गणगौर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक बेहद खूबसूरत, जीवंत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध त्योहार है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के असीम प्रेम, भक्ति, लोक गीतों और रंग-बिरंगी परंपराओं का अनूठा उत्सव है। आइए, इस पावन पर्व को इसके सभी पहलुओं के साथ विस्तार से समझते हैं।
गणगौर क्या है?
'गणगौर' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है:
- 'गण' का अर्थ है भगवान शिव (ईसर जी)।
- 'गौर' का अर्थ है माता पार्वती (गौरी जी)।
यह त्योहार मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट वैवाहिक बंधन, प्रेम और समर्पण को समर्पित है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां एक अच्छे, योग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए गणगौर की पूजा करती हैं।
यह कब मनाया जाता है ?
गणगौर का उत्सव बेहद लंबा चलता है। इसकी शुरुआत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा (होली के अगले दिन) से हो जाती है और यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मुख्य पूजा के साथ समाप्त होता है। यह पूरा पर्व 18 दिनों तक चलता है। होली की राख से पिंडियां बनाकर पहले दिन से ही पूजा शुरू हो जाती है, जो चैत्र शुक्ल तृतीया (मुख्य गणगौर) तक अनवरत चलती है।
गणगौर की पौराणिक कथा
गणगौर से जुड़ी कई लोककथाएं हैं, जिनमें से सबसे प्रचलित कथा इस प्रकार है:
एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनी पृथ्वी लोक पर भ्रमण के लिए निकले। चलते-चलते वे एक गांव में पहुंचे। जब गांव वालों को पता चला कि स्वयं महादेव और माता गौरी आए हैं, तो गांव की गरीब परिवार की महिलाएं तुरंत उनके स्वागत के लिए थाली में हल्दी, कुमकुम और जल लेकर दौड़ीं। उन्होंने पूरी श्रद्धा से दोनों की पूजा की।माता पार्वती उनकी भक्ति से बेहद प्रसन्न हुईं और उन्होंने अपने हाथों से सुहाग रस (सौभाग्य का आशीर्वाद) उन गरीब महिलाओं पर छिड़क दिया।
इसके कुछ देर बाद, गांव के अमीर और ऊंचे परिवारों की महिलाएं कीमती रेशमी कपड़े और आभूषण पहनकर, छप्पन भोग की थाली लेकर पहुंचीं। तब भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा, "तुमने सारा सुहाग रस तो पहले ही गरीब महिलाओं पर छिड़क दिया, अब इन्हें क्या दोगी?"
माता पार्वती ने मुस्कुराकर कहा, "स्वामी! उन्हें तो मैंने केवल ऊपरी हिस्से से रस दिया है। इन महिलाओं के लिए मैं अपनी उंगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी, जो सीधे उनके भाग्य में समा जाएगा।" माता पार्वती ने वैसा ही किया। वह दिन चैत्र शुक्ल तृतीया का था। तब से इस दिन को गणगौर के रूप में मनाया जाने लगा।
पूजन विधि और 18 दिनों के नियम
18 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में रोज की दिनचर्या और पूजा बेहद व्यवस्थित होती है।
होलिका की राख से पिंडियां बनाना: पहला दिन
होली के अगले दिन सुबह महिलाएं होलिका दहन की राख और मिट्टी मिलाकर 16 पिंडियां बनाती हैं। इन्हें ईसर और गौर का प्रतीक मानकर रोज दूब (घास) और पानी से पूजा की जाती है।जवारा (खेती) बीजना: सातवां-आठवां दिन
एक साफ बर्तन या टोकरी में मिट्टी भरकर जौ (जवारा) बोए जाते हैं। इस जवारे को रोज पानी दिया जाता है। मुख्य पूजा के दिन तक ये पौधे बड़े हो जाते हैं, जिन्हें माता को अर्पित किया जाता है।मिट्टी या लकड़ी की मूर्तियां लाना: सप्तमी/अष्टमी तिथि
बाजार या कुम्हार के घर से मिट्टी के ईसर-गौर लाए जाते हैं, या फिर घरों में रखी लकड़ी की मूर्तियों (काष्ठ के ईसर-गौरी) को नए सुंदर वस्त्र और गहनों से सजाया जाता है।मेहंदी और श्रृंगार: मुख्य पूजा से एक दिन पहले
सिंजारे के दिन (द्वितीया तिथि) महिलाएं अपने हाथों और पैरों में सुंदर मेहंदी रचाती हैं, नए कपड़े पहनती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। पीहर (मायके) से बेटियों के लिए कपड़े और मिठाई भेजी जाती है।मुख्य गणगौर पूजा और भोग: चैत्र शुक्ल तृतीया
सुबह जल्दी उठकर महिलाएं सज-धजकर मिट्टी की वेदी बनाती हैं। दीवार पर गणगौर का चित्र (काजल और रोली की 16-16 बिंदियां) बनाया जाता है। माता को गुने (एक विशेष मीठा पकवान), हलवा और पूरी का भोग लगाया जाता है। पारंपरिक लोकगीत गाते हुए दूब से पानी छिड़ककर पूजा संपन्न की जाती है।
इस दिन क्या करते हैं और उत्सव कैसे मनाया जाता है?
