हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार
होलिका दहन जिसे होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है को सूर्यास्त के पश्चात् प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो करना चाहिये।इसी दिन रात को शुभ मुहूर्त में लकड़ियों और उपलों का ढेर बनाकर अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है।होलिका दहन बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की जीत का प्रतीक है। यह अग्नि भक्त प्रहलाद की भगवान विष्णु के प्रति अटूट आस्था और दुष्ट होलिका के अंत की याद दिलाती है, जो सिखाती है कि सत्य की हमेशा विजय होती है। यह पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को नकारात्मकता जलाने और नई ऊर्जा के आगमन के रूप में मनाया जाता है।
चन्द्रग्रहण के दौरान होलिका दहन - धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु में उल्लिखित विधान के अनुसार यदि होलिका दहन के दिन चन्द्रग्रहण का संयोग हो, तब भी होलिका दहन किया जा सकता है। धर्मग्रन्थों में ग्रहण अथवा सूतक के समय होलिका दहन के सम्बन्ध में कोई निषेध निर्दिष्ट नहीं किया गया है।
होलिका दहन की पौराणिक कथा
होलिका दहन का पर्व भक्ति, सत्य और धर्म की विजय का अद्भुत प्रतीक है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और ईश्वर में अटूट विश्वास रखने वाले व्यक्ति की हमेशा रक्षा होती है, चाहे विपरीत परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों।बहुत प्राचीन काल की बात है। एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर असुर राजा था—हिरण्यकशिपु। वह अपनी शक्ति और पराक्रम के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध था, परंतु उसके मन में अहंकार भर गया था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से एक अद्भुत वरदान प्राप्त किया था। उस वरदान के अनुसार उसे न कोई मनुष्य मार सकता था, न कोई पशु; न वह दिन में मरेगा, न रात में; न घर के अंदर,न बाहर; न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से। इस वरदान ने उसे अत्यंत अभिमानी बना दिया।धीरे-धीरे उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने स्वयं को ही भगवान मान लिया। उसने अपने राज्य में घोषणा कर दी कि कोई भी देवताओं की पूजा नहीं करेगा, बल्कि केवल उसकी ही आराधना की जाएगी। जो भी उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता, उसे कठोर दंड दिया जाता था।परंतु उसके अपने ही घर में उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। बचपन से ही प्रह्लाद के हृदय में भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा थी। वह हर समय “नारायण-नारायण” का जप करता रहता था। उसके गुरु भी उसे समझाने का प्रयास करते कि वह अपने पिता की आज्ञा माने, परंतु प्रह्लाद का मन भगवान की भक्ति में ही लगा रहता।जब हिरण्यकशिपु को यह बात पता चली, तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसने प्रह्लाद को अपने सामने बुलाया और पूछा—“तू किसकी शक्ति से इतना निडर है?”प्रह्लाद ने शांत भाव से उत्तर दिया—“पिताजी, मैं भगवान विष्णु की शक्ति से निर्भय हूँ, जो सर्वत्र विद्यमान हैं।”यह सुनकर हिरण्यकशिपु का क्रोध और भी बढ़ गया। उसने अपने पुत्र को मारने के कई प्रयास किए। कभी उसे ऊँचे पर्वत से गिरवाया गया, कभी विष दिया गया, कभी हाथियों से कुचलवाने का प्रयास किया गया, तो कभी विषैले सर्पों के बीच डाला गया। परंतु हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। उसकी भक्ति अडिग रही।अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। हिरण्यकशिपु ने एक योजना बनाई—होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा और होलिका सुरक्षित बच जाएगी।फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को एक विशाल चिता तैयार की गई। चारों ओर लोग एकत्र हुए। होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। प्रह्लाद शांत मन से भगवान विष्णु का स्मरण करता रहा। उसके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था, केवल श्रद्धा और विश्वास था।