विजयादशमी (दशहरा) 2027:
दशहरा (विजयादशमी व आयुध-पूजा) सनातन धर्म और हिन्दुओं का एक प्रमुख व अत्यंत राष्ट्रव्यापी त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इस महापर्व का आयोजन देश-विदेश में हर्षोल्लास के साथ होता है। यह पर्व अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय का महाप्रतीक है।
वर्ष 2027 में विजयादशमी का मुख्य पर्व 9 अक्टूबर, 2027 (शनिवार) को मनाया जाएगा, जबकि बंगाल विजयादशमी और माँ दुर्गा का विसर्जन 10 अक्टूबर, 2027 (रविवार) को होगा।
2027 का विशेष ज्योतिषीय, ग्रह और नक्षत्र संयोग
वर्ष 2027 की विजयादशमी धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ संयोग लेकर आ रही है। इस साल दशहरे पर श्रवण नक्षत्र का पावन प्रभाव रहेगा, जिसे विजय यात्रा और शस्त्र पूजन के लिए शास्त्रों में सर्वोत्तम माना गया है। इसके साथ ही इस दिन आकाश मंडल में रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सभी प्रकार के अमंगल को दूर कर कार्यों में सिद्धि (सफलता) प्रदान करता है। ग्रहों के राजा सूर्य और देवगुरु बृहस्पति की शुभ स्थिति के कारण इस दिन शुरू किया गया कोई भी नया कार्य या उद्योग अत्यधिक उन्नति और अक्षय फल प्रदान करने वाला होगा।
विजयादशमी 2027: शुभ मुहूर्त एवं समय
आपके द्वारा दिए गए शुद्ध पंचांग के अनुसार वर्ष 2027 के मुख्य मुहूर्त इस प्रकार हैं:
मुख्य विजयादशमी (9 अक्टूबर 2027, शनिवार)
- विशेष विजय मुहूर्त : दोपहर 14:05 से दोपहर 14:52 तक
- कुल अवधि : 00 घण्टे 47 मिनट्स
- महत्व : इस 47 मिनट की अवधि में शस्त्र पूजा, नए वाहन की पूजा, अथवा नए कार्यों का शुभारंभ करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
बंगाल विजयादशमी व विसर्जन (10 अक्टूबर 2027, रविवार)
- अपराह्न पूजा का समय : दोपहर 13:18 से दोपहर 15:39 तक
- कुल अवधि : 02 घण्टे 21 मिनट्स
दशहरे से जुड़ी दो महा-कथाएँ
दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत शुभ तिथियों (अबूझ मुहूर्तों) में से एक है (अन्य दो हैं—चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा और कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा)। इस पावन तिथि के पीछे दो महान गाथाएँ जुड़ी हैं:
माँ दुर्गा और महिषासुर मर्दन
अत्याचारी असुर महिषासुर ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तीनों लोकों पर आतंक मचा दिया था और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। तब त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और समस्त देवताओं के सामूहिक तेज से साक्षात जगदम्बा माँ दुर्गा प्रकट हुईं। देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को सौंपे। माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच लगातार 9 दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। अंततः 10वें दिन (दशमी तिथि) को माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया। इसी विजय के कारण वे 'महिषासुर मर्दिनी' कहलाईं और यह दिन विजयादशमी बना।
भगवान श्री राम और रावण वध
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अपने पिता के वचनों की लाज रखने के लिए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। वनवास के दौरान लंका के अहंकारी राजा रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया। श्री राम ने सुग्रीव और हनुमान जी की वानर सेना की सहायता से समुद्र पर सेतु बांधकर लंका पर चढ़ाई की। कई दिनों के भीषण और धर्म-अधर्म के युद्ध के बाद, इसी दशमी तिथि के दिन प्रभु श्री राम ने रावण के नाभि-अमृत को सुखाकर उसका वध किया और जगत को रावण के अहंकार व अत्याचार से मुक्ति दिलाई।
शस्त्र-पूजा, रावण दहन और उत्सव की विशेषताएँ
1. शौर्य और शस्त्र पूजन की तिथि
भारतीय संस्कृति हमेशा से वीरता और शौर्य की उपासक रही है। व्यक्ति और समाज के रक्त में कायरता न आए और वीरता का संचार हो, इसलिए दशहरे पर शस्त्र-पूजा (आयुध-पूजा) का विधान है। प्राचीन काल में राजा लोग इसी दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। आज के संदर्भ में लोग अपनी आजीविका के साधनों, वाहनों, शस्त्रों और यंत्रों का पूजन करते हैं।
2. पुतला दहन (रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद)
इस उत्सव की सबसे अनूठी और नाटकीय विशेषता "रावण दहन" है। देश भर में रामलीलाओं का मंचन होता है और दशहरे की शाम को रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। यह इस बात का साक्षात दर्शन है कि अधर्म का ढांचा चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, सत्य की एक चिंगारी उसे भस्म कर देती है।
दशहरे का सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
10 विकारों का परित्याग:
दशहरा (दस-हरा) का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ है अपने भीतर के 10 प्रकार के पापों और अवगुणों का परित्याग करना—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार), मत्सर (ईर्ष्या), अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी। रावण के 10 सिर वास्तव में इन्हीं 10 बुराइयों के प्रतीक हैं।
सामाजिक सौहार्द और एकता
दशहरा समाज में एकता और आपसी भाईचारे का संदेश देता है। इस दिन लोग पुरानी कटुता, घृणा और बेईमानी को भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं। महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में इस दिन 'शमी' (सोने के प्रतीक) के पत्ते एक-दूसरे को बांटकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह त्योहार विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समुदायों के लोगों को एक बेहतर और न्यायप्रिय समाज के निर्माण के लिए एकजुट होने की प्रेरणा देता है।

