कजरी तीज, जिसे कजली तीज या बड़ी तीज भी कहते हैं, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखद वैवाहिक जीवन और संतान की प्राप्ति के लिए रखती हैं। यह हरियाली तीज के 15 दिन बाद आती है, जिसमें माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है।
कजरी तीज की प्रमुख विशेषताएं :
1.सुहाग की लंबी उम्र: विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।
2.माता पार्वती और शिव की पूजा: मान्यता है कि देवी पार्वती ने 108 जन्मों के कठोर तप के बाद इसी दिन भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था।
3.मनचाहा वर: कुंवारी कन्याएं भी अच्छे और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए कजरी तीज का व्रत रखती हैं।
नीमड़ी माता की पूजा: इस दिन नीम की टहनी (नीमड़ी माता) की पूजा करने का विशेष विधान है, जो सौभाग्य और स्वास्थ्य का प्रतीक है।
4.सत्तू का भोग: व्रत के अंत में, चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद, महिलाएं सत्तू (भूने चने/अनाज का पाउडर) खाकर व्रत खोलती हैं।
5.सांस्कृतिक महत्व: यह त्योहार उत्तर भारत (विशेषकर राजस्थान) में कजरी लोकगीतों, मेहंदी और झूला झूलने के साथ उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।
कजरी तीज की पौराणिक कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक अत्यंत सुंदर, सरल और संस्कारी पुत्री थी। साहूकार अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था। विवाह के बाद भी जब भी कोई पर्व-त्योहार आता, वह अपनी बेटी को मायके बुला लिया करता था।एक बार कजरी तीज का पावन पर्व आया। साहूकार ने अपनी बेटी को ससुराल से मायके बुलवाया ताकि वह व्रत अपने माता-पिता के घर पर रहकर कर सके। बेटी बहुत खुश हुई और पूरे मन से व्रत रखने की तैयारी करने लगी।तीज के दिन उसने सुबह जल्दी उठकर स्नान किया, साफ-सुथरे वस्त्र पहने और निर्जला व्रत (बिना पानी पिए) का संकल्प लिया। पूरे दिन उसने कुछ भी नहीं खाया-पिया और भगवान शिव तथा माता पार्वती का ध्यान करती रही। शाम को उसने पूजा की तैयारी की, सुंदर सिंगार किया और चंद्रमा के दर्शन का इंतजार करने लगी, क्योंकि परंपरा के अनुसार चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है।रात गहराने लगी, लेकिन उस दिन आकाश में घने बादल छा गए थे। चंद्रमा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। धीरे-धीरे समय बीतता गया और बेटी की भूख-प्यास बढ़ती गई। उसका चेहरा मुरझाने लगा और वह कमजोर होने लगी।अपने बहन की यह हालत देखकर उसके सातों भाई बहुत चिंतित हो गए। वे अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे और उसकी पीड़ा सहन नहीं कर पा रहे थे।
उन्होंने सोचा कि किसी तरह बहन का व्रत खुलवा दिया जाए ताकि उसे राहत मिल सके।तब सबसे बड़े भाई ने एक योजना बनाई। वह पास के पेड़ के पीछे गया और वहां एक दीपक जलाकर उसे छलनी से ढक दिया। दूर से देखने पर वह प्रकाश बिल्कुल चंद्रमा जैसा प्रतीत हो रहा था। फिर सभी भाइयों ने मिलकर बहन से कहा, “देखो बहन, चाँद निकल आया है, अब तुम अपना व्रत खोल सकती हो।”बहन ने विश्वास कर लिया। उसने उस नकली चंद्रमा को असली समझकर उसे अर्घ्य दिया और भगवान का नाम लेकर व्रत खोलने बैठ गई।लेकिन जैसे ही उसने पहला निवाला मुंह में डाला, उसे उसमें बाल दिखाई दिया। वह थोड़ा चौंकी, पर उसने सोचा कि शायद गलती से आ गया होगा। जब उसने दूसरा निवाला खाया, उसमें कंकड़ निकला। अब उसका मन घबराने लगा। जैसे ही उसने तीसरा निवाला उठाया, उसमें खून दिखाई दिया।यह देखकर वह भयभीत हो गई। तभी एक दूत दौड़ता हुआ आया और उसने दुखद समाचार दिया कि उसके पति की अचानक मृत्यु हो गई है। यह सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह जोर-जोर से रोने लगी।कुछ समय बाद उसे समझ आया कि यह सब उसके व्रत के गलत तरीके से टूटने के कारण हुआ है। उसने बिना सच्चे चंद्र दर्शन के व्रत खोल दिया था, जो एक बड़ी भूल थी।
