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गोवर्धन पूजा

दीपों से जुड़ा दीपावली के पंचपर्व का तीसरा पर्व गोवर्धन महाराज की पूजा का होता है| गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन होती है|हिंदू कैलेंडर के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा होती है| इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधान है| गोवर्धन पूजा पर अन्नकूट भी मनाते हैं, जिसमें 56 भोग बनाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाते हैं|वैसे तो अन्नकूट और गोवर्धन पूजा सभी जगह मानते हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की नगरी ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है|

गोवर्धन पूजा की विस्तृत कथा भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीला और गहरे आध्यात्मिक संदेश से जुड़ी हुई है। यह कथा न केवल एक चमत्कारिक घटना का वर्णन करती है, बल्कि हमें प्रकृति के महत्व, अहंकार के दुष्परिणाम और सच्ची भक्ति की शक्ति का भी ज्ञान कराती है।प्राचीन काल में वृंदावन में गोकुलवासी अत्यंत सरल और प्रकृति पर निर्भर जीवन जीते थे। उनकी जीविका मुख्यतः खेती और गौ-पालन पर आधारित थी। उस समय सभी लोग वर्षा के देवता देवराज इंद्र की पूजा करते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि इंद्र की कृपा से ही वर्षा होती है और उनकी फसलें अच्छी होती हैं।हर वर्ष इंद्र के सम्मान में एक विशाल यज्ञ और पूजा का आयोजन किया जाता था। पूरे गाँव में उत्सव का वातावरण होता, स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते और इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते। एक बार बाल रूप में भगवान कृष्ण ने यह सब देखा और उन्हें यह बात ठीक नहीं लगी कि लोग बिना सोचे-समझे केवल परंपरा के कारण इंद्र की पूजा कर रहे हैं।

श्रीकृष्ण ने अपने पिता नंद बाबा और अन्य ब्रजवासियों से प्रश्न किया—“हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? क्या उन्होंने हमें सीधे कुछ दिया है?” जब लोगों ने बताया कि इंद्र वर्षा करते हैं, तभी हमारी खेती होती है, तब कृष्ण ने उन्हें समझाया कि वास्तव में हमारी रक्षा और पालन-पोषण गोवर्धन पर्वत करता है। वही हमें हरी-भरी घास देता है, गौ माता के लिए भोजन देता है, जल के स्रोत प्रदान करता है और हमारे जीवन को संवारता है।कृष्ण के तर्क और ज्ञान से प्रभावित होकर सभी ब्रजवासियों ने इंद्र पूजा को छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय लिया। उन्होंने पर्वत के चारों ओर परिक्रमा की, अन्नकूट का विशाल भोग तैयार किया और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया।जब यह बात इंद्र देव को पता चली, तो उनका अहंकार आहत हो गया। उन्होंने सोचा कि इन साधारण मनुष्यों ने उनका अपमान किया है। क्रोधित होकर उन्होंने घोर वर्षा, तूफान और बिजली गिराने का आदेश दे दिया। देखते ही देखते वृंदावन में भयंकर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई—तेज बारिश, आंधी और बाढ़ से पूरा क्षेत्र डूबने लगा।सभी ब्रजवासी भयभीत होकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना करने लगे।

तब भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सभी लोगों, गायों और जीव-जंतुओं को उसके नीचे शरण लेने के लिए कहा।सात दिनों और सात रातों तक लगातार वर्षा होती रही, लेकिन कोई भी ब्रजवासी या पशु-पक्षी हानि नहीं पहुंची। सभी लोग आश्चर्यचकित थे कि एक बालक इतनी महान शक्ति कैसे धारण कर सकता है। इस दौरान श्रीकृष्ण ने न केवल सभी की रक्षा की, बल्कि सभी के मन में विश्वास और भक्ति को और भी दृढ़ किया।अंततः इंद्र को यह समझ आ गया कि श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं। उनका अहंकार चूर-चूर हो गया और वे श्रीकृष्ण के सामने प्रकट होकर उनसे क्षमा मांगने लगे। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और वचन दिया कि वे भविष्य में कभी भी अहंकार में आकर ऐसा कार्य नहीं करेंगे।इसके बाद वर्षा थम गई, आकाश साफ हो गया और वृंदावन में फिर से शांति और खुशी लौट आई। सभी ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान किया और उनके प्रति अपनी अटूट भक्ति व्यक्त की।

इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष गोवर्धन पूजा मनाई जाती है।इस दिन लोग गोबर या मिट्टी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाते हैं, उसकी पूजा करते हैं और अन्नकूट के रूप में अनेक प्रकार के व्यंजन भगवान को अर्पित करते हैं। मंदिरों में विशेष सजावट होती है और भव्य भोग लगाया जाता है।यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है, प्रकृति का सम्मान करना चाहिए, अंधविश्वास से ऊपर उठकर सही ज्ञान को अपनाना चाहिए और सच्ची भक्ति हमें हर संकट से बचा सकती है।

गोवर्धन पूजा की विधि और मंत्र

इस दिन पहले घर के मुख्य द्वार को अच्छी तरह साफ कर लें और फिर, वहां गोबर की मदद से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बनाएं। साथ ही, गाय, बैल आदि की आकृतियां बनाने का भी विधान होता है।गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बनाने के बाद शाम को पूजा की जाती है। इसकी तैयारी के लिए एक थाली में चावल, रोली, बताशे, खीर, जल, दूध आदि रखें। अब शाम को गोवर्धन भगवान के सामने एक दीप जलाएं।दीपक जलाने के बाद 'गोवर्धन धराधार गोकुल- त्राणकारक, विष्णुबाहुकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव।' मंत्र का जाप करें और फूल अर्पित करें। साथ ही, प्रार्थना भी करें।प्रार्थना करने के लिए 'लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता, घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।' मंत्र बोलें। फिर, गोवर्धन भगवान की पूजा में 'ओम नमः श्री वासुदेवाय, ओम गोवर्धनाय नमः, ओम श्री गोवर्धनाय नमः।' मंत्र का जाप करें।मंत्रों का जाप करने के बाद गोवर्धन महाराज को भोग लगाएं और फिर, प्रसाद सभी को बांट दें। इस प्रकार विधि-विधान से गोवर्धन की पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

वैज्ञानिक रूप से गोवर्धन पूजा पारिस्थितिकी संरक्षण का पर्व है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि स्वर्ग के किसी अदृश्य देवता के बजाय अपने स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों—जैसे पहाड़, जल और वनों—की रक्षा करना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे ही वर्षा चक्र और पर्यावरण को संतुलित रखते हैं। साथ ही, इस दिन इस्तेमाल होने वाला गाय का गोबर एक उत्कृष्ट 'बायो-फर्टिलाइजर' है जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, और 'अन्नकूट' का विविध शाकाहारी भोजन मानसून के बाद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। संक्षेप में, यह पूजा 'सस्टेनेबल लिविंग' और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का एक प्राचीन विज्ञान है।

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