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गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी का महत्व और तिथि

हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का त्योहार अत्यंत उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है, जो बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान गणेश के जन्मोत्सव का प्रतीक है। यह पर्व प्रतिवर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो अंग्रेजी कैलेंडर में प्रायः अगस्त या सितंबर के महीने में आता है। शास्त्रों के अनुसार, गणेश जी का जन्म दोपहर के समय हुआ था, इसलिए मध्याह्न काल में उनकी पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। यह उत्सव केवल एक दिन का न होकर पूरे दस दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत भव्य पंडालों और घरों में 'गणपति स्थापना' से होती है और इसका समापन 'अनंत चतुर्दशी' के दिन अत्यंत भावुक विदाई यानी 'गणेश विसर्जन' के साथ होता है। भक्त इन दस दिनों में बप्पा की सेवा करते हैं और उनसे अपने जीवन के सभी विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

भगवान श्री गणेश के जन्म की कथा

भगवान श्री गणेश के जन्म की कथा पुराणों में केवल एक घटना नहीं, बल्कि अनेक रहस्यों, भावनाओं और दिव्य घटनाओं से जुड़ी हुई एक अत्यंत विस्तृत कथा है, जिसका वर्णन विशेष रूप से शिव पुराण, स्कन्द पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।कैलाश पर्वत पर एक दिन माता पार्वती एकांत में थीं। उनके मन में यह विचार आया कि उनके पास ऐसा कोई अपना सेवक या पुत्र नहीं है जो केवल उनके आदेश का पालन करे। उसी समय उन्होंने स्नान करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन (चंदन, हल्दी और सुगंधित पदार्थों) को इकट्ठा करके एक सुंदर, तेजस्वी बालक की मूर्ति बनाई। माता ने अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण स्थापित किए। वह बालक जीवित हो उठा और माता के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। माता पार्वती ने स्नेहपूर्वक उसे अपना पुत्र स्वीकार किया और उसका नाम “गणेश” रखा।माता ने गणेश से कहा—“हे पुत्र! जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश मत करने देना।”

गणेश ने माता के आदेश को अपना धर्म मानकर द्वार पर पहरा देना शुरू किया।उसी समय भगवान शिव कैलाश लौटे। उन्होंने द्वार पर एक अज्ञात बालक को खड़ा देखा और अंदर जाने लगे, परंतु गणेश ने उन्हें रोक दिया। गणेश ने विनम्रता से कहा—“मेरी माता के आदेश के बिना कोई अंदर नहीं जा सकता।” भगवान शिव को यह बात अपमानजनक लगी कि एक बालक उन्हें ही रोक रहा है।शिवजी ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे इस बालक को हटाएँ। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि बालक गणेश ने अकेले ही सभी गणों को पराजित कर दिया। उनकी शक्ति और साहस देखकर सभी देवता भी चकित रह गए। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर स्वयं युद्ध करने का निश्चय किया। देवताओं और ऋषियों के समझाने के बावजूद युद्ध हुआ और अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश का सिर अलग कर दिया।जब माता पार्वती को यह समाचार मिला, तो उनका क्रोध और शोक असीम हो गया। उन्होंने अपना उग्र रूप धारण कर लिया और उनकी शक्ति से अनेक देवी-देवताओं की शक्तियाँ प्रकट होने लगीं।

उन्होंने समस्त सृष्टि को नष्ट करने की चेतावनी दी। पूरे ब्रह्मांड में भय व्याप्त हो गया। तब सभी देवता, जैसे विष्णु और ब्रह्मा, भगवान शिव के पास आए और इस संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।भगवान शिव ने स्थिति को शांत करने के लिए अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएँ और जो भी प्राणी सबसे पहले मिले, उसका सिर लेकर आएँ। गणों को सबसे पहले एक हाथी मिला, जो अत्यंत शांत और पवित्र था। उसका सिर लाकर गणेश के शरीर पर स्थापित किया गया।भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्ति से गणेश को पुनर्जीवित किया। जब गणेश पुनः जीवित हुए, तो माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने अपने पुत्र को गले लगा लिया। इस दिव्य घटना के बाद भगवान शिव ने घोषणा की कि गणेश को सभी देवताओं में सर्वोच्च स्थान मिलेगा। उन्होंने कहा—“आज से किसी भी शुभ कार्य यज्ञ या पूजा आरंभ में सबसे पहले गणेश की पूजा की जाएगी।” इस प्रकार गणेश “प्रथम पूज्य” और “विघ्नहर्ता” बने।

इसके अतिरिक्त ब्रह्मवैवर्त पुराण में एक और रोचक प्रसंग मिलता है।

इस कथा के अनुसार, जब गणेश का जन्म हुआ, तब सभी देवता उन्हें देखने आए। उनमें शनि देव भी थे। शनि देव ने अपनी दृष्टि नीचे रखी, क्योंकि उनकी दृष्टि को अशुभ माना जाता था। माता पार्वती के आग्रह पर जब शनि देव ने बालक गणेश को देखा, तो उनकी दृष्टि के प्रभाव से गणेश का सिर अलग हो गया। तब भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठकर शीघ्र ही एक हाथी का सिर लाए और उसे गणेश के शरीर से जोड़ दिया। इस प्रकार गणेश का गजानन रूप प्रकट हुआ।समय के साथ गणेश ने अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान से सभी देवताओं को प्रभावित किया। एक बार देवताओं के बीच यह प्रतियोगिता हुई कि कौन सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर आएगा। सभी देवता अपने-अपने वाहन पर निकल पड़े, परंतु गणेश ने अपने माता-पिता शिव और पार्वती की परिक्रमा की और कहा—“मेरे लिए मेरे माता-पिता ही पूरा संसार हैं।” उनकी इस बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर उन्हें विजेता घोषित किया गया।

इस उत्सव को धूमधाम से मनाने के साथ-साथ हम भगवान गणेश से प्रेरणा लेते हैं और अपने जीवन में अच्छी बातें अपनाने का संकल्प लेते हैं। हमें गणपति बप्पा के गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए, जैसे कि- बुद्धि, साहस और दया। इस राह पर चलकर हम ताउम्र अपने जीवन में गणपति का आशीर्वाद महसूस कर सकते हैं। तो आइए, हम सब मिलकर सद्भावना के साथ भगवान गणेश की पूजा करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाएं।

                                                            लंबोदर गजकर्ण का,विघ्नविनाशक रूप।
                                                                       सिद्ध सभी कारज करें,पावन रूप अनूप।
                                                                                 गणपति बप्पा मोरया।

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