उसे अपनी गलती पर गहरा पश्चाताप हुआ।तब उसने निश्चय किया कि वह अपने पति को वापस पाने के लिए पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से पुनः व्रत करेगी। वह अपने पति के शव के पास बैठकर पूरे वर्ष तक तपस्या करती रही। उसने हर तीज का व्रत पूरी निष्ठा और नियमों के साथ किया और लगातार भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती रही।उसकी सच्ची भक्ति, प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती उसके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने कहा, “बेटी, तुम्हारी तपस्या और श्रद्धा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने अपनी गलती को स्वीकार कर सच्चे मन से प्रायश्चित किया है, इसलिए मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ।”माता पार्वती ने अपने वरदान से उसके पति को पुनः जीवित कर दिया। उसका परिवार फिर से खुशियों से भर गया।उस दिन से यह मान्यता हो गई कि जो भी स्त्री कजरी तीज का व्रत पूरी श्रद्धा, नियम और सच्चे मन से करती है, उसे अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कजरी तीज कैसे मनाएं?
कजरी या कजली तीज, महिलाओं का मानसूनी त्योहार है, जिसे देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। त्योहार की शुरुआत तीज के पारंपरिक परिधान, गहने, चूड़ियाँ, मेहंदी और सुहाग से जुड़ी अन्य सभी वस्तुओं को "सिंधारा" के रूप में प्राप्त करने से होती है। "सिंधारा" विवाहित बेटियों को उनके माता-पिता से मिलने वाले उपहारों का एक सेट है।कजरी तीज को नारीत्व की भावना का उत्सव कहा जा सकता है, क्योंकि यह त्योहार नारीत्व से जुड़ा हुआ है और नारीओं द्वारा ही मनाया जाता है। महिलाएं बारी-बारी से पेड़ों पर लटके झूलों पर झूलती हैं और दिन भर प्रेम और विरह के लोकगीत गाती हैं। राजस्थान के बूंदी में कजरी तीज के दौरान एक मेला लगता है, जो दुनिया भर से हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है। कजरी तीज के दिन महिलाएं व्रत विधि का पूरी निष्ठा से पालन करती हैं।
विधि की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करने, नए वस्त्र पहनने और तीज सिंगार करने से होती है। इसके बाद महिलाएं दिनभर उपवास रखने का संकल्प लेती हैं। शाम को वे प्रार्थना करती हैं या कजरी तीज की कथा सुनती हैं और फिर अपना व्रत तोड़ती हैं। कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं, जिसका अर्थ है कि वे दिनभर पानी नहीं पीतीं। हालांकि, यह पूरी तरह से स्वैच्छिक है। देवी पार्वती मुख्य देवी हैं; हालांकि, भक्त इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती (तीज माता) की भी पूजा करते हैं।
हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार कजरी-तीज सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए मनाई थी| तभी से सभी विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना के लिए कजरी तीज का व्रत रखती हैं| अविवाहित महिलाएं भी मनचाहा वर पाने के लिए कजरी तीज का व्रत रखती हैं| माना जाता है कि यह व्रत वैवाहिक जीवन में सौभाग्य और समृद्धि लाता है|पौराणिक कथा के अनुसार, शिव को पति रूप में पाने के संकल्प के साथ मां पार्वती ने 108 साल तक तपस्या कर भोलेनाथ को प्रसन्न किया था. तभी से इसको कजरी तीज या कजली तीज के रूप में मनाया जाने लगा.

