हरियाली तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह उत्सव महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं।
हरियाली तीज की कथा :-
शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के लिए तीज की कथा सुनाई थी। शिवजी कहते हैं- हे पार्वती तुमने हिमालय पर मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। अन्न-जल त्यागा, पत्ते खाए, सर्दी-गर्मी, बरसात में कष्ट सहे। तुम्हारे पिता दुःखी थे। नारदजी तुम्हारे घर पधारे और कहा- मैं विष्णुजी के भेजने पर आया हूं। वह आपकी कन्या से प्रसन्न होकर विवाह करना चाहते हैं। पर्वतराज प्रसन्नता से तुम्हारा विवाह विष्णुजी से करने को तैयार हो गए। नारदजी ने विष्णुजी को यह शुभ समाचार सुना दिया पर जब तुम्हें पता चला तो बड़ा दुख हुआ। तुम मुझे मन से अपना पति मान चुकी थीं। तुमने अपने मन की बात सहेली को बताई। सहेली ने तुम्हें एक ऐसे घने वन में छुपा दिया जहां तुम्हारे पिता नहीं पहुंच सकते थे। वहां तुम तप करने लगी। तुम्हारे लुप्त होने से पिता चिंतित होकर सोचने लगे यदि इस बीच विष्णुजी बारात लेकर आ गए तो क्या होगा। शिवजी ने आगे पार्वतीजी से कहा- तुम्हारे पिता ने तुम्हारी खोज में धरती-पाताल एक कर दिया पर तुम न मिली। तुम गुफा में रेत से शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना में लीन थी। प्रसन्न होकर मैंने मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। तुम्हारे पिता खोजते हुए गुफा तक पहुंचे। तुमने बताया कि अधिकांश जीवन शिवजी को पतिरूप में पाने के लिए तप में बिताया है।
आज तप सफल रहा, शिवजी ने मेरा वरण कर लिया। मैं आपके साथ एक ही शर्त पर घर चलूंगी यदि आप मेरा विवाह शिवजी से करने को राजी हों। पर्वतराज मान गए। बाद में विधि-विधान के साथ हमारा विवाह किया। हे पार्वती! तुमने जो कठोर व्रत किया था उसी के फलस्वरूप हमारा विवाह हो सका। इस व्रत को निष्ठा से करने वाली स्त्री को मैं मनवांछित फल देता हूं। उसे तुम जैसा अचल सुहाग का वरदान प्राप्त हो।
हरियाली तीज के दिन महिलाएं हरे वस्त्र, हरी-लाल चूड़ियां पहनकर श्रृंगार करती हैं, पकवान बनाकर पूजन के पश्चात् झूला झूलती हैं तथा लोकगीत गाती हैं। विवाहित महिलाएं पहले सावन में अपने मायके चली जाती हैं लेकिन जो नहीं जा पातीं वह अपने ससुराल में ही इसे मनाती हैं। आमतौर पर इस व्रत को विवाहित स्त्रियां ही रखती हैं लेकिन जिन कन्याओं की शादी होने वाली होती है वह भी अच्छा पति पाने की चाहत में इस व्रत को रखती हैं। सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली होने के कारण इस व्रत में हरे रंग को प्रमुखता दी जाती है।
सावन के दौरान सृष्टि में बदलाव की प्रक्रिया होती है, इसके अलावा भगवान शिव और माता पार्वती प्रकृति के काफी करीब होते हैं, साथ ही इन्हें पृथ्वी का रंग बहुत प्रिय है, इसलिए इस व्रत में हरे रंग की प्रमुखता होती है। विवाहित स्त्रियां सवेरे उठकर सास के पैर छूती हैं और पूजन आदि के बाद सास को सुहाग का सारा सामान देती हैं। विवाहित स्त्रियों के मायके से ‘सिंधारा’ आता है जिसमें घेवर, फल और मिठाई तथा कपड़े आदि होते हैं। इस दिन सोलह श्रृंगार के बाद महिलाएं भगवान शिव शंकर और पार्वती जी का पूजन करती हैं और कथा सुनती हैं। पूजा के बाद पति के पैर छूकर वह व्रत तोड़ती हैं।

