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जन्माष्टमी

                                                            कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
                                                         प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

कृष्ण जन्माष्टमी, जिसे जन्माष्टमी वा गोकुलाष्टमी के रूप में भी जाना जाता है, एक वार्षिक हिंदू त्योहार है जो विष्णुजी के दशावतारों में से आठवें और चौबीस अवतारों में से बाईसवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म के आनन्दोत्सव के लिये मनाया जाता है। यह हिंदू चंद्रमण वर्षपद के अनुसार, कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) के आठवें दिन (अष्टमी) को भाद्रपद में मनाया जाता है । जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अगस्त व सितंबर के साथ अधिव्यापित होता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की विस्तृत कथा

भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। यह दिन पूरे भारत में बड़े श्रद्धा और उत्साह से जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।बहुत समय पहले मथुरा नगरी में कंस नाम का एक अत्याचारी राजा राज्य करता था। वह बहुत क्रूर और निर्दयी था। उसकी बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था। विवाह के समय कंस स्वयं अपनी बहन को ससुराल छोड़ने जा रहा था।तभी आकाशवाणी हुई—“हे कंस! जिस देवकी को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी।”यह सुनते ही कंस भय से कांप उठा। उसने तुरंत देवकी और वसुदेव को कारागार (जेल) में डाल दिया। उसने निश्चय किया कि वह देवकी की हर संतान को जन्म लेते ही मार देगा।समय बीतता गया और देवकी की एक-एक करके छह संतानों का जन्म हुआ, जिन्हें कंस ने निर्दयता से मार डाला। सातवीं संतान बलराम थे, जिन्हें भगवान की लीला से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे कंस उन्हें मार नहीं पाया।

अब आठवीं संतान के रूप में भगवान श्री कृष्ण का जन्म होने वाला था। उस रात भयंकर तूफान और अंधेरा था। आधी रात के समय, जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब कारागार में ही श्री कृष्ण का जन्म हुआ। जन्म लेते ही कारागार में अद्भुत चमत्कार हुआ—जेल के सभी ताले अपने आप खुल गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया।तब श्री कृष्ण ने अपने पिता वसुदेव से कहा कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के घर ले जाएं और वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस आ जाएं।वसुदेव ने टोकरी में बालक कृष्ण को रखा और यमुना नदी पार करने निकल पड़े। रास्ते में तेज वर्षा हो रही थी और यमुना नदी उफान पर थी। तभी शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बालक कृष्ण को वर्षा से बचाया।किसी तरह वसुदेव गोकुल पहुंचे। उसी समय यशोदा माता ने एक कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव ने दोनों बच्चों को बदल दिया और कन्या को लेकर वापस कारागार आ गए।

सुबह होते ही कंस को सूचना मिली कि देवकी की आठवीं संतान जन्म ले चुकी है। वह तुरंत कारागार पहुंचा और उस कन्या को मारने के लिए उठाया। लेकिन जैसे ही उसने कन्या को पटकना चाहा, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली—“हे कंस! तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर है।”यह सुनकर कंस और भी भयभीत हो गया।उधर गोकुल में नंद बाबा के घर खुशियां मनाई जा रही थीं। बालक कृष्ण का पालन-पोषण वहीं हुआ। बचपन से ही श्री कृष्ण ने कई राक्षसों का वध किया और अंततः बड़े होकर मथुरा जाकर कंस का वध कर दिया, जिससे प्रजा को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली।

श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ उनके नटखटपन, प्रेम और दैवीय शक्तियों का अद्भुत संगम हैं। गोकुल और वृंदावन में माखन चोरी, मिट्टी खाना, यशोदा मैया को ब्रह्मांड दर्शन कराना, पूतना वध और कालिया नाग दमन जैसी लीलाओं के माध्यम से उन्होंने व्रजवासियों को आनंदित किया। ये लीलाएँ निस्वार्थ प्रेम और भक्ति का संदेश देती हैं।

जन्माष्टमी मनाने के विविध स्वरूप

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे भारत में बड़े ही हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। चूँकि भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इसलिए इस उत्सव का मुख्य केंद्र निशिता काल (आधी रात) होता है। भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और घरों व मंदिरों को फूलों, लाइटों और झांकियों से सजाते हैं। रात के बारह बजते ही शंखों और घंटों की गूँज के बीच 'बाल गोपाल' का प्राकट्य होता है, जिसके बाद उनके बाल स्वरूप को दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल के पंचामृत से अभिषेक कराया जाता है। इसके बाद नन्हे कान्हा को नए वस्त्र पहनाकर पालने (झूले) में झुलाया जाता है और 'नंद घेरा आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

उत्सव की विविधता इसे और भी खास बनाती है। उत्तर भारत के मथुरा और वृंदावन में भव्य 'रासलीला' का आयोजन होता है, जहाँ कृष्ण के जीवन की कहानियों को नृत्य और नाटक के माध्यम से दिखाया जाता है। वहीं, महाराष्ट्र और गुजरात में 'दही-हांडी' की धूम रहती है, जहाँ युवाओं की टोलियाँ ऊँचाई पर बँधे माखन के मटके को मानव पिरामिड बनाकर तोड़ती हैं। दक्षिण भारत में लोग घर के मुख्य द्वार से पूजा घर तक चावल के आटे से नन्हे कृष्ण के पद-चिह्न (पैर के निशान) बनाते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि बाल कृष्ण उनके घर पधार रहे हैं। इस दिन पंजीरी, माखन-मिश्री और खीर जैसे विशेष व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जिसे आधी रात की पूजा के बाद 'प्रसाद' के रूप में वितरित किया जाता है।

परंपराओं के पीछे छिपा विज्ञान

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का वैज्ञानिक महत्व शरीर और मस्तिष्क के समग्र स्वास्थ्य में निहित है। इस दौरान किया जाने वाला उपवास (व्रत) शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालकर कोशिकीय मरम्मत की प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जो वर्षा ऋतु के दौरान कम हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक है। दही, माखन और पंचामृत जैसे प्रोबायोटिक आहार का सेवन पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है, जबकि रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का खगोलीय संरेखण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अवशोषण को बढ़ाता है। साथ ही, उत्सव के दौरान होने वाले मंत्रोच्चार और कीर्तन से निकलने वाली ध्वनि तरंगें एंडोर्फिन रिलीज करती हैं, जो तनाव कम कर मानसिक एकाग्रता और शांति प्रदान करती हैं।

 

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