जैसे ही अग्नि प्रज्वलित हुई,लपटें तेज़ी से उठने लगीं। कुछ ही क्षणों में चमत्कार हुआ—होलिका,जो अपने वरदान पर घमंड कर रही थी,अग्नि में जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आया। यह इसलिए हुआ क्योंकि होलिका ने अपने वरदान का दुरुपयोग किया था, जबकि प्रह्लाद सच्ची भक्ति में लीन था।इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि अधर्म और अहंकार का अंत निश्चित है, और सच्ची भक्ति की हमेशा विजय होती है।इसके बाद हिरण्यकशिपु का क्रोध चरम पर पहुँच गया। उसने प्रह्लाद से पूछा—“तेरा भगवान कहाँ है?”प्रह्लाद ने उत्तर दिया—“भगवान हर जगह हैं, इस स्तंभ में भी।”यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर स्तंभ पर प्रहार किया। तभी उस स्तंभ से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया—न आधा मनुष्य, न आधा पशु। उन्होंने संध्या समय (न दिन,न रात), द्वार की देहली पर (न अंदर, न बाहर) हिरण्यकशिपु को अपने नखुनो से मार डाला (न अस्त्र, न शस्त्र)। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं और अधर्म का अंत हुआ।
पूजा प्रक्रिया और महत्व - होलिका दहन की पूजा में सबसे पहले स्थान को शुद्ध करके लकड़ियों और उपलों से होलिका का ढेर तैयार किया जाता है। पूजा के लिए रोली, अक्षत, फूल, जल, कच्चा सूत, नारियल, गुड़ तथा नई फसल (गेहूँ की बालियाँ और चने) रखे जाते हैं। इसके बाद होलिका के सामने बैठकर जल छिड़का जाता है, रोली-अक्षत और फूल अर्पित किए जाते हैं तथा दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। फिर कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर ३ या ७ बार लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इसके पश्चात शुभ समय में अग्नि प्रज्वलित की जाती है और भगवान का स्मरण करते हुए उसमें गेहूँ की बालियाँ और चने अर्पित किए जाते हैं। अग्नि जलने के बाद लोग ३ या ७ बार परिक्रमा करते हैं और अंत में उसकी राख को माथे पर लगाते हैं, जिसे पवित्र और शुभ माना जाता है। इस प्रकार यह पूजा बुराई के नाश,नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और जीवन में सुख-शांति लाने का प्रतीक मानी जाती है।
भारत में होलिका दहन का सांस्कृतिक उत्सव
भारत में होलिका दहन का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि सांस्कृतिक एकता और बुराई पर अच्छाई की विजय का एक विराट उत्सव है,जिसे देश के हर कोने में स्थानीय परंपराओं के अनूठे रंग में रंगा जाता है। उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश,बिहार और मध्य प्रदेश में इसे 'छोटी होली'या'सम्मत'कहा जाता है,जहाँ लकड़ी और उपलों (कंडों)का विशाल ढेर बनाकर भक्त प्रहलाद की रक्षा और असुर होलि्का के दहन की पौराणिक कथा को जीवंत किया जाता है। राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ क्षेत्रों में आज भी राजसी परंपराओं के साथ भव्य होलिका दहन होता है,जबकि गुजरात में इसे 'हुताशनी'के रूप में मनाते हुए लोग अग्नि में खजूर,नारियल और भुने हुए चने (धनिया)अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में यह पर्व 'काम दहनम' या 'कामदहना' के रूप में प्रचलित है,जो भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने की कथा से जुड़ा है,वहीं पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इसे 'डोल पूर्णिमा'के रूप में भगवान कृष्ण की भक्ति और पालकी उत्सव के साथ जोड़कर मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर लोग पवित्र अग्नि की परिक्रमा करते हैं,पारंपरिक लोक गीतों की धुन पर थिरकते हैं और अपने मन के विकारों, द्वेष व अहंकार को अग्नि में भस्म कर प्रेम और सद्भाव के रंगों वाली 'धुलेंडी' के स्वागत की तैयारी करते हैं, जो भारतीय समाज की अटूट आस्था और जीवंतता को दर्शाता है।

