दीवाली हर साल कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाई जाती है, जो हिंदू पंचांग के अनुसार होती है। इसलिए इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है, लेकिन यह आमतौर पर अक्टूबर के अंत से लेकर नवंबर के बीच पड़ती है।इस दिन भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाए जाते हैं और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, इसलिए इसे अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है।आध्यात्मिक रूप से, यह हमारे भीतर के अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का दीपक जलाने की प्रेरणा देता है। इस दिन धन की देवी लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है ताकि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। सामाजिक रूप से, दिवाली लोगों के बीच आपसी भेदभाव मिटाकर प्रेम, भाईचारे और स्वच्छता का संदेश देती है।भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी पर्वों में दीपावली का व्यवहारिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टियों से अत्यधिक महत्त्व है।
इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार की ओर नही, प्रकाश की ओर जाओ। यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।
1. रामायण की कथा
दिवाली उत्सव के वर्णन में यह कथा सबसे प्रसिद्ध है। हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, भगवान राम, उनके भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता को 14 वर्षों के वनवास पर जाना पड़ा। इस वनवास में लंका के दुष्ट राजा रावण ने सीता का अपहरण कर लिया। अनेक चुनौतियों और संघर्षों के बाद, भगवान राम ने अंततः लंका पर विजय प्राप्त की और सीता को बचाया। हिंदी माह कार्तिक की अमावस्या को भगवान राम, सीता और लक्ष्मण अपने गृहनगर अयोध्या लौटे और इस विजय का जश्न मनाने के लिए अयोध्यावासियों ने हजारों दीये जलाए। दिवाली को दीपावली के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है अयोध्यावासियों द्वारा अपने राजा के स्वागत में जलाई गई दीपों की कतारें (अवली)। तब से, यह दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान पटाखे और दीये सबसे अधिक उत्साह का स्रोत होते हैं।
2. महाभारत की कथा
महाभारत नामक एक अन्य महाकाव्य में कौरवों और पांडवों की कहानी और सिंहासन के लिए उनके निरंतर संघर्ष का वर्णन है। जुए के खेल में कौरवों ने पांचों भाइयों, यानी पांडवों को हरा दिया था और दंड के रूप में उन्हें 13 वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था। कार्तिक माह की अमावस्या को वे 13 वर्षों का कठोर वनवास पूरा करके अपने गृह नगर हस्तिनापुर लौट आए। वे ईमानदार, विनम्र, दयालु, प्रेममय और सौम्य स्वभाव के थे और आम लोग उनका आदर करते थे। हस्तिनापुर में उनका स्वागत करने के लिए लोगों ने उनके घरों को दीयों से सजाया। यह कहानी रामायण से काफी मिलती-जुलती है और कुछ सांस्कृतिक संप्रदायों का मानना है कि इसी घटना से दिवाली की शुरुआत हुई थी।
3. लक्ष्मी को जन्मदिन की शुभकामनाएं
इस दिवाली के दिन अधिकांश हिंदू घरों में देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, शायद इसलिए क्योंकि यह देवी का जन्मदिन है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, आरंभ में देवता और राक्षस दोनों ही सामान्य मनुष्यों की तरह नश्वर जीवन जीते थे, लेकिन वे अमरता की कामना करते थे। अमरता का अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन हुआ। जब पूरा समुद्र मंथन हो रहा था, तो कई चीजें सतह पर आ गईं। देवी लक्ष्मी भी उनमें से एक थीं, जो क्षीरसागर की पुत्री हैं। उनका जन्म कार्तिक माह की अमावस्या के दिन हुआ था। भगवान विष्णु लक्ष्मी की शांत सुंदरता से इतने मोहित हो गए कि उन्होंने तुरंत उनसे विवाह कर लिया। इस अवसर पर दीये जलाए गए। तब से दिवाली का अर्थ है देवी लक्ष्मी की पूजा करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना।
दीपावली की परंपराएँ
भारत में दीपावली केवल एक दिन का नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाला भव्य और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पर्व है, जिसे पूरे देश में अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इसका उत्सव मुख्यतः पाँच दिनों तक चलता है—धनतेरस, नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली), मुख्य दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज।दीपावली की शुरुआत धनतेरस से होती है, जिसमें लोग सोना-चांदी, बर्तन या नई वस्तुएँ खरीदते हैं क्योंकि इसे शुभ माना जाता है। इसके बाद नरक चतुर्दशी आती है, जिसे दक्षिण भारत में विशेष महत्व दिया जाता है, जहाँ लोग सुबह जल्दी स्नान करते हैं और भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की याद में उत्सव मनाते हैं। मुख्य दीपावली के दिन पूरे देश में घरों की विशेष सजावट की जाती है—दीयों, मोमबत्तियों, रंग-बिरंगी लाइट्स और सुंदर रंगोलियों से वातावरण अत्यंत आकर्षक बन जाता है।इस दिन लोग माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं।
पूजा का उद्देश्य घर में धन, समृद्धि और शुभता का आगमन करना होता है। लोग अपने परिवार के साथ मिलकर मिठाइयाँ जैसे लड्डू, बर्फी, काजू कतली आदि बनाते हैं और एक-दूसरे को भेंट करते हैं। बच्चे और बड़े सभी पटाखे जलाकर खुशी व्यक्त करते हैं (हालाँकि आजकल पर्यावरण के कारण कम पटाखे चलाने की सलाह दी जाती है)।उत्तर भारत में दीपावली का संबंध भगवान राम के अयोध्या लौटने से जुड़ा है। इस दिन अयोध्या में लाखों दीये जलाकर “दीपोत्सव” मनाया जाता है। पश्चिम भारत, विशेषकर गुजरात और महाराष्ट्र में, यह व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है—यहाँ नए साल की शुरुआत मानी जाती है और व्यापारी अपने नए बही-खाते शुरू करते हैं।पूर्वी भारत, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा में दीपावली के दिन काली पूजा का आयोजन होता है। यहाँ माँ काली की विशेष पूजा, तंत्र साधना और रात्रि जागरण किया जाता है।
वहीं दक्षिण भारत में यह पर्व अधिकतर भगवान कृष्ण की विजय के रूप में मनाया जाता है, और लोग पारंपरिक भोजन जैसे इडली, डोसा, मिठाइयाँ और खास व्यंजन बनाते हैं।गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा को याद किया जाता है और अन्नकूट का आयोजन होता है, जिसमें अनेक प्रकार के व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं। अंत में भाई दूज आता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं।इस प्रकार, भारत के हर क्षेत्र में दीपावली की अपनी अलग पहचान, परंपराएँ और मान्यताएँ हैं, लेकिन सभी जगह इसका मूल संदेश एक ही है—अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना, बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का स्वागत करना।

