गणेश चतुर्थी 2027 :
लंबोदर गजकर्ण का, विघ्नविनाशक रूप।
सिद्ध सभी कारज करें, पावन रूप अनूप।
गणपति बप्पा मोरया!
हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का त्योहार अत्यंत उत्साह, उमंग और गहरी भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व बुद्धि, समृद्धि, रिद्धि-सिद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव का प्रतीक है। यह उत्सव प्रतिवर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो अंग्रेजी कैलेंडर में अगस्त या सितंबर के महीने में आता है।
शास्त्रों के अनुसार, विघ्नहर्ता गणेश जी का अवतरण दोपहर के समय हुआ था, इसलिए मध्याह्न काल (दोपहर के समय) में उनकी पूजा-अर्चना और स्थापना करना विशेष फलदायी व कल्याणकारी माना जाता है। यह महान उत्सव केवल एक दिन का न होकर पूरे दस दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत भव्य पंडालों और घरों में 'गणपति स्थापना' से होती है और इसका समापन 'अनंत चतुर्दशी' के दिन अत्यंत भावुक विदाई यानी 'गणेश विसर्जन' के साथ होता है। भक्त इन दस दिनों में बप्पा की अनन्य भाव से सेवा करते हैं और उनसे अपने जीवन के सभी दुखों और विघ्नों को दूर करने की मंगल प्रार्थना करते हैं।
वर्ष 2027 का विशेष ज्योतिषीय संरेखण
वर्ष 2027 में गणेश जन्मोत्सव के समय ग्रहों और नक्षत्रों का बेहद कल्याणकारी संयोग बन रहा है। इस वर्ष भगवान गणेश की पूजा के समय चित्रा और स्वाति नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खोलेगा। चंद्रमा इस दौरान तुला राशि में गोचर करेंगे, जिससे मानसिक शांति और संतुलन की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही सूर्य देव अपनी स्वराशि सिंह में विराजमान रहेंगे, जो इस पर्व की दिव्यता को और अधिक बढ़ा रहे हैं।
गणेश चतुर्थी व्रत व स्थापना : शनिवार, सितम्बर 4, 2027
चतुर्थी तिथि का समय:
- चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: सितम्बर 03, 2027 को 14:18 (दोपहर 02:18) बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त: सितम्बर 04, 2027 को 12:25 (दोपहर 12:25) बजे
- मध्याह्न गणेश पूजा व स्थापना मुहूर्त: दोपहर 11:08 से 12:25 तक
- कुल अवधि: 01 घण्टा 18 मिनट्स
- गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी): मंगलवार, सितम्बर 14, 2027
वर्जित चन्द्रदर्शन का समय (कलंक चतुर्थी निषेध)
शास्त्रों के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करने से मिथ्या कलंक (झूठा आरोप) लगने का भय रहता है। वर्ष 2027 में चंद्र दर्शन निषेध का समय इस प्रकार है:
- एक दिन पूर्व (3 सितंबर) वर्जित समय: दोपहर 14:18 से रात्रि 20:28 बजे तक (अवधि: 06 घण्टे 09 मिनट्स)
- मुख्य चतुर्थी (4 सितंबर) वर्जित समय: सुबह 09:19 से रात्रि 21:15 बजे तक (अवधि: 11 घण्टे 56 मिनट्स)
भगवान श्री गणेश के जन्म की पावन कथा
भगवान श्री गणेश के जन्म की कथा पुराणों में केवल एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि अनेक दिव्य रहस्यों, भावनाओं और आध्यात्मिक संदेशों से जुड़ी हुई एक अत्यंत विस्तृत कथा है। इसका वर्णन मुख्य रूप से शिव पुराण, स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
शिव पुराण के अनुसार: उबटन से प्राकट्य
कैलाश पर्वत पर एक दिन माता पार्वती एकांत में थीं। उनके मन में यह विचार आया कि उनके पास ऐसा कोई अपना निजी सेवक या पुत्र नहीं है जो केवल और केवल उनके आदेश का पालन करे। उसी समय उन्होंने स्नान करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन (चंदन, हल्दी और सुगंधित पदार्थों) को इकट्ठा करके एक सुंदर, अत्यंत तेजस्वी बालक की आकृति बनाई। माता ने अपनी दिव्य योगशक्ति से उसमें प्राण स्थापित किए। वह बालक तुरंत जीवित हो उठा और माता के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। माता पार्वती ने अत्यंत स्नेहपूर्वक उसे अपना पुत्र स्वीकार किया और उसका नाम “गणेश” रखा।
माता ने गणेश से कहा—
“हे पुत्र! जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, तब तक किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर प्रवेश मत करने देना।”
गणेश ने माता के इस आदेश को अपना परम धर्म मानकर मुख्य द्वार पर कड़ा पहरा देना शुरू कर दिया। उसी समय भगवान शिव कैलाश लौटे। उन्होंने द्वार पर एक अज्ञात, पराक्रमी बालक को खड़ा देखा और अंदर जाने लगे, परंतु गणेश ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। गणेश ने विनम्रता किंतु दृढ़ता से कहा—“मेरी माता के आदेश के बिना कोई भी अंदर नहीं जा सकता।” भगवान शिव को यह बात अत्यंत विस्मयकारी और अपमानजनक लगी कि एक बालक उन्हें उनके ही घर में प्रवेश करने से रोक रहा है।
शिवजी ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे इस बालक को मार्ग से हटाएँ। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि बालक गणेश ने अपने असीम पराक्रम से अकेले ही सभी शिव-गणों को पराजित कर दिया। उनकी यह शक्ति और अद्भुत साहस देखकर सभी देवता भी चकित रह गए। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर स्वयं युद्ध करने का निश्चय किया। देवताओं और ऋषियों के समझाने के बावजूद घनघोर युद्ध हुआ और अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।