लोकगीत और नृत्य: इन 18 दिनों में महिलाएं और लड़कियां शाम को एक जगह इकट्ठी होती हैं, घेरा बनाकर "गोर गोर गोमती...", "खेलण दो गणगौर..." जैसे बेहद मधुर लोकगीत गाती हैं और घूमर नृत्य करती हैं।
- पानी पिलाना और घुमाना: मूर्तियों को रोज सुबह-शाम बगीचे या कुएं पर ले जाया जाता है, जहां उन्हें प्रतीकात्मक रूप से पानी पिलाया जाता है।
- विसर्जन (बावड़ी या तालाब में): अंतिम दिन पूजा के बाद, एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला जाता है। महिलाएं मूर्तियों को अपने सिर पर रखकर लोकगीत गाते हुए किसी तालाब, कुएं या बावड़ी पर ले जाती हैं, जहां नम आंखों से ईसर-गौर की मूर्तियों को विसर्जित किया जाता है (मानो बेटी को विदा किया जा रहा हो)।
यह कहां मनाया जाता है?
वैसे तो यह त्योहार पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के मारवाड़ी और राजपूत समाज द्वारा मनाया जाता है, लेकिन इसकी असली भव्यता राजस्थान में देखने को मिलती है:
1.जयपुर: यहाँ की गणगौर की 'शाही सवारी' दुनिया भर में मशहूर है। राजपूती ठाट-बाठ के साथ महलों से माता की सवारी निकलती है, जिसे देखने विदेशी पर्यटक भी आते हैं।
2.उदयपुर: यहाँ पिछोला झील के घाट (गणगौर घाट) पर नावों में माता की सवारी निकाली जाती है, जो पानी की लहरों के बीच बेहद विहंगम दृश्य पैदा करती है।
3.नाथद्वारा, जोधपुर और बीकानेर: इन जगहों पर भी अपनी स्थानीय परंपराओं के साथ इसे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
4.अन्य राज्य: मध्य प्रदेश (मालवा और निमाड़ क्षेत्र), हरियाणा और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में भी इसे पूरी आस्था से मनाया जाता है।
इसका महत्व और प्रासंगिकता
- सांस्कृतिक धरोहर: यह त्योहार राजस्थान की समृद्ध कला, पारंपरिक पोशाक (जैसे रंग-बिरंगे लहंगे और चुनरी), पारंपरिक आभूषणों और लोक संगीत को सदियों से जीवंत बनाए हुए है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है।
- पारिवारिक और सामाजिक बंधन: नवविवाहित लड़कियों के लिए शादी के बाद की पहली गणगौर बेहद खास मानी जाती है। इसके नियम और रस्में मायके तथा ससुराल, दोनों पक्षों के बीच के रिश्तों को और अधिक मजबूत और मधुर बनाती हैं।
- प्रकृति से गहरा जुड़ाव: इस पूजा में दूब (हरी घास), मिट्टी की पिंडियां, मिट्टी के बर्तन और जौ के जवारों का उपयोग किया जाता है। यह सब हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन और हमारी संस्कृतियाँ प्रकृति के तत्वों के साथ कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं।
स्त्री शक्ति और स्वाभिमान का सम्मान: यह पर्व महिलाओं को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है। यह उन्हें अपने सुहाग, स्वाभिमान, परिवार की खुशहाली और समाज के कल्याण के लिए संकल्पित होने की प्रेरणा देता है।
गणगौर केवल एक व्रत नहीं है, बल्कि यह बदलते मौसम (वसंत ऋतु के आगमन) और जीवन में उल्लास भरने का माध्यम है। यह त्योहार सिखाता है कि श्रद्धा, समर्पण और अपनों के लिए प्रेम ही असल में जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य (सुहाग) है।

