त
वर्ष 2027 में कजरी तीज का पावन व्रत शुक्रवार, 20 अगस्त को रखा जाएगा। इस वर्ष की मुख्य तिथियाँ और मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- तृतीया तिथि प्रारम्भ: 19 अगस्त 2027 को सायंकाल 17:15 बजे से
- तृतीया तिथि समाप्त: 20 अगस्त 2027 को सायंकाल 18:53 बजे तक
- विशेष: चूंकि तृतीया तिथि 20 अगस्त को पूरे दिन व्याप्त रहेगी और सायंकाल 18:53 पर समाप्त होगी, इसलिए उदय तिथि के नियमानुसार शुक्रवार, 20 अगस्त को ही पूरे दिन व्रत रखना, नीमड़ी माता की पूजा करना और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलना शास्त्रसम्मत और सर्वोत्तम रहेगा।
वर्ष 2027 के महत्वपूर्ण ग्रह, नक्षत्र और मुख्य ज्योतिषीय योग
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वर्ष 2027 की यह कजरी तीज सौभाग्य में वृद्धि करने वाले कई अद्भुत और दुर्लभ संयोग लेकर आ रही है:
- शुक्रवार का महासंयोग: इस वर्ष कजरी तीज शुक्रवार के दिन पड़ रही है। शुक्रवार के स्वामी स्वयं 'शुक्र देव' हैं, जिन्हें ज्योतिष में वैवाहिक सुख, सौभाग्य, सौंदर्य और ऐश्वर्य का कारक माना जाता है। सुहागिनों के लिए शुक्रवार के दिन इस व्रत का आना अखंड सौभाग्य का वरदान देने वाला है।
- उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव: इस दिन आकाश मंडल में उत्तरभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसके स्वामी शनि देव हैं और राशि स्वामी गुरु (बृहस्पति) हैं। यह नक्षत्र स्थिरता और धार्मिक कार्यों में गहरी निष्ठा का प्रतीक है, जो व्रती महिलाओं के संकल्प को अटूट बनाएगा।
- सुकर्मा और धृति योग का मिलन: 20 अगस्त 2027 को 'सुकर्मा योग' और 'धृति योग' का सुंदर संगम बन रहा है। सुकर्मा योग में किए गए व्रतादि से जीवन में उत्तम फलों की प्राप्ति होती है और पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होती है।
कजरी तीज की प्रमुख विशेषताएं
- सुहाग की लंबी उम्र: विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह कठोर निर्जला (या फलाहारी) व्रत रखती हैं।
- माता पार्वती और शिव की पूजा: पौराणिक मान्यता है कि देवी पार्वती ने 108 जन्मों के कठोर तप और संकल्प के बाद इसी दिन भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था।
- मनचाहा वर: कुंवारी कन्याएं भी अच्छे, संस्कारी और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए कजरी तीज का व्रत पूरी निष्ठा से रखती हैं।
- नीमड़ी माता की पूजा: इस दिन तालाब या जलस्रोत के किनारे (या घर पर कृत्रिम तालाब बनाकर) नीम की टहनी रोपकर 'नीमड़ी माता' के रूप में उनकी पूजा करने का विशेष विधान है, जो सौभाग्य, आरोग्यता और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है।
- सत्तू का भोग: कजरी तीज को 'सातुड़ी तीज' भी कहा जाता है। व्रत के अंत में, रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद, महिलाएं सत्तू (भुने चने, गेहूं या चावल के आटे और घी-चीनी से बना पकवान) प्रसाद स्वरूप खाकर अपना व्रत खोलती हैं।
पावन पौराणिक कथा: छलनी के चाँद की भूल
बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक अत्यंत सुंदर, सरल और संस्कारी पुत्री थी। साहूकार अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था। विवाह के बाद भी जब भी कोई पर्व-त्योहार आता, वह अपनी बेटी को मायके बुला लिया करता था।
एक बार कजरी तीज का पावन पर्व आया। साहूकार ने अपनी बेटी को ससुराल से मायके बुलवाया ताकि वह व्रत अपने माता-पिता के घर पर रहकर कर सके। बेटी बहुत खुश हुई और पूरे मन से व्रत रखने की तैयारी करने लगी। तीज के दिन उसने सुबह जल्दी उठकर स्नान किया, साफ-सुथरे वस्त्र पहने और निर्जला व्रत का संकल्प लिया। पूरे दिन उसने कुछ भी नहीं खाया-पिया और भगवान शिव तथा माता पार्वती का ध्यान करती रही। शाम को उसने पूजा की तैयारी की, सुंदर शृंगार किया और चंद्रमा के दर्शन का इंतजार करने लगी।
रात गहराने लगी, लेकिन उस दिन आकाश में घने बादल छा गए थे। चंद्रमा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। धीरे-धीरे समय बीतता गया और बेटी की भूख-प्यास बढ़ती गई। भूख से उसका चेहरा मुरझाने लगा और वह बहुत कमजोर होने लगी। अपनी बहन की यह हालत देखकर उसके सातों भाई बहुत चिंतित हो गए। वे अपनी बहन की पीड़ा सहन नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने सोचा कि किसी तरह बहन का व्रत खुलवा दिया जाए ताकि उसे राहत मिल सके।