जब माता पार्वती को यह दुखद समाचार मिला, तो उनका क्रोध और शोक असीम हो गया। उन्होंने अपना महाकाली का उग्र रूप धारण कर लिया और उनकी दिव्य शक्ति से अनेक विनाशकारी शक्तियाँ प्रकट होने लगीं। उन्होंने समस्त सृष्टि को नष्ट करने की चेतावनी दी। पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया और भय व्याप्त हो गया। तब सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और सभी देवता भगवान शिव के पास आए और इस महासंकट का समाधान करने की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने स्थिति को शांत करने के लिए अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएँ और जो भी प्राणी सबसे पहले मिले (जिसकी माता की पीठ उसकी तरफ हो), उसका सिर लेकर आएँ। गणों को सबसे पहले एक हाथी मिला, जो अत्यंत शांत और पवित्र था। गण उसका सिर लेकर आए और उसे भगवान शिव ने गणेश के धड़ पर स्थापित कर दिया।
भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्तियों से गणेश को पुनर्जीवित किया। जब गणेश पुनः जीवित हुए, तो माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने अपने पुत्र को सजल नेत्रों से गले लगा लिया। इस दिव्य घटना के बाद भगवान शिव ने घोषणा की कि गणेश को सभी देवताओं में सर्वोच्च स्थान मिलेगा। उन्होंने वरदान दिया—
“आज से संसार में किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, संस्कार या पूजा के आरंभ में सबसे पहले गणेश की ही आराधना की जाएगी।”
इस प्रकार भगवान श्री गणेश “प्रथम पूज्य” और “विघ्नहर्ता” के रूप में पूजित हुए।
ब्रह्मवैवर्त पुराण का प्रसंग: शनि देव की दृष्टि
इसके अतिरिक्त ब्रह्मवैवर्त पुराण में एक और रोचक प्रसंग मिलता है। इस कथा के अनुसार, जब गणेश का जन्म हुआ, तब सभी देवी-देवता कैलाश पर बालक को आशीर्वाद देने आए। उनमें शनि देव भी उपस्थित थे। शनि देव ने अपनी दृष्टि लगातार नीचे रखी, क्योंकि उन्हें उनकी पत्नी से श्राप मिला था कि उनकी सीधी दृष्टि जिसके ऊपर भी पड़ेगी, उसका अहित होगा।
माता पार्वती के बार-बार आग्रह करने पर जब शनि देव ने संकोचवश बालक गणेश के मुख की ओर देखा, तो उनकी वक्र दृष्टि के प्रभाव से गणेश का मस्तक धड़ से अलग होकर गोलोक चला गया। तब हाहाकार मचने पर भगवान विष्णु तुरंत गरुड़ पर बैठकर उत्तर दिशा की ओर निकले और मार्ग में मिले एक गजराज (हाथी) का सुंदर सिर लेकर आए। उन्होंने उसे बालक के शरीर से जोड़ दिया। इस प्रकार गणेश का 'गजानन' रूप प्रकट हुआ।
बुद्धिमत्ता की परीक्षा: ब्रह्मांड की परिक्रमा
समय के साथ गणेश जी ने अपनी तीव्र बुद्धिमत्ता और असीम ज्ञान से सभी देवताओं को प्रभावित किया। एक बार देवताओं के बीच यह प्रतियोगिता हुई कि कौन सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर प्रथम स्थान प्राप्त करता है। सभी देवता अपने-अपने तीव्र वाहनों पर सवार होकर दिशाओं की ओर निकल पड़े।
गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) था, जिससे ब्रह्मांड की परिक्रमा असंभव थी। परंतु अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए गणेश जी ने वहीं खड़े अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा—
“शास्त्रों के अनुसार माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड का वास है। मेरे लिए मेरे माता-पिता ही पूरा संसार हैं।”
उनकी इस अद्वितीय बुद्धिमानी और माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर महादेव और भगवान विष्णु ने उन्हें इस प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया।
बप्पा के जीवन से प्रेरणा
इस महापर्व को धूमधाम से मनाने के साथ-साथ हमें भगवान गणेश के पावन चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने जीवन में उनके दिव्य गुणों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए:
- बुद्धि और विवेक (बड़ा सिर): कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी बुद्धि और शांत मस्तिष्क का उपयोग करके सही निर्णय लेना।
- गहन श्रवण शक्ति (बड़े कान): एक अच्छे लीडर और इंसान की तरह सबकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनना और केवल अच्छी बातों को ग्रहण करना।
- माता-पिता की सेवा: माता-पिता को ही अपना सर्वोच्च संसार मानना और उनका सदैव आदर करना।
- धैर्य और दूरदर्शिता (लंबी सूंड): आने वाले संकटों को भांपकर धैर्यपूर्वक उनका सामना करना।
आइए, वर्ष 2027 की इस पावन गणेश चतुर्थी पर हम सब मिलकर पूरी श्रद्धा और सद्भावना के साथ विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्वागत करें और उनके आशीर्वाद से अपने और अपने परिवार के जीवन को सुखी, समृद्ध और विघ्नमुक्त बनाएं।
गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया!

