हरतालिका तीज हिंदू महिलाओं के लिए सबसे कठिन और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है, जो भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। सुहागिनें पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए पूजा करती हैं। यह व्रत माता पार्वती के समर्पण और शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है।
हरतालिका तीज: प्रेम, त्याग और भक्ति की पराकाष्ठा
हरियाली और कजरी तीज के व्रत में पानी और फलाहार का सेवन किया जा सकता है, लेकिन हरतालिका तीज का व्रत निर्जला व्रत होता है। इसका मतलब है कि यह व्रत करने वाली महिलाएं 24 घंटे से भी ज्यादा समय तक बिना पानी और भोजन के रहती हैं। इस व्रत की यह कठोरता ही इसे सबसे अलग बनाती है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है, जो प्रेम, त्याग और भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक हैं।
हरतालिका तीज व्रत भारतीय परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है, जो माता पार्वती और भगवान शिव के दिव्य, आदर्श और तपस्या से पूर्ण मिलन की कथा को दर्शाता है; यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि नारी के अटूट संकल्प, आत्मबल, त्याग और सच्चे प्रेम की भी गहन अभिव्यक्ति है। प्राचीन काल में हिमालय के राजा हिमवान और रानी मेना के घर एक दिव्य तेज से युक्त कन्या का जन्म हुआ, जिन्हें हम माता पार्वती के रूप में जानते हैं। बचपन से ही पार्वती का मन सांसारिक सुखों में न लगकर भगवान शिव की भक्ति में रमा रहता था; वे अपने आंगन में मिट्टी से शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करतीं, फूल अर्पित करतीं और ध्यान में लीन हो जातीं। यह केवल बालसुलभ खेल नहीं था,बल्कि उनके पूर्व जन्म का गहरा संस्कार था, क्योंकि वे पहले जन्म में सती के रूप में भगवान शिव की पत्नी रह चुकी थीं और उसी अधूरे प्रेम को पूर्ण करने के लिए पुनः जन्म लिया था। समय बीतने के साथ जब वे युवावस्था में पहुँचीं, तो उनका यह भाव दृढ़ संकल्प में परिवर्तित हो गया कि वे केवल शिव को ही अपने पति के रूप में स्वीकार करेंगी, और इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्होंने अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की-उन्होंने वर्षों तक केवल फलाहार किया, फिर सूखे पत्तों पर जीवन बिताया और अंततः अन्न और जल का भी त्याग कर दिया, उनका शरीर क्षीण होता गया परंतु उनकी भक्ति और तेज निरंतर बढ़ता गया; वे दिन-रात “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए पूर्ण रूप से शिव में लीन हो गईं।
इसी बीच उनके पिता हिमवान अपनी पुत्री के भविष्य को लेकर चिंतित हुए और जब उन्हें भगवान विष्णु से विवाह का प्रस्ताव मिला, तो उन्होंने इसे अत्यंत श्रेष्ठ समझकर तुरंत स्वीकार कर लिया, किंतु जब यह बात पार्वती को ज्ञात हुई तो उनका हृदय अत्यंत दुखी और व्याकुल हो उठा, क्योंकि वे पहले ही अपने मन, वचन और कर्म से शिव को अपना पति मान चुकी थीं; उन्होंने अपनी यह व्यथा अपनी प्रिय सखी को बताई, जिसने उनकी सच्ची भावना को समझते हुए एक साहसिक कदम उठाया और उन्हें उनके घर से दूर एक घने वन में ले गई, ताकि वे बिना किसी बाधा के अपनी तपस्या पूर्ण कर सकें—इसी घटना के कारण इस व्रत का नाम “हरतालिका” पड़ा, जहाँ “हर” का अर्थ है हरण करना और “तालिका” का अर्थ है सखी। वन में पहुँचकर माता पार्वती ने एक नदी के तट पर मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण किया और अत्यंत श्रद्धा एवं विधि-विधान से उसकी पूजा आरंभ की, उन्होंने निर्जला व्रत रखा और कठोर साधना में लीन हो गईं; उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि प्रकृति भी उनकी तपस्या की साक्षी बन गई—वृक्ष उन्हें छाया देने लगे, शीतल पवन उन्हें शांति देने लगी और पक्षियों का मधुर स्वर उनकी साधना का संगीत बन गया।
कई वर्षों की कठिन तपस्या के पश्चात उनकी अटूट श्रद्धा, प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुए और बोले कि हे पार्वती,तुम्हारी भक्ति अद्वितीय है, तुमने अपने तप और प्रेम से मुझे प्रसन्न कर दिया है, अतः मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करता हूँ; इस प्रकार उनका दिव्य मिलन संपन्न हुआ, जो आत्मा और परमात्मा के पवित्र संगम का प्रतीक माना जाता है। इसके पश्चात हिमवान ने बड़े ही धूमधाम और वैदिक विधि-विधान से अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न कराया, जिसमें सभी देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व उपस्थित हुए और इस दिव्य अवसर को उत्सव के रूप में मनाया गया। तभी से हरतालिका तीज व्रत का प्रचलन हुआ और यह मान्यता स्थापित हुई कि जो भी स्त्री इस व्रत को सच्चे मन, श्रद्धा और नियमपूर्वक करती है, उसे मनचाहा वर, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है; यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य को भी प्रकट करता है कि सच्चा प्रेम, दृढ़ निश्चय, धैर्य और आत्मबल से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है, तथा सच्ची भक्ति से भगवान भी अपने भक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।
हरतालिका तीज की पूजा विधि और नियम
हरतालिका तीज का व्रत करने के लिए स्नान-ध्यान करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें तथा इस व्रत को पूरे नियमपूर्वक करने का संकल्प लें|हरतालिका तीज व्रत की पूजा में मिट्टी के गौरा-पार्वती की मूर्ति या फिर बालू का शिवलिंग और माता पार्वती की आकृति बनाकर उनकी षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए|भगवान शिव की पूजा गंगाजल, दूध, दही, शहद, अक्षत,रोली,चंदन,फल-फूल, बेलपत्र, शमीपत्र, धतूरा आदि से और माता पार्वती की पूजा श्रृंगार की सामग्री, वस्त्र,आदि अर्पित करके करें|हरतालिका तीज व्रत की पूजा में शिव-पार्वती की कथा जरूर कहें या फिर किसी के माध्यम से सुनें|हरतालिका तीज की पूजा के अंत में आरती अवश्य करें|
पूजा खत्म होने के बाद अपने बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें तथा अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी सुहागिन महिला को श्रृंगार की सामग्री दान करें|इस व्रत को एक बार प्रारंभ करने के बाद आजीवन करना चाहिए|इसी प्रकार इस व्रत से जुड़े नियम को पूरी तरह से निभाना चाहिए|हरतालिका तीज व्रत में आठ प्रहर की पूजा का विधान है|ऐसे में इस व्रत वाले दिन दिन में बिल्कुल न सोएं और यदि संभव हो तो रात्रि में भी जगकर जागरण या फिर शिव-पार्वती के मंत्र का जप करें|

