हरियाली तीज: आस्था, उमंग और अखंड सुहाग का महापर्व
हरियाली तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह उत्सव विशेष रूप से महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है, उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में भी मनाते हैं।
सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनंद मनाती हैं।
वर्ष 2027 व्रत तिथि एवं शुभ मुहूर्त
वर्ष 2027 में हरियाली तीज का पावन पर्व बुधवार, 4 अगस्त को मनाया जाएगा। इस वर्ष के मुख्य मुहूर्त और तिथियाँ इस प्रकार हैं:
- तृतीया तिथि प्रारम्भ: 4 अगस्त 2027 को सुबह 08:19 बजे से
- तृतीया तिथि समाप्त: 4 अगस्त 2027 को देर रात्रि 29:08+ बजे तक (यानी अगले दिन 5 अगस्त की सुबह 05:08 बजे तक)
- विशेष: चूंकि तृतीया तिथि बुधवार को सूर्योदय के बाद शुरू होकर पूरी रात रहने वाली है, इसलिए 4 अगस्त को पूरे दिन व्रत, पूजा और उत्सव मनाना सर्वोपरि और अत्यंत फलदायी रहेगा।
वर्ष 2027 के महत्वपूर्ण ग्रह, नक्षत्र और मुख्य ज्योतिषीय योग
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वर्ष 2027 की यह हरियाली तीज कई अद्भुत और दुर्लभ संयोग लेकर आ रही है, जो व्रती महिलाओं के लिए अत्यंत कल्याणकारी हैं:
- बुधवार और सिंह राशि का संयोग: इस वर्ष यह पर्व बुधवार के दिन पड़ रहा है। इस दिन चंद्रमा सिंह राशि में गोचर करेंगे, जिसके स्वामी सूर्य देव हैं। बुधवार को यह व्रत आने से महिलाओं के जीवन में बुद्धि, सुख-समृद्धि और पारिवारिक सामंजस्य की वृद्धि होगी।
- मघा नक्षत्र का प्रभाव: 4 अगस्त 2027 को आकाश मंडल में मघा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। मघा नक्षत्र के स्वामी पितर देव माने जाते हैं, जिससे इस दिन की गई पूजा से न केवल शिव-पार्वती बल्कि पितरों का भी आशीर्वाद मिलता है, जो वंश वृद्धि और सौभाग्य लाता है।
- शिव और सिद्ध योग: इस दिन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय 'शिव योग' और कार्यों को सफल बनाने वाला 'सिद्ध योग' बन रहा है। इस दौरान की गई साधना और सुहाग की प्रार्थना तुरंत स्वीकार होती है।
हरियाली तीज की पावन कथा
शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के लिए तीज की कथा सुनाई थी।
शिवजी कहते हैं— "हे पार्वती! तुमने हिमालय पर मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। अन्न-जल त्यागा, पत्ते खाए, सर्दी-गर्मी और बरसात में कष्ट सहे। तुम्हारे इस कष्ट से तुम्हारे पिता पर्वतराज बहुत दुःखी थे। इसी बीच नारदजी तुम्हारे घर पधारे और कहा कि मैं विष्णुजी के भेजने पर आया हूँ। वह आपकी कन्या से प्रसन्न होकर उनसे विवाह करना चाहते हैं। पर्वतराज ने प्रसन्नता से तुम्हारा विवाह विष्णुजी से करने की स्वीकृति दे दी और नारदजी ने विष्णुजी को यह शुभ समाचार सुना दिया।
परंतु, जब तुम्हें यह पता चला तो तुम्हें बड़ा दुख हुआ, क्योंकि तुम मुझे मन से अपना पति मान चुकी थीं। तुमने अपने मन की बात अपनी सहेली को बताई। तुम्हारी सहेली ने तुम्हें एक ऐसे घने वन में छुपा दिया जहाँ तुम्हारे पिता नहीं पहुँच सकते थे। वहाँ तुम पुनः तप करने लगीं। तुम्हारे लुप्त होने से पिता चिंतित होकर सोचने लगे कि यदि इस बीच विष्णुजी बारात लेकर आ गए तो क्या होगा।
तुम्हारे पिता ने तुम्हारी खोज में धरती-पाताल एक कर दिया पर तुम न मिलीं। तुम एक गुफा में रेत से शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना में लीन थीं। तुम्हारी इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारी मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। तभी तुम्हारे पिता खोजते हुए उस गुफा तक पहुँचे। तुमने उन्हें बताया कि तुमने अपना अधिकांश जीवन शिवजी को पतिरूप में पाने के लिए तप में बिताया है और आज वह तप सफल रहा है, शिवजी ने मेरा वरण कर लिया है। तुमने शर्त रखी कि तुम एक ही शर्त पर घर चलोगी यदि वे तुम्हारा विवाह शिवजी से करने को राजी हों। पर्वतराज मान गए और बाद में विधि-विधान के साथ हमारा विवाह हुआ।
हे पार्वती! तुमने जो कठोर व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप हमारा विवाह हो सका। इस व्रत को निष्ठा से करने वाली स्त्री को मैं मनवांछित फल देता हूँ और उसे तुम्हारे जैसा ही अचल सुहाग का वरदान प्राप्त होता है।"
उत्सव की परंपराएं और श्रृंगार का महत्व
- हरे रंग की प्रमुखता: सावन के दौरान सृष्टि में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है। भगवान शिव और माता पार्वती प्रकृति के काफी करीब हैं और उन्हें पृथ्वी का यह हरा रंग अत्यंत प्रिय है। इसी वजह से हरियाली तीज के दिन महिलाएं हरे वस्त्र और हरी-लाल चूड़ियां पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं।
- मायके से 'सिंधारा': विवाहित स्त्रियां सावन के इस महीने में अक्सर अपने मायके जाती हैं, और जो नहीं जा पातीं, वे ससुराल में ही इसे मनाती हैं। इस अवसर पर वधु के मायके से 'सिंधारा' आता है, जिसमें घेवर, फल, मिठाई, कपड़े और सुहाग की सामग्री (मेहंदी, चूड़ियां आदि) भेजी जाती है।
- पूजन एवं बड़ों का आशीर्वाद: विवाहित स्त्रियां सवेरे उठकर सास के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और पूजन के बाद उन्हें सुहाग का सारा सामान भेंट करती हैं। इस दिन सोलह श्रृंगार के बाद माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है, कथा सुनी जाती है और आरती के बाद पति के पैर छूकर व्रत संपन्न किया जाता है।
- कन्याओं के लिए फलदायी: आमतौर पर यह व्रत सुहागिन स्त्रियां ही रखती हैं, लेकिन जिन कन्याओं का विवाह होने वाला होता है या जो योग्य वर की चाह रखती हैं, वे भी अच्छे पति की प्राप्ति के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा से रखती हैं।
निष्कर्ष
वर्ष 2027 की हरियाली तीज शिव और सिद्ध योग के महासंयोग के कारण भक्ति और शक्ति का एक अनूठा संगम है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची निष्ठा और धैर्य से प्रकृति और ईश्वर दोनों को जीता जा सकता है। माता पार्वती का यह आशीष सभी व्रतियों के जीवन में हरियाली और खुशहाली बनाए रखे।