तब सबसे बड़े भाई ने एक योजना बनाई। वह पास के एक ऊंचे पेड़ के पीछे गया और वहां एक दीपक जलाकर उसे छलनी से ढक दिया। दूर से देखने पर वह प्रकाश बिल्कुल द्वितीया या तृतीया के चंद्रमा जैसा प्रतीत हो रहा था। फिर सभी भाइयों ने मिलकर बहन से कहा, “देखो बहन, चाँद निकल आया है, अब तुम अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल सकती हो।”
बहन ने भाइयों की बात पर विश्वास कर लिया। उसने उस नकली चंद्रमा को असली समझकर उसे अर्घ्य दिया और भगवान का नाम लेकर भोजन करने बैठ गई। लेकिन जैसे ही उसने पहला निवाला मुंह में डाला, उसे उसमें बाल दिखाई दिया। वह थोड़ा चौंकी, पर उसने सोचा कि शायद गलती से आ गया होगा। जब उसने दूसरा निवाला खाया, तो उसमें कंकड़ निकला। अब उसका मन घबराने लगा। जैसे ही उसने तीसरा निवाला उठाया, उसमें खून दिखाई दिया।
यह देखकर वह भयभीत हो गई। तभी एक दूत दौड़ता हुआ आया और उसने दुखद समाचार दिया कि उसके पति की अचानक मृत्यु हो गई है। यह सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह जोर-जोर से रोने लगी। कुछ समय बाद उसे समझ आया कि यह सब बिना सच्चे चंद्र दर्शन के, छल से व्रत टूटने के कारण हुआ है। उसे अपनी अज्ञानता और भूल पर गहरा पश्चाताप हुआ।
तब उसने निश्चय किया कि वह अपने पति को वापस पाने के लिए पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से पुनः तप करेगी। वह अपने पति के शव के पास बैठकर पूरे वर्ष तक तपस्या करती रही। उसने हर माह आने वाली चतुर्थी और अगले वर्ष की कजरी तीज का व्रत पूरी निष्ठा, कड़े नियमों और बिना किसी भूल के किया। उसकी इस अटूट भक्ति, सच्चे प्रेम और कठोर प्रायश्चित से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती उसके सामने प्रकट हुईं और कहा, “बेटी, तुम्हारी तपस्या और श्रद्धा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने अपनी गलती को स्वीकार कर सच्चे मन से प्रायश्चित किया है, इसलिए मैं तुम्हें अखंड सौभाग्य का आशीष देती हूँ।”
माता पार्वती ने अपने वरदान से उसके पति को पुनः जीवित कर दिया। साहूकार का परिवार फिर से खुशियों से भर गया। उस दिन से यह मान्यता और दृढ़ हो गई कि जो भी स्त्री कजरी तीज का व्रत पूरी श्रद्धा, नियम और शुद्ध मन से करती है, उसे देवी पार्वती अचल सुहाग का वरदान देती हैं।
कजरी तीज उत्सव और सांस्कृतिक परंपरा
- सिंधारा की परंपरा: त्योहार की शुरुआत तीज के पारंपरिक परिधान, गहने, चूड़ियाँ, मेहंदी और सुहाग से जुड़ी अन्य सभी वस्तुओं को "सिंधारा" के रूप में प्राप्त करने से होती है। यह सिंधारा विवाहित बेटियों को उनके माता-पिता या पीहर पक्ष की तरफ से प्रेमस्वरूप भेजा जाता है।
- कजरी लोकगीत और झूले: कजरी तीज महिलाओं के उल्लास का त्योहार है। महिलाएं बागों और पेड़ों पर ऊंचे झूले डालती हैं, बारी-बारी से झूलती हैं और वर्षा ऋतु, प्रेम, विरह तथा शिव-पार्वती के प्रसंगों पर आधारित पारंपरिक 'कजरी लोकगीत' गाती हैं।
- बूंदी का प्रसिद्ध मेला: राजस्थान के बूंदी जिले में कजरी तीज के अवसर पर एक ऐतिहासिक और भव्य मेला लगता है, जिसमें पारंपरिक लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और तीज माता की भव्य सवारी देखने को मिलती है। यह मेला दुनिया भर से हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है।
- व्रत की पूर्ण विधि: सुबह उठकर स्नान के बाद नए वस्त्र पहनकर सुहागिनें पूरे दिन का उपवास (कई महिलाएं निर्जला और कई फलाहारी) रखती हैं। शाम के समय दीवार पर नीमड़ी माता की आकृति बनाकर या नीम की टहनी रोपकर उन पर जल, रोली, मोली, अक्षत, सत्तू और फल चढ़ाए जाते हैं। अंत में रात को चंद्रमा के उदय होने पर चांदी की अंगूठी और ऊन के धागे के साथ दूध-जल से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है और सत्तू खाकर व्रत संपन्न होता है।
निष्कर्ष
वर्ष 2027 की कजरी तीज शुक्रवार के शुभ संयोग, उत्तरभाद्रपद नक्षत्र और सुकर्मा योग के कारण सुहागिनों के जीवन में सुख, समृद्धि और वैवाहिक सामंजस्य को बढ़ाने वाली है। यह महापर्व हमें सिखाता है कि रिश्तों में शुद्धता, नियमों के प्रति निष्ठा और ईश्वर पर अटूट विश्वास हो, तो जीवन का बड़े से बड़ा संकट भी टल जाता है।

